भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

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पृष्ठ 267

११ - १६१ - मन्दिर पाखो पीयउ कह । घोया चन्दन भरउ१ मचोछ ॥ सेज पहुती सुंदरी । तठहँ२ सगुण स्वामी सुँ करइ किल्लोल ॥२३५॥ मूट्ठडस्यउं३ घण पोकीयड अंग । सीस ससोभित४ माडिय५ मंग ॥ किस्तागर चोपड छीपउ६ । उणि७ गळि पहिरउ कुसुमानधि माळ८ ॥ झयकि करि दीवउ धोखियो९ । राठह साईया१० हूवा सुह११ सुंध भरतार ॥ १. आ० ६ भर्यो, आ० १२ भर्यो । २. आ० १२ (में नहीं है) । यह छंद अ० २ खंड ४ में ४०, आ० ६ में २३६ तथा आ० १२ में २२० है । लेकिन अ० २ में इसकी ३, ४, ५ तथा छठी पंक्तियों का पाठ है:— ३—आवी अबासइ साचरी । ४— हीयइ हरीष मन रंग अपार । ५—धन दीहाडउ आज कउ । ६—कुवर जगायउ छह बीसल राउ । ३ आ० ६ मूकडि सिउं, आ० १२ मुरुडिसु । ४. आ० १२ सीसी सोभित । ५. आ० ६ माडियउ । ६ आ० १२ चोपां छीपो । ७ आ० १२ (में नहीं है) । ८. आ० १२ हार । ९. आ० १२ सजोइयो । १० आ० १२ साइय । ११. आ० १२ (में नहीं है) ।