बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- २४ - ४-१३०७ । 'घा' समूह की ६ प्रतियों में से चार प्रतियों में १०७७, एक में १२७२, दो में १००३, एक में १००३ जो कि भूल से लिखा प्रतीत होता है, तथा एक में सम्वत् नहीं मिलता है। 'क' समूह की प्रति में १००३ का उल्लेख है। 'ख' समूह की चौदह प्रतियों में से एक में १०७७, छः में १०७३ तथा दो में १३०७ के अतिरिक्त अन्य प्रतियों में रचनातिथि नहीं मिलती। इन संवतों में से १०७७ तथा १००३ को छोड़कर अन्य दो संवतों, १२७२ तथा १३०७ के दो अर्थ लगाये जाते हैं। १२०२ से १२१२ का भी अर्थ लगाया जाता है और इसी प्रकार १३०७ का अर्थ १२०७ भी विद्वान् लगाते हैं। विक्रमी संवतों के दो प्रकार के व्यवहार¹ (चैत्रादि और कार्तिकादि) उपयुक्त संवतों की बारह तिथियाँ देते हैं। लेकिन जिस प्रान्त की यह कथा है वहाँ प्रायः संवत् कार्तिक सुदी प्रतिपदा से आरम्भ होता है। एलेग्जेन्डर कनिंघम साहब कहते हैं— "The Vikrama Sambat, or era of Vikramaditya, is reconed from the vernal equinox of the year 57 B. C. and the comple- tion of the Kaliyuga year 3044. It is used all over northern India except in Bengal where the Saka era has been generally adopted. It is used also in Telingana and Gujrat, but in the latter province the year does not begin untill seven months later than in the north or with the first of Kartik Sudi. कनिंघम साहब के मत की पुष्टि प० गौरीशंकर हीराचन्द जी ओझा भी एक प्रकार से करते हुए कहते हैं कि राजपूताने में पहले विक्रम संवत् कहीं चैत्रादि (चैत्र सु० १ से आरम्भ होने वाला) और कहीं कार्तिकादि (कार्तिक सु० १ से आरम्भ होने वाला) चलता था, जैसा कि वहाँ से मिलने वाले शिला लेखों, दान पत्रों और पुस्तकों से पाया जाता है।² चूँकि पं० गौरी- शंकर हीराचन्द जी ओझा के मतानुसार राजपूताने में कहीं चैत्रादि और कहीं कार्तिकादि संवत् प्रारम्भ होता है इसलिए बीसलदेव रासो की प्राप्य प्रतियों [ के छः संवतों के १२ संवतों का (चैत्रादि और कार्तिकादि के हिसाब से) तथा कनिंघम साहब के मतानुसार केवल छः संवतों की तिथि, वार आदि की गणना १—Book of Indian bras—Alexender cunningham—P. 47. २—ना० प्र० प०, स० १६६७, अंक २, पृ ० १६३ ।