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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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हैं कि राजा भोज के कनिष्ठ भ्राता उदयादित्य ने सम्भव है अपना पुराना वैर मिटाने के लिए अपनी भतीजी भोज की पुत्री राजदेवी अथवा राजमती का विवाह बीसलदेव तृतीय से किया हो; क्योंकि राजपूतों में आपस के वैर प्रायः पुत्री विवाहने से मिट जाते थे, जिसके अनेक उदाहरण उनके इतिहास में मिलते हैं'।" इसके अतिरिक्त डा० ओझा ने शिलालेखों का प्रमाण देते हुए यह सिद्ध किया है कि विग्रहराज बीसलदेव तृतीय परमार-राजा भोज के भाई उदयादित्य का समकालीन था, जो वि० सं० १११६ के आस पास गद्दी पर बैठा था।१ इन्हीं ऐतिहासिक सत्यों के आधार पर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि बीसल- देव रासो का नायक चौहान राजा—बीसलदेव तृतीय है और इसका रचना-काल कार्तिक वि० सं० १२०२ चैत्रादि १२०३ होना चाहिए। आचार्य रामचन्द्र जी शुक्ल कहते हैं कि "दिये हुए सं० के विचार से कवि अपने नायक का समसामयिक जान पड़ता है। पर वर्णित घटनाएँ, विचार करने पर बीसलदेव के बहुत पीछे की जान पड़ती हैं, जब कि उनके सम्बन्ध में कल्पना की गुंजाइश हुई होगी। यह घटनात्मक काव्य नहीं है, वर्णनात्मक है। इसमें दो ही घटनाएँ हैं—बीसलदेव का विवाह और उनका उड़ीसा जाना। इनमें से पहली बात तो कल्पना प्रसूत प्रतीत होती है। बीसलदेव से १०० वर्ष पहले ही धार के प्रसिद्ध परमार राजा भोज का देहान्त हो चुका था। अतः उनकी कन्या के साथ बीसलदेव का विवाह किसी पीछे के कवि की कल्पना ही प्रतीत होती है। उस समय मालवा में भोज नाम का कोई राजा नहीं था। बीसल- देव की एक परमार वंश की रानी थी, यह बात परम्परा से अवश्य प्रसिद्ध चली आती थी, क्योंकि इसका उल्लेख पृथ्वीराजरासो में भी है। इसी बात को लेकर पुस्तक में भोज का नाम रखा हुआ जान पड़ता है। अथवा यह हो सकता है कि धार के परमारों की उपाधि ही भोज रही हो और उस आधार पर कवि ने केवल यह उपाधि-सूचक नाम ही दिया हो, असली नाम न दिया हो। कदाचित् इन्हीं में से किसी की कन्या के साथ बीसलदेव का विवाह हुआ हो। परमार कन्या के सम्बन्ध में कई स्थानों पर जो वाक्य आये हैं, उन पर ध्यान देने से यह सिद्धान्त पुष्ट होता है कि राजा भोज का नाम कहीं पीछे से न १. नागरी प्रचारिणी पत्रिका सन् १९६७—पृ० १६६-६८ २. ” ” ” १६६