बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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पद्धती को समाप्त हुआ था। यह सन् ईसय् में खुदाई करने पर प्राप्त हुआ है। इसी स्थान में बीसलदेव द्वारा स्थापित पाठशाला थी। दिल्ली के प्रसिद्ध फीरोज शाह की लाट पर वि० स० १२२० वैशाख शुक्ला १५ का इसका एक लेख भी है। इत्यादि ।¹ श्री सत्यजीवन जी वर्मा ने १६६१ की लिखी हुई प्रति के आधार पर ही अपना यह मत प्रकट किया है। उस प्रति में "बारह सै बहोत्तराहां मझारि" का ही उल्लेख है। जब यह प्रति श्री वर्मा जी द्वारा सम्पादित हुई थी तब तक वही प्राचीनतम प्रति मानी जाती थी। अतः श्री वर्माजी के लिये यह स्वाभाविक था कि वे इसमें दिये हुए रचना काल को ही ठीक मानें और उसकी पुष्टि में प्रमाण दें। लेकिन उनके लिए भी अच्छा यह होता कि वे अन्य प्रतियों की तिथियों पर ऐतिहासिक दृष्टिकोण से विचार कर लेते और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अपना मूल्यवान विचार उपस्थित करते हुए प्राप्य तिथि की गणना भी कर लेते। डा० उदयनारायण जी तिवारी ने ऐतिहासिक दृष्टिकोण से रचना तिथि पर विचार करते हुए कहा है कि यदि बीसलदेव को विग्रहराज चतुर्थ मान लिया जाय तो राजमती से उसके विवाह की कथा इतिहास के विरुद्ध ठहरती है। राजमती को बीसलदेव रासो में भोज की पुत्री कहा गया है और भोज का समय लगभग सं० १११२ के आस पास था। बीसलदेव चतुर्थ का समय सं० १२०७ से १२२० तक का माना गया है। इस प्रकार सौ वर्ष पूर्व के किसी व्यक्ति की पुत्री से विवाह होने की कथा बड़ी असङ्गत होगी।² इस आधार पर बीसलदेव रासो का नायक बीसलदेव चतुर्थ नहीं ठहरता। बीसलदेव तृतीय के पक्ष में बिजोलियाँ के शिलालेख का प्रमाण, जिसमें चौहानों की वंशावली दी गयी है तथा जिसमें विग्रहराज तृतीय की रानी का नाम राजदेवी दिया गया है, और अन्य शिलालेखों के प्रमाण, जिसके अनुसार भोज के भाई उदयादित्य का विग्रहराज तृतीय का समकालीन होना सिद्ध होता है, तथा भोज की पुत्री राजदेवी अथवा राजमती का विवाह बीसलदेव तृतीय से होने की सम्भावना सिद्ध होती है, डा० उदयनारायण जी तिवारी देते हैं।³ विग्रहराज तृतीय का समय डा० उदयनारायण जी तिवारी ने स० ११५० वि० माना है। और ग्रंथ
१. बीसलदेव रासो—पृ० ६-७। २. वीर काव्य—पृ० १६३। ३. वीर काव्य—पृ० १६४।