बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- १५४ -
कपट¹ भूपत भोगिनउ² मवि³ कहइ वात । वणिजपइ⁴ भ्रंहसि मुव⁵ पहीय मइ घेवर⁶ भाव⁷ ॥ दूध घटाई पाइसुं । बापू गयउ घणीय निपात ॥ मुपठउ जीमे धीरा जोगीया । दिवइ हमि हांब कहत म्हारा पीयकी⁹ यात ॥२२६॥ यह छंद अ० २ खंड ३ में २८, आ० ६ खंड ३ में २६, १२ में २२१ है। लेकिन आ० १२ में छठी और सातवीं पंक्तियाँ हैं :— ६. "सरेतीय खेलै थी भाल ।" ७. "विसहर भिय गारुडी ।" १. आ० १२ (में नहीं है) । २. आ० १२ भूषेत्रोगनउ । ३. आ० १२ न । ४. आ० १२ (में नहीं है) । ५. आ० ६ रउ, आ० १२ को । ६. आ० ९ घी अह, आ० १२ घणीय । ७. आ० १२ यात । ८. आ० १२ म्हारा । ९. आ० ६ पीयणी, आ० १२ पीउकी । यह छंद अ० २ खंड ३ में ८१, आ० ६ खंड ३ में ७६, आ० ६ में २४८, आ० १२ में २२१ है। लेकिन आ० ६ में इसकी पाँचवीं पंक्ति नहीं है तथा अ० २ और आ० ६ में इसका पाठ है :— "जोगी था कीतु कहइ हो बात । दुषइन्निझावऊँ (आ० ६ तझवटजै) यणी निवात । भैंस को दद्दीपर गरड़ा को (मैं सीसी-आ० ६) मात । यूस्ती (सास्ती-आ० ६) औ मे धीरा जोगिया । पद भिपि आगणि (अंगी-आ० ६) धाताइ छइ बाइ ।