बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- १५५ - तउ डचरइ¹ वूझ नहं² घाट ड³ भात । मविह मन्हि⁴ धाज पक्कसिरया⁵ ॥ उथिनइ⁶ तूध कटोइइ घणीय निवात । भीवउड⁷ दही नहं⁸ नान्द्रो⁹ मात ॥ आगइ बहुसिती भावूछ¹⁰ । हूँ तब इसि पूछिस्य म्हार प्रीय की बात । तिथइ विहंयोद्दिव कठउ । स्वामी नोगट्ट दीन्ही धा जीमणी बाह ॥ झा जोगी पाल्ली महीं । हिवह कत्रे घरि आपइ हो धण को नाह ॥२२७॥ आगलि बहुसी भीमावीयउ ( आ० ६ भीमाडीयउ ) । इसि हसि पूछूइ प्रीउ की बात । - आ० १२ में तीसरी और चौथी पंक्तियाँ नहीं हैं । १. आ० १२ उथिमै उम्होनी । २. आ० १२ छह । ३. आ० १२ ठाढौ । ४. आ० १२ मांझ । ५. आ० १२ पक्कासया । ६ आ० १२ ( में नहीं है ) । ७. आ० १२ बापडीया । ८. आ० १२ अस । ९. आ० १२ गुन्होजी । १० आ० १२ मावरमु । यह छंद आ० ६ में २२६ तथा आ० १२ में २२३ है । लेकिन आ० १२ में छठी तथा अंतिम पंक्तियाँ हैं :- ६. इसि हसि पूछै स्यु प्रीय तणी बात । अंतिम ६. "हिय कंदि आपै हो धण कउ नाह ।"