भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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  • १६३ - हृदि हृदि हमहं¹ आलिंगण देहं² । पज्जिगि न यहसह न³ पान न लेह ॥ उभी दं⁴ उलझद्धा⁵ । तोडइ भुइ अंगुजा⁶ मोडइ मुहँ⁷ पोह ॥ पुरुष भरोसठ⁸ ना करं९ । तह तउ बरस बारह की मेल्ही हो१० नाह ॥२३७॥ टसं कला¹¹ मुसकला¹² मो न¹³ सुझाइ । पछ कह दियडल्लहं¹४ हाथ मलाइ ॥ यह छंद अ० २ खंड ३ में ६८, अ० ६ खण्ड २ में ६६, अ० ६ में २३- तथा अ० १२ में २३२ है । १ अ० २ अ० ६ रूठी गोरी, अ० १२ हृद हृद हसी । २ अ० २ अग्यग नू लेहि अ० ६ अग न लाय, अ० ६ आलिंग देह । ३ अ० २, अ० ६ नवि अ० १२ न बैठह । ४ अ० २ दाखह अ० १२ दीयय । ५ अ० २ श्रीलभा । ६ अ० २ करि आगर करि, अ० ६ आगुली गहिता, अ० १२ तोडे भुँई आंगुली । ७ अ० २ मोड़घूछइ अ० ६ मुरडइ, अ० १२ छै । ८ अ० २ कन भरोसो, अ० ६ कत भरूमो, अ० १२ पुरुष भरोसौ । ९ अ० ६ न करो, अ० १२ ना फरो । १० अ० २ किम रहव्यो, अ० ६ किम रहीजै । यह छंद अ० २ खंड ३ में ६४ अ० ६ खंड ३ में ६२, अ० ६ में २३६ तथा अ० १२ में २३१ है । लेकिन अ० १२ में अंतिम पंक्ति है - "बरस बारह कीत मेलीय नाह ।" ११+१२ अ० २ अ० ६ चटकला मटकला । १३ अ० २ मोहि । १४ अ० २ पन्न कइ हीपडइ, अ० ६ पखकिदइयं, अ० १२ दीयहै ।