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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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परिशिष्ट (क) चित्तौढ-चित्तौड तालती भोपाल ताल और सब तलइयाँ । गढ़ तो चित्तोढ़ गढ और सब गड़इयाँ । चित्तौड गढ का किला रेलवे स्टेशन से करीव दो मील पूर्व एक अलग पहाड़ी पर बना है । यह पहाड़ी समुद्र की सतह से ऊँचाई में १,८५० फुट और आसपास की भूमि से ५०० फुट के करीब ऊँचा है । इसकी लम्बाई लगभग साढे तीन मील और चौडाई कहीं कहीं आधे मील तक है । क्षेत्रफल करीब ७०० एकड़ है । पहाड़ी के नीचे सात हजार आबादी का एक बड़ा कसबा है । गढ़ पर पहुँचने में सात दरवाजे पार करने पडते हैं । सबसे पहले "पाडलपोव" नामक दरवाजा मिलता है । यह किला मौर्य्य वंशी राजा चित्रागद का बनवाया हुआ कहा जाता है । इसीलिये इसका नाम चित्रकूट पडा और चित्तौड उसी का अपभ्रंश है । विक्रम की आठवों शताब्दी के अन्त में गुहिल वंशीय राजा बापा रावल ने राजपूताने के अन्तिम मौर्य वंशी राजा मान से यह किला छीन लिया, तब से गुहिलोतों के हाथ में यह है । इसपर कुछ समय तक मालवे के परमारों का तथा गुजरात के सोलकियों व मुसलमानों का भी आधिपत्य रहा था । महाराणा उदय सिंह के समय (स० १६२४ वि०) तक यह मेवाड की राजधानी रही । इस किले में कई देवमदिर, राजमहल और ऐतिहासिक प्रसिद्ध स्थान हैं। जयमल और कल्ला की छतरियाँ, रावल पता का चबूतरा, कुम्भ श्याम का मदिर, तुलजा भवानी, अन्नपूर्णा, चनग कुण्ड, कालिका देवी, अदनर जी, अद्भुत जी, सतवीस देवल आदि के मंदिर, सूर्य कुण्ड, भीमगोडी, गौमुख आदि तालाव, और पद्मिनी, जयमल, पत्ता, गोरा, बादल और हिंगलू, आहाडा के महल और महाराणा फतह सिंह का बनवाया नया महल दर्शनीय है । चित्तौड किले पर सफेद संगमरमर का बना हुआ विशाल कीर्ति स्तम्भ (जय स्तम्भ) बड़ा सुन्दर है । यह भारतवर्ष भर में अपने ढंग का एक ही स्तम्भ है । यह स्तम्भ महाराणा कुम्भा ने ६० लाख रुपये खर्च करके बन वाया था और यह मालवे के सुल्तान महमूद खिलजी पर सं० १४६७ (ई स०