बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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की रचना तिथि सं० १२०२ वि० मानते हैं। (इस प्रकार लगभग १२५ वर्ष पश्चात् इस ग्रंथ की रचना के सम्बन्ध में उनका विचार है कि इस ग्रन्थ को छन्दोबद्ध करने वाले कवि नरपति नाल्ह को केवल इतना ही ज्ञात था कि किसी भोज की पुत्री राजमती के साथ बीसलदेव का विवाह हुआ था। उसी के आधार पर उसने अनेक कल्पनात्मक नामों तथा घटनाओं का मिश्रण करके लोकरंजनार्थ एक काव्य गाने योग्य तैयार कर दिया । यह विवाह कब हुआ था, इसका उसको ठीक-ठीक पता न था, इसलिए राजमती के पिता के नाते, भोज के जीवन- काल में ही विवाह हो जाने का उसने वर्णन कर दिया है।¹ डा० माताप्रसाद गुप्त ने स्थूल रूप से ग्रंथ के रचना-काल के विषय में विचार करते हुए इसके ऐतिहासिक तथ्यों का विवेचन किया है। बीसलदेव तृतीय या चतुर्थ अजमेर की स्थापना, भोज द्वारा मगेवा, सोरठ, टॉक आदि कई प्रान्तों को बीसलदेव को दिये जाने की बात तथा बीसलदेव के उड़ीसा यात्रा की कथा का ऐतिहासिक विश्लेषण करते हुए डा० गुप्त इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि विग्रहराज तृतीय की रानी का नाम राजदेवी था। उसी के सम्बन्ध में राजमती नाम से कुछ कहानियाँ समय पाकर प्रसिद्ध हो गई । फिर भोज परमार आदि से उसे सम्बन्धित कर विग्रहराज तृतीय के बहुत बाद किसी नरपति नाल्ह नामक कवि ने इस ग्रन्थ की रचना कर डाली ।² प० गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने ग्रन्थ के ऐतिहासिक तथ्यों का विशेष रूप से विश्लेषण किया है। वे कहते हैं कि "बीसलदेव रासो में कवि ने मुख्यतया दो घटनाओं का वर्णन किया है-एक तो बीसलदेव के राजाभोज की पुत्री से विवाह होने की और दूसरा उसके (बीसलदेव) उड़ीसा जाने की। जहाँ तक पहली घटना का सम्बन्ध है, बीज रूप में उसमें सत्य का अंश अवश्य है, परन्तु शेष कथा कल्पित ही प्रतीत होती है। अपने इस कथन की पुष्टि में उन्होंने कहा है कि 'बिजोल्यां के शिलालेख में दी हुई चौहानों की वंशावली में विग्रहराज तृतीय की रानी का नाम राजदेवी दिया है। बीसलदेव रासो की राजमती और यह राजदेवी नाम एक ही रानी के सूचक होने चाहिये ।" चौहान राजा बीसलदेव तृतीय से परमार वंशीय राजकुमारी राजदेवी राजा भोज की पुत्री के विवाह के सम्बन्ध में अपना अनुमान प्रकट करते हुए श्री ओझा कहते
१ वीर काव्य—पृ० १६४ । २. बीसलदेव रास—पृ० ५५ ।