भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 315 में से

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पृष्ठ 262

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  • १५६ - हिय हयावइ छह धरथ दरव भंडार । हयावइ छह नैनोप सरस तोसार¹ ॥ एयावइ छह हींरा पाथरदा² । नव गज³ हस्तीथ धूअर ब्यारि⁴ ॥ कहह हमारी गोरी जे मुण्ड । फाहिद मेलहाने⁵ पृथीय यार ॥२२८॥ राय⁶ वढरामीया⁷ देह⁸ छह सीप । ठमकती ठमकती चाल्लियो बीप ॥ तुरीय मेल्खाविओ निशि साठि⁹ । पावन¹⁰ बाहनह¹¹ जिम सचराइ राइ ॥ १. आ० १२ तेजो सरल तुपार । २ आ० १२ पाथरी । ३. आ० १२ नवगजा । ४. आ० १२ प्यार । ५. आ० १२ मिलाउ । यह छंद अ० २ खंड ३ में ८३, आ० ६ खंड ३ में ८८, आ० ६ में २३० तथा आ० १२ में २२४ है। लेकिन अ० २ और आ० ६ में इसका पाठ इस प्रकार है — जागी कहइ मुणि मोरी माई ( माय-आ० ६ ) । दिन तीसरई आयई घरी राय ( तोरा नाइ-आ० ६ ) । इमरै देही ( इमही देउ-आ० ६ ) वधामणी । दीवा मोती अरथ मढार ॥ दीधा हीरा पाथरी । फाहि आयइ राजा एताथ यार ॥ आ० १२ में पहली पंक्ति नहीं है। ६. आ० ६ राउ, आ० १२ राउ । ७ आ० ६ वोरासीया नै । ८ आ० १२ दीये । ९. आ० ६ तुरीय म खावियो ताजखउ, आ० १२ तुरीय मलायउवो ताजग्यौ । १० + ११-आ० १२ पवन वाहना ।
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