बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
पृष्ठ 254, कुल 315 में से
संदर्भ में पढ़ें– १४८ – मोमन अधिक उमाहद्दढ । जाणउ आज मिलणह¹ सपी सामरि राव² ॥२१७॥ तय जोगिनठ गढ़ अनमेर । फिरि करि दीठानी³ च्यारं देस⁴ ॥ पठखिया पउत्ति उघाडि नह । सउ सह⁵ राजमती रानी नह देपाइ ॥ छिपउ⁶ आपउ राउ बहुगुण कड । दृढ⁷ मुषि वचन कईउ⁸ समुझाइ ॥२१८॥ १. आ० २ तुभ मिलसो, आ० ६ सफै तो मिलै मोहि, आ० ६ जाणो आज मिले, आ० १२ बाणु आज मिले । २. आ० २ आ० ६ सीचरयो राइ, आ० १२ सांबरिराइ । यह छंद आ० २, खड ३ में ७८, आ० ६ खंड ३ में ७७, आ० ९ में २१६ तथा आ० १२ में २१२ है । लेकिन आ० २ और आ० ६ में १ पक्ति है—आज रूपी म्हारो फरकै अग । ३ पक्ति है—नहीं है । ५ पक्ति है—हेत (आ० ६ चित्त) जगायो हे सपी । ३. आ० १२ ( में नहीं है) । ४. आ० ६ च्यारिउ सेर, आ० १२ चारू सेर । ५. आ० ६ तो । ६. आ० १२ लिप्यो । ७. आ० १२ हु । ८. आ० १२ वचने कहूं । यह छंद आ० ६ में २२० तथा आ० १२ में २१३ है । लेकिन आ० १२ में १ली पक्ति है — “योगनउ पहुतो गढ़ अजमेर ।” ४ थी पंक्ति है—"राखी राजमती ने देहि बोलाई ।”