बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
पृष्ठ 234, कुल 315 में से
संदर्भ में पढ़ें~ १६८ ~ चार चरण उलग हुया। था$^१$ परि आव्या ही$^२$ पीथल राठ$^३$ ॥१८५॥ सब आपयड$^४$ थभग लीपट बोझाइ। भानमती राखी लियठ वधाइ ॥ सरस बचन धण पोखीया। सब पडियट्ट$^५$ बात कही समझाइ ॥ भाट सारंग को चउरी चड्यउ$^६$। उतउ उलगायउ देउरो घरह चंदाइ ॥१८६॥ पहिम पटकि मेपडा पढदार। आंगण भाट करइ जह कार$^७$ ॥ भट भाटिक दीसइ घणा। उमिरह$^८$ औवोहन दीसइ दरबारि ॥ भीतरि जाइ सुणानीयउ$^९$। थारी बहिनडी$^{१०}$ कोकहू$^{११}$ राजदुवारि ॥१८७॥ १ आ० ६ था। २ आ० ६ आयो, आ० १२ आव्या थी। ३ आ० १२ राइ। यह छंद आ० ६ में १८७ तथा आ० १२ में १७० है। ४. आ० १२ आये। ५. आ० १२ पडियै। ६. आ० १२ चोरी चड्यो। यह छंद आ० ६ में १८८ तथा आ० १२ में १७१ है। लेकिन आ० १२ में अंतिम पंक्ति है - "उलगाणो देल्यो घरा पठाइ।" ७ आ० १२ जयकार। ८ आ० १२ (में नहीं है)। ९ आ० १२ सुणाईयो। १० आ० १२ बहिन। ११ आ० ६ कोक्यो, आ० १२ तू कोकियो। यह छंद आ० ६ में १८६ तथा आ० १२ में १७२ है।