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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 315 में से

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पृष्ठ 269
  • १६४ - लाज गहौं प्रिय¹ निरमर्मा² । म्हारो हो वारउ³ वलग आइ । बालउ रे वेस⁴ न देव्हा⁵ । दियह निगुण मुहि किसइ मेल्हइह ॥२१८॥ दे नक्टी तूं पाट उथारि । गलि पहिरती फुला की मालि⁶ ॥ नान्दो सउ⁷ घुंघट काढ़ती । सउ गात⁸ कउ बड़ देतीउ राखि⁹ ॥ १+२. अ० २ प्रीय शर्मा मरममा, आ० ६ प्रीउ नैमरमा, आ० १२ प्रिउ निरममा । ३. अ० २ मेलही आई, आ० ६ राखती मेलइ, आ० ६ म्हारो वार्यउ, आ० १२, म्हारउ वार्यउ । ४. आ० ६ बालउ थीग, आ० १२ बालउ वैस । ५. आ० ६ न देषडो, आ० १२ देषही । यह छंद अ० २ रा० २ में ४३, आ० ६ ल० २ में ४०, आ० ६ में २४०, आ० १२ में ७३४ है । लेकिन अ० २ और आ० ६ में ४, ५ हैं— ४. निगुणी राण थारो किसौ वेसास । ५. करकी बाधू हूं डिन गिणू । आ० १२ में अंतिम पंक्ति है :— "दिय निगुण मुह किसइ मिल्हाइ ।" ६. आ० १२ फूला की माल । ७. आ० ६ नान्दउ सउ, आ० १२ नान्दउ सउ । ८. आ० १२ गात्र । ९. आ० ६ घालि, आ० १२ पूढ़े तोड़लि ।
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