बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- १६८ - धन्य हो पंडिया धन्य हो राइ । नगर पंड्राया दिवस गिणाइ ॥ धन्य हो जोगी¹ दरसणी । जिणि वेणि ले मेलण धणउड नाह² ॥ धन्य दिहांडउ आज कट ॥२४४॥ संवत सहस सत्तित्तरइ³ जाणि । नदह क्यांसिरि कही अमृत वाणि⁴ ॥ गुण गुर्या खतडाण का । सुकल पक्ष पंचमी श्रावण मास ॥ रोहणी नक्षत्र सोहामण्डठ । सो दिन⁵ गिणि जोइसी जोडइ⁶ रास ॥२४५॥ १ आ० १२ जोगीय । २. आ० ६ मेलण्वउ धण को नाह, आ० १० वेगिमिलायो धण को नाह । यह छंद आ० ६ में २४५ तथा आ० १२ में २४० है । लेकिन आ० ६ में उपर्युक्त ५, ६ नहीं हैं। और उपर्युक्त ३ के पूर्व निम्नलिखित और है — धन्य हो गोरी गुण भरी । धन्य हो पूरण्डउ समण कहाइ । धन्य वैशागर मत्रवी । भानुमती रमणी ध य सभाइ । आ० १२ में दूसरी पंक्ति नहीं है तथा अंतिम पंक्ति के अतिरिक्त एक निम्न पंक्ति और है— "राणी राजमती मिल्या वीसल राउ ।" ३. आ० १२ विहुत्तरै । ४ आ० १२ सरसोतवाणी । ५ आ० १२ सुदिन । ६ आ० ६ जोइसी जोड्यो, आ० १२ जोडीयो । यह छंद आ० ६ में २४७ तथा आ० १२ में २४२ है ।