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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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१४४०) में शिष्य प्राप्त करने की स्मृति में रचा था। इस वड सागर से थोडा दूर पर जैनियों का सात मंजिला कीर्ति स्तम्भ है जो ७५ फुट ऊँचा है। इसे विक्रम की १४ वीं शताब्दी में दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के बघेरवाल वैश्य महनाय के पुत्र जीजा ने प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के नाम पर बनवाया था।

नागोर

नागोर इसी नाम के परगने का मुख्य स्थान है और राजपूताने के बहुत प्राचीन नगरों में से एक है। संस्कृत ग्रंथों में इसे अहिच्छत्रपुर या नागपुर कहा गया है। नागपुर का अर्थ नागों 'नागवंशियों' का नगर है। अहिच्छत्रपुर का अर्थ है अहि 'नाग' है छत्र 'रक्षा करने वाला' जिस नगर का, ये दोनों एक ही अर्थ के सूचक हैं अतएव यह नगर प्राचीन काल में नागवंशियों का बसाया हुआ या उनकी राजधानी होना चाहिए। पुरातन समय में अहिच्छत्रपुर जांगल देश की राजधानी था और चाहानों का पूर्वज सामन्त यहाँ का स्वामी था, ऐसा बिजोल्या 'मेवाड़' के वि० सं० १२२६ फाल्गुन वदि ३ 'ई० स० ११७० ता० ५ फरवरी' बुधवार के शिलालेख से ज्ञात होता है। यहीं से जाकर चौहानों ने सांभर को अपनी राजधानी बनाया। प्राचीन काल में चौहानों के अधिकार का सारा प्रदेश अर्थात् सांभर, अजमेर आदि का राज्य सपादलक्ष 'सपालक' कहलाता था और अबतक जोधपुर राज्य का नागोर परगना "स्वालक" कहलाता है। अजमेर पर मुसलमानों का आधिपत्य होने के कुछ समय बाद नागोर पर भी उनका अधिकार हो गया। तबसे प्राचीन मंदिर आदि नष्ट किये जाने लगे। प्राचीनता की दृष्टि से एक ही हाते में पास पास बने हुए शिव तथा मुरलीधर के मंदिर महत्त्व के हैं इनके स्तम्भ पुराने हैं। तीसरा दरभाया का मन्दिर है, जो योगिनी का माना जाता है। इसके प्राचीन स्तम्भों पर खुदे हुए लेखों में से एक बिगाड़ दिया गया है—शेष दो पर वि० सं० १६१८ ज्येष्ठ वदि १३ (ई० स० १५६२ ता० २ मई) और वि० सं० १६५६ चैत्र सुदि १३ (ई० स० १६०२ ता० २५ मार्च) के लेख हैं। मुसलमानों के समय के यहाँ बहुत से लेख हैं जिनमें सबसे पुराना मुहम्मद तुगलक के समय का एक दरवाजे पर खुदा लेख है। सन् अस्पष्ट है। यहाँ पर बादशाह अकबर के समय के तीन लेख हैं, जिनमें से एक हि० स० ९७२ (वि० सं० १६२१-२२ ई० स० १५६४-६५) का हसन कुली खाँ की मसजिद में, दूसरा हि० स० ९८५ (वि० सं० १६३४ ई० स० १५७७) का