बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- १४८ - भाज सपी लछहरी पुरह नीलाय । घरि आयउ¹ बीसल बहुश्राव ॥ घरि घरि खीप बधामणी । घरि घरि तोरण² मंगल च्यारि³ ॥ घरि घरि गुढी उछछह⁴ । सब सपी⁵ घरि आवियठ⁶ मुधिं⁷ भरतार ॥३११॥ जब घर आवियउ⁸ मुधि⁹ भरतार ॥ दरसन जिम विच काइ¹⁰ सिंगार ॥
१. आ० १२ आयो । २. आ० १२ ( में नहीं है ) । ३. आ० १२ चार । ४. आ० ६ उछली, आ० १२ उछल्ली । ५. आ० १२ अवसी । ६. आ० १२ आयो । ७ आ० १२ मुझ । यह छंद अ० २ ख० ६ में ८६, आ० ६ ख० ३ में ८४, आ० ६ में २३३ तथा आ० १२ में ७२७ है । लेकिन अ० २ और आ० ६ में इसका पाठ है :— हिव बारमइ बरस घरि आवीयउ राउ । वाजिन्त्र बाजिया निसार्यो धाउ ॥ घरि घरि गूढी उछुली । घरि घरि तोरण मंगल च्यार ॥ रानी कुवरि हरषी फिरइ । जउ घरि आवीयउ मुझ भरतार ॥ ८. आ० १२ आयो । ९. आ० ६ सैं, आ० १२ मुंह । १०. आ० १२ घण कैरे ।