बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- ३७ - मिलाया गया हो । जैसे "जनमी गोरी तू जेसलमेर" : 'गोरड़ी जेसलमेर की' । आबू के परमार भी राजपूताने में फैले हुए थे । अतः राजमती का उनमें से किसी सरदार की कन्या होना सम्भव है । पर भोज के अतिरिक्त और भी नाम इसी प्रकार जोड़े हुए मिलते हैं । जैसे—माघ, भवराज, कवि कालिदास । जैसा पहले कह आये हैं, अजमेर के चौहान बीसलदेव ( विग्रहराज चतुर्थ ) बड़े वीर और प्रतापी थे और उन्होंने मुसलमानों के विरुद्ध कई चढ़ाइयाँ की थीं और कई प्रदेशों को मुसलमानों से खाली कराया था । दिल्ली और हाँसी के प्रदेश इन्होंने अपने राज्य में मिलाये थे । इनके वीर चरित का बहुत कुछ वर्णन इनके राजकवि सोमदेव रचित "ललित विग्रह-राज" ( संस्कृत ) में है, जिसका कुछ अंश बड़ी-बड़ी शिलाओं पर खुदा हुआ मिलता है और राजपूताना म्यूजियम में सुरक्षित है । पर नाहड़ के इस बीसलदेव रासो में, जैसा कि होना चाहिए था, न तो उक्त वीर राजा की ऐतिहासिक चढ़ाइयों का वर्णन है, न उसके शौर्य-पराक्रम का । शृङ्गार रस की दृष्टि से विवाह और रूठकर विदेश जाने का ( प्रोषित पतिका के वर्णन के लिए ) मनमाना वर्णन है । अतः इस छोटी-सी पुस्तक को बीसलदेव जैसे वीर का "रासो" कहना खटकता है । पर हम देखते हैं कि यह कोई काव्य ग्रंथ नहीं केवल गाने के लिए रचा गया था, तो बहुत कुछ समाधान हो जाता है ।" डा० श्यामसुन्दर दास का मत है कि "विग्रहराज के विषय में दो और शिलालेखों का पता लगा है । पहिले पर तो सोमेश्वरदेव का बनाया हुआ एक नाटक खुदा है जिसमें वसन्तपाल की कन्या के साथ राजा विग्रहराज की प्रेम- केलि और मुसलमानों के विरुद्ध राजा के युद्धों का वर्णन है । दूसरे पर भी एक नाटक है जिसके रचयिता स्वयं विग्रहराज हैं । इस दूसरे शिलालेख पर संवत् १२१० ( ११५३ ई० ) खुदा है । इनसे अब यह स्पष्ट सिद्ध हो गया कि महाराज विग्रहराज का राज्यकाल १२ वीं शताब्दी के मध्य में हुआ । सोमेश्वर राज के समय का एक शिलालेख मेवाड़ में मिला है जिसमें लिखा है कि विग्रहराज अर्णवराज का पुत्र था और 'तस्य ज्येष्ठ भ्रातृपुत्रः पृथ्वी- राजः' था तथा "ज्येष्ठ भ्रातृ" का नाम आगे चलकर सोमेश्वर दिया है । बीसल- देव का नाम भी इस लेख में दिया है । पर विग्रह-राज से तीन पीढ़ी पहिले १. हिन्दी साहित्य का इतिहास-पृ० ३४-३५ । सं० २००३ ।