भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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  • १४६ - राय जोगिनिउ १ पट्टउठ जाउ नहं २ पठद्धि । मसम सरीरि नहं ३ विभूति की पड़द्धि ४ ॥ साकि धतुरा खत्ति ५ पर्या ६ । उठद्ध ७ रायो नह दासी डोघत्ती पाइ ॥ साध्य मोती पोयती । उथ ८ सतपिणि ९ मोली दीया वद्धासि ॥२१६॥ १. आ० ६ जोगिनो, आ० १२ योगिनी । २ आ० ६ जाइ ग्रह पैठो, आ० १२ जाइ ग्रह बइठौ । ३ आ० १२ ( में नहीं है ) । ४. आ० १२ विभुत की पात्ति । ५. अ० २ विम, आ० १२ यग्रति । ६. अ० २ घणवै । ७ आ० १२ ( में नहीं है ) । ८+६ आ० ६ ततपिणि, आ० १२ ऊठी । यह छंद अ० २ खट ३ में ७६, ७७, आ० ६ घट ३ म ७१, ७५ आ० ६ में २२१ तथा आ० १२ में २१४ है । लेकिन अ० २ और आ० ६ में यह छंद निम्न प्रकार है - अ० २ (७६) आ० ६ (७४) जोगो बइठो पउलइ जाइ । धभूति सरीसी पोलि कयइ ॥ आक धतूरा विस घण । बोलइ नोलती बचन मुडाल (आ० ६ बुढोल)॥ राय लीष्यो रो आवीया । बेगी चचावइ रूपा की माल ॥ अ० २ (७७, आ० ६ (७५) राय आपण बानो पोइता जाइ । जाइ प्रयान सुणाब्या माहि ॥ सघलो रावल ढलहलै (आ० ६ फलमलै) । साचन पोवती मोनी की माल ( माहि गाल आ० ६ ) ॥ दासी जाइ सुणपीयो । तब धन उठी मोतीअ चलि ॥