भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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  • १२ - समूह खण्डों में अविभाजित खण्डों में विभाजित 'क' " १४, " X 'घ' " १५, १६, १७, १८, " X १९, २०, २१, २२, २३, २४, २५, २६, २७ । विभिन्न समूहों के इस विश्लेषण द्वारा यही सिद्ध होता है कि खण्डों में अविभाजित रूपान्तर वाली प्रतियों में प्राचीनतम प्रति 'घ' समूह की संख्या एक वाली प्रति है, जो सं० १६३३ की लिखी हुई है तथा खण्डों में विभाजित रूपान्तर वाली प्रतियों में भी प्राचीनतम प्रति 'घ' समूह की संख्या २ वाली प्रति है जो सं०-१७६५ की लिखी हुई है। अतः इन्हीं दो प्रतियों को दोनों रूपान्तरों की प्रतिनिधि प्रति मान कर सम्पादन का कार्य किया गया है। प्राप्य हस्तलिखित ग्रन्थों में एक बात और विचारणीय है । ग्रन्थ में कथित घटना का सम्बन्ध जैसलमेर, अजमेर तथा मालवा से है । लेकिन इन स्थानों में से किसी भी स्थान में उपर्युक्त प्रतियाँ नहीं लिखी गईं । सम्पादन कार्य के लिए आधारित प्रथम रूपान्तर की प्रतिनिधि प्रति (१६३३) आगरा में लिखी गई है और द्वितीय रूपान्तर की प्रतिनिधि प्रति (१७६५) फूनसेड़ा में लिखी गई है। इसके अतिरिक्त १७५१ में रिणी, १७७२ में तेमरासर, १७७५ में मालवपुरा तथा १८२६ में बीकानेर में लिखी हुई प्रतियाँ हैं। अन्य प्रतियों में लेखन-स्थान का उल्लेख नहीं है । भविष्य में यदि कोई प्रति घटित स्थान की लिखी हुई प्राप्त हो सकी, तो विशेष महत्त्व की हो सकती है । घटना से सम्बन्धित स्थानीय कवि द्वारा, यदि नाल्ह कवि द्वारा कही गई घटना का वर्णन किया जाय तो निःसन्देह भाषा, ऐतिहासिक तथ्य आदि में साम्य मिलेगा चाहे स्थानीय कवि द्वारा घटना का वर्णन शतियों के पश्चात् ही क्यों न हो। ग्रन्थ की रचना तिथि अनेक विद्वानों ने ग्रन्थ की रचना-तिथि पर अपना अपना मत विविध रूप से विवेचन करते हुए प्रकट किया है । सबसे पहले डा० श्यामसुन्दर दास ने इस विषय पर अपना मत प्रकट किया सन् १९०० की खोज रिपोर्ट में। वे कहते हैं कि "The author of the chronicle is Narapati Nalha as he gives the date of the composition of this book as Sam. 1220 This is not the Vikram Era, for the 9th day of the dark half of Jaistha does not fall on Wednesday as mentioned in the book according
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