भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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झूमह¹ कोघट² चढोढिया । नव कुच वंचू³ मेव्हा पची ॥ फत्त पियारहूँ⁴ फारपहूँ । तिय कारणि धण मेल्हीया संवि ॥२३२॥ घरि आण्याठ⁵ सषी सुझिकठ कत । सुऋण स्वामि सिउ⁶ मिळिय हमंत ॥ १. आ० १२ सुमह । २. आ० १२ कोवट । ३ आ० १२ पियारा । ४. आ० १२ कुंच । यह छंद अ० २ खंड १ में ६६, ६७ आ० ६, खंड ३ में ६४, ६५ आ० ६ में २३४ तथा आ० १२ में २२८ है । लेकिन अ० २ और आ० ६ के क्रमशः ६६ और ६४ का पाठ है :— बारा वरसां मील्यो घन ( जब-आ० ६ ) नाह । अरधण प्यु धण लीयो सनाह । कस्तूरी मरदन ( मैपट-आ० ६ ) कीयो । अवरण ( अलकई-आ० ६ ) दीथले गहिरी वाह । साभण पान सम्भारिया । षाइ करि बैठी अण ( बैठो-आ० ६ ) प्रीउ को पाट । तथा अ० २ के ६७ और आ० ६ के ६५ का पाठ है :— अरजण प्यु धण लीयो सनाह । गळि पैहसयो टंकाढिल्लो ( टकावल-आ० ६ ) हार । कंचु ( कंचुकी-आ० ६ ) कसण ते (तप-आ० ६) खोलिया । कू कू चन्दन सरइ ( तिलक-आ० ६ ) स्यंदूर । कर जोडे (जोडी-आ०) नरपति कहइ (नाइहोकवि-आ०६) । कामनी कत सुरग रमइ रस ( रमि-आ० ६ ) पूर । ५. आ० १२ आयो । ६- आ० ६ साष्य मिली ।