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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

१४४०) में शिष्य प्राप्त करने की स्मृति में रचा था। इस वड सागर से थोडा दूर पर जैनियों का सात मंजिला कीर्ति स्तम्भ है जो ७५ फुट ऊँचा है। इसे विक्रम की १४ वीं शताब्दी में दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के बघेरवाल वैश्य महनाय के पुत्र जीजा ने प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के नाम पर बनवाया था।

नागोर

नागोर इसी नाम के परगने का मुख्य स्थान है और राजपूताने के बहुत प्राचीन नगरों में से एक है। संस्कृत ग्रंथों में इसे अहिच्छत्रपुर या नागपुर कहा गया है। नागपुर का अर्थ नागों 'नागवंशियों' का नगर है। अहिच्छत्रपुर का अर्थ है अहि 'नाग' है छत्र 'रक्षा करने वाला' जिस नगर का, ये दोनों एक ही अर्थ के सूचक हैं अतएव यह नगर प्राचीन काल में नागवंशियों का बसाया हुआ या उनकी राजधानी होना चाहिए। पुरातन समय में अहिच्छत्रपुर जांगल देश की राजधानी था और चाहानों का पूर्वज सामन्त यहाँ का स्वामी था, ऐसा बिजोल्या 'मेवाड़' के वि० सं० १२२६ फाल्गुन वदि ३ 'ई० स० ११७० ता० ५ फरवरी' बुधवार के शिलालेख से ज्ञात होता है। यहीं से जाकर चौहानों ने सांभर को अपनी राजधानी बनाया। प्राचीन काल में चौहानों के अधिकार का सारा प्रदेश अर्थात् सांभर, अजमेर आदि का राज्य सपादलक्ष 'सपालक' कहलाता था और अबतक जोधपुर राज्य का नागोर परगना "स्वालक" कहलाता है। अजमेर पर मुसलमानों का आधिपत्य होने के कुछ समय बाद नागोर पर भी उनका अधिकार हो गया। तबसे प्राचीन मंदिर आदि नष्ट किये जाने लगे। प्राचीनता की दृष्टि से एक ही हाते में पास पास बने हुए शिव तथा मुरलीधर के मंदिर महत्त्व के हैं इनके स्तम्भ पुराने हैं। तीसरा दरभाया का मन्दिर है, जो योगिनी का माना जाता है। इसके प्राचीन स्तम्भों पर खुदे हुए लेखों में से एक बिगाड़ दिया गया है—शेष दो पर वि० सं० १६१८ ज्येष्ठ वदि १३ (ई० स० १५६२ ता० २ मई) और वि० सं० १६५६ चैत्र सुदि १३ (ई० स० १६०२ ता० २५ मार्च) के लेख हैं। मुसलमानों के समय के यहाँ बहुत से लेख हैं जिनमें सबसे पुराना मुहम्मद तुगलक के समय का एक दरवाजे पर खुदा लेख है। सन् अस्पष्ट है। यहाँ पर बादशाह अकबर के समय के तीन लेख हैं, जिनमें से एक हि० स० ९७२ (वि० सं० १६२१-२२ ई० स० १५६४-६५) का हसन कुली खाँ की मसजिद में, दूसरा हि० स० ९८५ (वि० सं० १६३४ ई० स० १५७७) का

  • १७५ - अकबरी मसजिद में और तीसरा हसन कुली खाँ के बनवाये हुए फव्वारे पर है । “आईन इ अकबरी” आदि ग्रन्थों का रचयिता, अकबर का प्रीतिपात्र अबुल फजल और उसका भाई शेख फैजी नागोर के रहने वाले शेख मुबारक के बेटे थे । शाहजहाँ के समय का एक लेख हि० स० १०४६ ( वि० सं० १६६५ वैशाख सुदि ३ ई० स० १६३८ ता० ७ अप्रेल ) का क़िले के एक मकान में और दूसरा हि० स० १०५६ ( वि० सं० १७०३ : ई० १६४६ ) ताहिर खाँ की मसजिद में है। औरंगजेब के समय के तीन लेख हैं, जिनमें से सबसे पहला हि० स० १०७ ( वि० सं १७७-८ ई० स० ६६०-६१ ) का है। दूसरा हि० स० १०७६ ( वि स० १७२२-२३ ई० स० १६६५-६६ ) का, जिसमे राव अमर सिंह के बेटे राव सिंह द्वारा शनी तालाब बनवाये जाने का उल्लेख है। गुजरात के सुल्तान मुज़फ़्फ़र खाँ ने अपने भाई शम्स खाँ को नागोर की जागीर दी थी, जिसने यहाँ अपने नाम से शम्स तालाब बनवाये । उसके पीछे उसका बेटा फीरोज खाँ वहाँ का स्वामी हुआ जिसने यहाँ एक बड़ी मसजिद बनवाई, जिसको महाराणा कुम्भा ने नगोर विजय करते समय नष्ट कर दिया । जब महाराज अजीत सिंह अपने छोटे पुत्र बख्त सिंह द्वारा मारे गये तो महाराज अभयसिंह ने नागोर की जागीर बख़्त सिंह को दे दी । जनरल कनिंघाम लिखते हैं कि बादशाह औरंगजेब ने जितने मंदिर यहाँ तोडे उनसे अधिक मसजिदें बख्त सिंह ने तोडीं । इसी कारण यहाँ के कई फारसी लेख शहरपनाह की चुनाई में उल्टे-पुल्टे लगे हुए अबतक विद्यमान हैं। टाऊ टोंक राजपूतों का शहर टोंक अजमेर प्रान्त में है । बहुत वर्षों तक यह होल्कर राजाओं के अधीन था । जयपुर से दक्षिण ५० मील की दूरी पर यह अक्षांश २६ १२ उत्तर और ७५ ३८ देशान्तर पूर्व में बसा हुआ है । सन् १८१८ म यह ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत आ गया । गुजरात झेलम से लाहौर जानेवाली सड़क पर चनाव नदी से ६ मील पश्चिम में गुजरात शहर बसा हुआ है । इसका पुराना नाम हैरात था । कनिगघ साहब का अपना मत है कि “हैरात” की उत्पत्ति “अराच” से हुई है ।
  • १७६ - (The Ancient Geography of India P P 205 206)। इसके बसाने वाले सूर्यवंशी राजपूत वचन पाल थे, जिनके सम्बन्ध में विशेष बातें नहीं ज्ञात हैं। ऐसा कहा जाता है कि इसको पुनः स्थापित करने वाले गुजरात के राजा अली खाँ थे जिन्हें शङ्कर वर्मा ने सन् ८८३ और ६०१ के बीच पराजित किया था। इन कथाओं के अतिरिक्त यह भी कहा जाता है कि सन् १३०३ में गुजरात पूर्णतया नष्ट हो गया था और गूजरों ने इसे पुनः अकबर के शासन काल में सन् १५८८ में निर्मित किया। बनास बनास नदी उदयपुर राज्य के प्रसिद्ध कुम्भलगढ़ के क़िले से तीन मील दूर की पर्वत श्रेणी से निकल कर उदयपुर, जयपुर, बूंदी, टाक और करौली राज्यों में बहती हुई रामेश्वर तीर्थ ग्वालियर राज्य के पास चम्बल नदी में मिल जाती है। इसकी लम्बाई अनुमान से ३०० मील है। मडोर-मडारोरा-मँडार मडोर जोधपुर नगर से ५ मील उत्तर नागाद्री नामक एक छोटी-सा नदी के किनारे बसा हुआ है। यहाँ का किला एक पहाड़ी पर स्थित है। इसका अस्तित्व ई० सन् की चौथी सदी के आस पास माना जाता है। शिला-लेखों में इसका नाम “माडव्यपुर” मिलता है। “माडव्यपुर का ही अपभ्रंश “मडोर” है। ऐसा कहा जाता है कि माण्डव्य ऋषि का आश्रम यहाँ था। ब्राह्मण वंशी हरिश्चन्द्र के पुत्र भागभट, कवक, रज्जिल और दद्द ने मडोर को जीतकर यहाँ किला बनवाया था, लेकिन काल की गति से वह अब नष्ट हो गया है। यहाँ एक पञ्चकुण्ड नामक स्थान है जहाँ पाँच कुण्ड बने हुए हैं। आज भी हिन्दू गण इसे पवित्र मान कर स्नानार्थ यहाँ जाते हैं। पुरा काल में यह राजाओं के शमशान का स्थान था जो यहाँ के बने हुए रावचूड़ा, राव रणमल, रावजोधा तथा राव गागा के स्मारकों से सिद्ध होता है। मालदेव के समय से शमशान इस स्थान से हटाकर मोतीसिंह के बगीचे के पास रखा गया, जहाँ अन्य छत्र्रियों में महाराज अजीत सिंह की भी एक छत्री है जो उन सब में विशाल और दर्शनीय है। इससे थोड़ी दूर पूर्व में “तानापार” की दरगाह है। नागाद्री नदी के किनारे किनारे यहाँ महाराज तख्त सिंह के काल तक के मारवाड़ के राजाओं, राजकुमारों आदि के स्मारक बने हुए हैं। इस दग्धस्थान के पास महाराज अभयसिंह के समय का “पैंतीस करोड़ देवता” का देवालय भी

१२ - १७७ - स्थित है। इस स्थान के पास एक गुफा है जिसमें की खुदी हुई मूर्ति नाहड़राव की (रघुवंशी प्रतिहार) मूर्ति बतलायी जाती है। यह गुफा देखने में बहुत प्राचीन नहीं जान पड़ती लेकिन इसके पास वाले एक चबूतरे से दसवीं सदी के लेख का एक टुकड़ा प्राप्त हुआ है, जिसमें प्रतिहार कवक के पुत्र का नाम मिलता है, जो इस समय राजपूताने के अजायबघर में सुरक्षित है। इस गुफा के ऊपरी भाग में गुप्त लिपि में कुछ व्यक्तियों के नाम अंकित हैं। मंडोर के भग्नावशेषों में एक जैन मन्दिर भी है, जो दसवीं सदी का प्रतीत होता है। उसके उत्तर-पूर्व में एक स्थान है जो "रावल की चोरी" कहलाता है। मंदोदरी नाम से "मंडोर" की समानता होने के कारण कुछ लोगों ने रावण के विवाह होने आदि की कल्पना भी कर डाली है। लेकिन यह कल्पना कोरी कल्पना ही है। तथ्य का अंश इसमें नहीं के समान है। मंडोर पहले पहल नागवंशी क्षत्रियों के अधीन रहा होगा जैसाकि उसके पास के नागकुण्ट, नागाद्री नदी, अहिरौल आदि नामों से अनुमान किया जाता है। फिर वह प्रतिहारों के अधिकार में गया और उनसे राठौड़ों को दहेज मे मिला। मंडोर के सम्बन्ध में राजपूताना गजेटियर भाग २, पृ० २६१-६२ में प्राचीन राजाओं के स्मारकों का उल्लेख करते हुए लिखा गया है कि "Little respect or reverence is shown towards spots which in western countries, as cemetries are considered sacred in the present day. Many of the cenetophs are homes for beggar; and even the pariah dog; and nothing is done towards repairing the monuments erected to those who were heroes in their day. चांबल-चंबल चंबल नदी राजपूताने की सबसे बड़ी नदी है। यह मध्य भारत के इन्दौर राज्य (मऊ की छावनी से ६ मील दक्षिण पश्चिम) से निकलती है और ग्वालियर, इन्दौर तथा सीतामऊ राज्यों में बहकर राजपूताने में प्रवेश करती हुई भैसरोडगढ़ (मेवाड़), कोटा, केशवराव, पाटन और धौलपुर के निकट बहती हुई संयुक्त-प्रदेश में इटावा से २५ मील दक्षिण-पश्चिम यमुना से जा मिलती है। इस नदी की पूरी लम्बाई ६५० मील है। इसका पुराना नाम "चर्मण्वती" था। सोरठ-सुराष्ट्र-सौराष्ट्र ह्वेनस्यांग के वर्णन के अनुसार 'सुलब्ध या सुराथ' देश वल्लभी के अधीन था। इसकी राजधानी वल्लभी के पश्चिम में ५०० ली अथवा ८३

  • १७८ - मील की दूरी पर यू-चेन-ता अथवा "उज्जयन्त" पहाड़ी के नीचे थी। उज्जयन्त संस्कृत के "उर्जयन्त" का पाली रूपान्तर है। यह संस्कृत और पाली नाम गिरनार पहाड़ियों का है जो जूनागढ़ के पास हैं। "उर्जयन्त" का उल्लेख रुद्रदाम और स्कन्दगुप्त के गिरनार शिलालेखों में भी प्राप्त है, यद्यपि शिलालेख के कारण सौराष्ट्र की राजधानी जूनागढ़ या यवनगढ़ में, जो वल्लभी से ८७ मील की दूरी पर है, होना सिद्ध होता है। प्रसिद्ध पर्यटक ह्वेनसांग लिखता है कि उसने इस पहाड़ी को घने जंगलों से आच्छादित तथा इसके दोनों किनारों को अगणित कमरों और गैलारियों से भरा पाया था। ह्वेनसांग का यह वर्णन "पोस्टस्"२ के वर्णन से भी मिलता है, जिसने सन् १८३८ ई० में इस पहाड़ी को घने जंगलों और बिना नक़्क़ाशी के चौरस गर्भो पर स्थित छोटे-छोटे कमरों से भरा पाया था। आज भी "सूरत" नाम इस प्रान्त के हिस्से का है और आज के गुजरात कहे जाने वाले नगर में मिला हुआ है। सम्राट् अकबर के समय में भी यह प्रायद्वीप दक्षिण दिशा में बहुत बड़ा था। ३जहांगीर के दरबार में टेरी ४( Terry ) ने जो सूचना इस प्रायद्वीप के सम्बन्ध में दी थी; उसके अनुसार सोरठ का प्रधान शहर "जनागद" अर्थात् "यवन गढ़" अथवा "जूनागढ़" कहलाता था। यद्यपि यह प्रान्त छोटा था तथापि उपजाऊ था और इसके दक्षिण में समुद्र था। उस समय भी यह नगर गुजरात के साथ नहीं मिलाया गया था। ह्वेनसांग का कहना है कि सातवीं सदी में "सूरत" या "सुराष्ट्र" का क्षेत्रफल ६६७ मील था और पश्चिम में यह माही नदी को छूता था। माही नदी मालवा प्रदेश में बहने वाली वह नदी है जो खम्भात की खाड़ी में गिरती है। ह्वेनसांग के उपर्युक्त वर्णन को स्वीकार करने पर ऐसा कहा जा सकता है कि यह नगर इस प्रायद्वीप के सम्पूर्ण भाग को घेरे हुए था और वल्लभी नगर भी इसी के अन्तर्गत था। इसमें सन्देह नहीं कि "वल्लभी" का नाम "सूरत" से अधिक प्रख्यात था लेकिन "सूरत" नाम की ख्याति भी पूर्ण प्रायद्वीप के लिए सन् ६४० तक थी।
  1. Journal Asiatic Society Bombay Vn P. 119 "The Urjjayat hill" P. 123 is urjayat, and P 124 "The jayanta mountain" should all be rendered Ujayanta .
  2. Journal Royal Asiatic Society Bengal 1838 P.P. 874,876 ३. आईने अकबरी, भाग २, पृष्ठ ६६
  3. Voyage to Last India P. 80.
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अजमेर

अजमेर मेवाड का प्रान्त राजपूताने के मध्य भाग में बसा हुआ है। इसके पश्चिम में मारवाड़ के राज्य, उत्तर में किशनगढ और मारवाड़, पूर्व में जयपुर और किशनगढ़ तथा दक्षिण मे मेवाड प्रान्त है। इसका पूरा क्षेत्रफल २१६७.६ मील है और इसकी आबादी ५०६६६४ की है । यह अक्षांश २५ २४ उत्तर तथा देशान्तर ७३°४५ पूर्व के बीच बसा हुआ है। इसके अजमेर और मेवाड दो भाग हैं। अजमेर की लम्बाई उत्तर तथा दक्षिण मे ८० मील और चौड़ाई ५० मील है। मेवाड ४८ मील लम्बा और १५ मील चौड़ा है। (Ajmer Mewara Gazetter 1904) पुराकाल में अजमेर को 'अजयमेरु' कहते थे । आजकल अजमेर का किला 'तारागढ़' के नाम से प्रसिद्ध है। छठी शताब्दी में महाराज अजयपाल चौहान ने इस किले को बनवाया था। ये "सपाद लक्ष" के राजा थे और इसकी राज- धानी सांभर थी। इन्होंने ही अजमेर शहर को भी बसाया था। 'फयसागर' के दक्षिण स्थित 'अजयसर' आज भी इनके नाम को चिरस्थायी बनाये हुए है। 'पृथ्वीराज विजय' के अनुसार अजयदेव द्वितीय ने एक नगर बसाया था और उसी नगर का नाम राजा अजयदेव के नाम के ऊपर 'अजमेर' रखा गया। डा० बुहलर (Buhler) ने भी इसी मत का समर्थन करते हुए कहा है कि अजमेर नगर अजयदेव द्वितीय द्वारा ही बसाया गया था। 'पृथ्वीराज विजय' सर्ग ३ में यह भी कहा गया है कि अरणोराज या अनाजी के तीसरे पुत्र सोमेश्वर ने अपने बड़े भाई और पूर्वज विग्रहराज के राजमहलों के समीप एक नगर बसाया था और उसका नाम अपने नाम के ऊपर रखा था। श्रीहरि बिलास जी शारदा का कहना है कि 'As these palaces stood in Ajmer, the town founded by Someswar and named after Arnoraj, must has existed in or near Ajmer. No one howerer has heard of such a town and there is no men- tion of it in any book. The fact evedently is that several chanhan Kings repaired renovated or improued the existing town and the court poets, given to exaggeration have stated that each of the kings founded this town. Ajiyadev II made improvements & additions to the town of Ajmer & probably transferred his capital from Sakambhara (Sambher) to Ajmer the poet gives him credit for forming it

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लेकिन द्वितीय अजयदेव के पहले ही अजमेर की स्थापना हो चुकी थी। इसका प्रमाण थड़ा ( Thadas ) तथा छत्री ( Chhatrees ) के जैन शिला- लेखों से मिलता है। अजमेर के भट्टारक रतनकीर्ति के शिष्य हेमराज की समाधि पर बनी हुई छत्री पर सं० ८१७ (सन् ७६०) का लिखा हुआ लेख तथा इसी प्रकार का लेख यहाँ बनी हुई अन्य तीन छत्र्रियों पर सन् ८८५, ८५४ तथा ८७१ यह सिद्ध करते हैं कि यह नगर अजयदेव द्वितीय के पहले बस चुका था क्योंकि ये तिथियाँ उक्त अजयदेव के बहुत पहले की हैं। अजमेर की प्राग् ऐतिहासिक कथा से ज्ञात होता है कि अग्निकुल से उत्पन्न होने वाले अन्तिम छत्री चौहानों का यह राज्य था। प्रथम चौहान अन्हल के वंश में उत्पन्न राजा 'अज' ने सन् १४५ मे इसे बसाया था। इससे पहले राजा अज ने 'नाग पहाड़' पर एक किला निर्मित कराना चाहा लेकिन किसी राक्षस के उत्पात के कारण दिन मे बनवाई गई किले की दीवारें रात में नष्ट हो गईं। अतः अज ने आजकल के प्रसिद्ध तारागढ़ पहाड़ी पर उस किले को बनवाया। यह किला गढ़ बीटली के नाम से और इन्द्रकोट पर उनके द्वारा बनवाया हुआ नगर अजमेर के नाम से प्रसिद्ध हुए। ये राजा अज इतिहास में अजयपाल के नाम से प्रसिद्ध हैं। कर्नल टाड ने इस नाम के साथ एक दन्त- कथा का उल्लेख करते हुए लिखा है कि अजयपाल का नाम अजयपाल इसलिए पड़ा था कि ये पहले अजों (बकरियों) की रक्षा करते थे और उनको यह राज्य पुष्कर के किसी महात्मा ने वरदान-स्वरूप उनकी बकरियों का दूध पीने के कारण दिया था। उनका नाम ही शायद इस दन्तकथा की उत्पत्ति का कारण है। इस दन्तकथा में सत्य का अंश कितना है यद्यपि कहा नहीं जा सकता तथापि राजा अजयपाल का अपने जीवन के अन्तिम काल में अजमेर से १० मील की दूरी पर जाकर पहाड़ियों में रहना और वहीं आजकल भी अजयपाल के मन्दिर का होना यही सिद्ध करता है कि उपर्युक्त दन्तकथा में सत्य का अंश कुछ अवश्य है। इसके पश्चात् चौहानों के वंशजों की जो कथाएँ प्रचलित हैं वे सब इति हास से सम्बन्धित हैं। दोलराय की मृत्यु सन् ६८५ में मुसलमान लुटेरों से अपने नगर की रक्षा करते हुए हुई। उसके उत्तराधिकारी मानिकराव ने 'सांभर' की स्थापना की और इसके बाद ही चौहान राजा 'सभरी राव' कहलाने लगे। इनके राज्य काल से सन् १०२४ तक का क्रमिक इतिहास अन्धकारमय है। सन् १०२४ में अवश्य सुल्तान महमूद प्रसिद्ध सोमनाथ के मन्दिर पर आक्रमण करने जाते समय अजमेर से गुजरा था। तत्कालीन राजा बीलमदेव

  • १८१ - उससे लड़ने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था। अस्तु, नगर को खाली कर दिया गया। महमूद ने भी नगर को जहाँ तक लूटते बना लूटा। लेकिन तारा- गढ़ का किला लूट-खसोट से बच गया और महमूद अपने नियत स्थान गुजरात की ओर बढ़ गया। बीलभदेव के बाद वीसलदेव अजमेर का राजा हुआ जो बड़ा प्रतापी और वीर था। धार 'धार' का पुराना नाम 'धारा नगरी' था। इस नगरी की उत्पत्ति के बारे में निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता। साधारणतः तलवार की धार से इस नगरी की उत्पत्ति का सम्बन्ध जोड़ा जाता है, क्योंकि इसकी स्थापना तलवार की जोर से ही हुई थी। मुसलमान इसे 'पीराधार' कई पुराने पीरों के मकरों के कारण और 'किलाधार' यहाँ के पुराने किले के कारण कहते हैं। यह नगर बहुत पुराना है और करीब पाँच सौ वर्षों तक यह मालवा के परमारों की राजधानी थी। परमारों ने अपनी पहली राजधानी उज्जैन में बन- वाई थी लेकिन वैर सिंह द्वितीय ने नवीं शती के अन्त में उज्जैन से अपनी राजधानी हटाकर 'धार' में बनवाई। इसके पश्चात् धार और परमार में इतना घनिष्ट सम्बन्ध हो गया कि यह किंवदन्ती प्रचलित हो गयी:— "Where the Parmara is, there is Dhar, And where Dhara is, there is Parmara Without Dhar the Parmara is nothing, So without the Parmara is That." मालवा के राजाओं की प्रशस्ति जो उदयपुर में प्राप्त हुई है और जो उदयपुर के प्रशस्ति के नाम से प्रख्यात है, उसके ११ वें छन्द में वीर सिंह के सम्बन्ध में लिखा हुआ है—"From him was born Vairisimha whom the people called by another name, the lord of vajrata by that king the famous Dhara was indicated, when he slew the crowd of his enemies by the sharp edge (Dhara) of his sword" उपर्युक्त दन्तकथाओं से निष्कर्ष यही निकलता है कि 'धार' नगर का नामकरण तलवार की 'धार' पर हुआ है। नामकरण की कथाओं के अतिरिक्त प्राचीन कवियों ने धार नगर की प्रशंसा में बहुत-कुछ कहा है। 'नवसहसांक चरित' का रचयिता पद्मगुप्त 'धार' के लिए कहता है :—
  1. Epigraphia Indica I, P. 222.
  • १६२ - द्विजिय लंकामपि वर्तते या, यस्याश्च नायात्यलकापि साम्यम् । वैकुण्ठ पुरी मप्यपरास्ति याया, धारेति नाम्नाकुल राजधानी ॥ अर्थात् परमार राजाओं की राजधानी धार 'लंका' और 'अलकापुरी' से भी श्रेष्ठ है । इसके सम्मुख विष्णु की राजधानी भी हेय ठहरती है । इसी प्रकार 'विक्रमांक देव चरित' का रचयिता विह्लण कहता है :— भोजः क्ष्माभृतमग्रणी न गणिस्तस्य साम्य नरेन्द्रैः सद्यत्प्रत्यह मिति भवतानागतं हा हतास्मि । यस्य द्वारोतुंग शिखर प्रोंट पारावतानाम्, नादव्याजादिनि स्वररुयं व्यामहारैव पाय ॥ अर्थात् जिस धार नगर के अधिपति पृथ्वी के अन्य राजाओं द्वारा सम्मानित राजा भोज थे, जिसके यश का वर्णन राजप्रासाद के उच्च शिखर पर बैठे पारा- वत गण भी करते थे, खेद है, मैं उस नगर में नहो गया । अर्जुन वर्म के संस्कृत नाटक में जो 'धार' की 'भोजशाला' में पीछे से प्राप्त हुआ था, धार नगरी के सम्बन्ध में लिखा है कि यह नगर राजप्रासादों, मन्दिरों, उच्चविद्यालयों तथा नाट्यशालाओं से सुशोभित था । अल्बरूनी ने इस नगर का उल्लेख अपनी यात्रा के वर्णन में १० वीं शती में किया है । सन् १३३३ में जब इब्नबतूता ने भारत भ्रमण किया था, उसने भी धार नगरी का उल्लेख करते हुए लिखा है कि मालवा का प्रधान नगर था । वाक्पति राज (९७३-६६७), सिन्धुराज (६६७-१०१०) तथा राजा भोज ( ११०१०-०५५) के राज्य-काल में धार भारतवर्ष भर में शिक्षा का केन्द्र समझा जाता था । जैसलमेर जैसलमेर अक्षांश २६ ५ और २८ २४ उत्तर तथा देशान्तर ६६ ३० एव ७२ ५० पूर्व में स्थित है । पूर्व पश्चिम तक इसकी लम्बाई १७२ मील तथा उत्तर से दक्षिण तक इसकी चौड़ाई १३६ मील है। इसके उत्तर में भावलपुर का राज्य, पूर्व में बीकानेर और मारवाड़, दक्षिण में मारवाड़ तथा पश्चिम में सिन्धु है । इसका पूरा क्षेत्रफल १६, ४४७ स्क्वायर मील है । यह नगर पूर्ण रूप से रेगिस्तान है । जैसलमेर के स्थापित करने वाले भाटी वंश के प्रसिद्ध राजा देवराज कहे जाते हैं । इन देवराज के सम्बन्ध में कहा जाता है कि सन् ८३६ म इनके जन्म
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के पश्चात् इनके पिता तथा इनके सभी सगे सम्बन्धी एक पहाड़ी जाति द्वारा मार डाले गए थे। ये एक योगी की कृपा से किसी प्रकार बच गये और जैस- लमेर की स्थापना की। रावल की उपाधि भी इन्हीं के समय से प्रचलित हुई। इनके पूर्वजों के इतिहास से ऐसा ज्ञात होता है कि इस वंश की उत्पत्ति भारत के प्रसिद्ध यदुवंशियों से हुई, जिसके नेता कृष्ण थे। कृष्ण की मृत्यु के पश्चात् 'यदु' जाति विभाजित हो गई और भारत के विभिन्न भागों में जाकर बस गई। इनमें से कृष्ण के दो पुत्र सिन्धु नदी के पार उत्तर दिशा की ओर आकर बस गए। कुछ समय के पश्चात् इन्हीं के वंशजों में से कोई एक किसी लड़ाई में मारा गया और यह जाति पुनः दक्षिण दिशा की ओर चली आई, जहाँ गज के लड़के शालिवाहन ने एक नगर की स्थापना की और धीरे धीरे सारे पंजाब प्रान्त पर अपना आधिपत्य जमा लिया। इसी का प्रपौत्र 'भाटी' नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह बड़ा वीर और योद्धा था। इसने अपने बल और शौर्य से आसपास के राजाओं को जीता और तभी से यदुवंश के लोगों ने अपनी पैतृक उपाधि को छोड़कर इस राजा के नाम की उपाधि को धारण किया। पंजाब प्रान्त में भी यह जाति अपनी सत्ता अधिक काल तक नहीं कायम रख सकी। गजनी के राजा ने इस जाति पर आक्रमण कर इस जाति को दक्षिण दिशा की ओर खदेड़ दिया और इस जाति ने सतलज नदी को पार कर भारत की मरुभूमि में प्रवेश किया। यहाँ ही ये लोग बस गये। यहाँ बस जाने के बाद मुसलमानों के आक्रमणों से इस जाति का बराबर मोर्चा लेना पड़ा। मुसलमानों के आक- मणों के अतिरिक्त इस जाति को राज्य के आसपास की बसी हुई जातियों से भी लड़ना पड़ा। ऐसी लड़ाइयों में सबसे बड़ी लड़ाई इस जाति की 'सोदा' जाति वालों से हुई। ऐसे आक्रमणों तथा नित्य के लड़ाई झगड़ों ने इस जाति को लुटेरा बना दिया। इस जाति का यह स्वभाव देवराज की छठी पीढ़ी में होने वाले राजा जेसल के समय में भी वर्तमान था, जब जैसलनगर और किला पहले से अधिक दृढ़ हो गया था। इस जाति के इस स्वभाव ने इतना आतंक मचाया कि सन् १२९४ में बादशाह अलाउद्दीन को इस जाति को दबाने के लिए शाही सेना भेजनी पड़ी। शाही सेना ने इनके नगर को बिलकुल वीरान बना दिया। इसके पश्चात् रावल सबलसिंह के राजा होने तक की कोई ऐसी घटना नहीं है जो उल्लेख योग्य हो। रावल सबल सिंह, जेसल की पचीसवीं पीढ़ी में हुआ था। इसी ने सर्वप्रथम जैसलमेर के इतिहास में मुसलमानों का आधिपत्य

  • १८४ - स्वीकार किया । इसके समय दिल्ली का पादशाह शाहजहाँ था । इसने शाहजहाँ का आधिपत्य स्वीकार कर यद्यपि अपने राज्य को दृढ़ बनाया फिर भी राज्य की भाग्य रवि अस्त ही रही, और इसकी सातवीं पीढ़ी में होने वाले राजा रावल मूल राज के समय तो ऐसी टूटी कि इस राज्य ने फिर स्वतन्त्रता का मुँह नहीं देखा । मूलराज जैसलमेर की राजगद्दी पर सन् १७६२ में बैठा था । उसके राज्यकाल में राज्य का सारा प्रबन्ध उसके एक मंत्री सलीम सिंह द्वारा होता था । यह मन्त्री अपने काले कारनामों और अपनी क्रूरता के लिए विख्यात था । अस्तु, राज्य की व्यवस्था उचित रूप में नहीं हुई । सन् १८१८ में इस राज्य के साथ अँगरेज शासकों की सन्धि सम्पन्न हुई । (Rajputana gazetter Vol II P 167) जैसलमेर का नाम प्राचीन शिलालेखों में 'वल्लभटल', वल्लदेश और माड भी मिलता है । यहाँ के लोग इसे अब 'माड' भी कहते हैं । यहाँ की स्त्रियाँ सुन्दर होती हैं । कहा भी जाता है कि — मारवाड़ नर नीपने, नारी जैसलमेर । सिंधी तुरङ्गी सांतरां, करहक बीकानेर ॥ अर्थात् मारवाड़-जोधपुर में पुरुष, जैसलमेर में स्त्रियाँ, सिंध में घोड़े और बीकानेर में ऊँट अच्छे मिलते हैं । 'चम्पावती' यह नगर चम्पावती देवी के नाम पर वहाँ के राजा "साल" के कश्मीर के राजा अनन्त द्वारा ई० सन् १०२८ और १०३१ के बीच मारे जाने पर उसके पुत्र द्वारा बसाया गया था । "चम्पा" के नाम से आज भी यह स्थान काश्मीर प्रान्त में प्रसिद्ध है । "चम्पा" एक बहुत बड़ा जिला है । यह लाहौल और कास्त वार के मध्य रावी और चनाब की घाटी पर बसा हुआ है । ह्वेनस्यांग ने अपने यात्रा-वर्णन में इसका कोई उल्लेख नहीं किया है । जिससे यह सिद्ध होता है कि उस समय यह काश्मीर की हद के भीतर था और इसकी कोई अलग स्थिति नहीं थी । लेकिन कुछ ऐसे ऐतिहासिक चिह्न इस जिले में वर्तमान हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि यह एक पुराना नगर था और इसका अपना अलग स्थिति थी । इस जिले में प्राप्त होने वाले सुन्दर मन्दिरों के समूह तथा आदमकद काँसे का एक साँड इसके प्राचीन राजाओं के धन वैभव के साक्षी हैं । शिला-लेखों में प्राप्त वार्त्ताओं से ज्ञात है कि ये कला की वस्तुएँ ६वीं और १०वीं शताब्दी की हैं । काश्मीर के जातीय इतिहास में इस स्थान का नाम "चम्पा" अनेक स्थानों पर आया है । काश्मीर के राजवंश वाले चम्पा वंश के लोगों के
  • १८५ - साथ आज भी वैवाहिक सम्बन्ध करते हैं । मुसलमानों के आक्रमण-काल में कुछ समय के लिए यह नगर स्वतन्त्र हो गया था । लेकिन महाराज गुलाब सिंह ने पुनः इसे बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में काश्मीर में मिला लिया था । 'गंगा' समुद्र की सतह से १३८०० फुट की ऊँचाई पर हिमाच्छादित उत्तरी हिमा- लय के गंगोत्री नामक स्थान से गंगा का उद्गम माना जाता है । अपना नाम गंगा धारण करने के पहले ये उत्तर-पश्चिम से आती हुई जाह्नवी और इसके पश्चात् ही अलकनन्दा को भेंटती हैं और तब ये तीनों धाराएँ एक साथ मिल कर गंगा की धारा कहाती हैं । और तब सुखो के पास हिमालय पर्वत को भेदती हुई ये दक्षिण और पश्चिम दिशा में हरिद्वार की ओर घूमती हैं । इस स्थान से ये दक्षिण और दक्षिण पूर्व-उत्तरप्रदेश के मेरठ और रोहिलखण्ड जिलों में प्रवेश करती हैं, और इसके बाद रोहिलखण्ड को आगरा से अलग करती हुई ये फर्रूखाबाद जिले में जाती हैं । इसके बाद अवध की दक्षिण-पश्चिमी सीमा को बनाती हुई ये इलाहाबाद, मिर्जापुर, बनारस तथा गाजीपुर और बलिया के जिलों को बंगाल से अलग करती हैं । इस प्रकार उत्तर-प्रदेश के अनेक नगरों और जिलों की सिंचाई का मुख्य साधन बन कर यह बिहार और बंगाल प्रान्तों की ओर बढ़ती है । २५° ३१' उत्तर और ८३° ५२' पूर्व में ये शाहाबाद जिले में प्रवेश कर इसकी सीमा को निर्धारित करती हुई और इस जिले को उत्तर-प्रदेश से अलग करती हुई उत्तरी छोर पर घाघरा और दक्षिणीछोर पर सोन नदी से मिलती हैं । इसके पश्चात् यह पटना शहर की ओर अग्रसर होती है और नेपाल से आने वाली गंडक को अपनी सहचरी बनाती हैं । फिर पूर्व में यह कोसी से मिलकर राजमहाल पर्वत श्रेणियों को पार करती हुई द्रुत गति से दक्षिण की ओर चलती हैं और बंगाल प्रान्त के गौड़ नगर को पवित्र करती हुई समुद्र से भेंट करने के लिए आगे बढ़ती हैं । इस स्थान से करीब बीस मील की दूरी पर इसकी कई एक शाखाएँ फूटती हैं । इनमें से प्रमुख शाखा "पद्मा" के नाम से प्रसिद्ध है । पद्मा का भीषण रूप हमें वर्षा काल में दिखाई पड़ता है, जब जहाजरानी को भी इसकी तीक्ष्ण धारा को पार करना कठिन हो जाता है । इस प्रकार गंगा २३°१३' उत्तर और ६०°३३' पूर्व में मेघना नदी को योग देती हुई बंगाल में ५४० मील तथा अपने उद्गम स्थान से १५५७ मील की दूरी तै करके समुद्र में प्रवेश करती है ।
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इसके किनारे पर बसे हुए प्रमुख नगर हैं उत्तर प्रदेश में हरिद्वार, मोरों, कानपुर, प्रयाग, मिर्जापुर तथा बनारस, बिहार का पटना एवं बंगाल का कलकत्ता। गंगा का एक या दो अन्य नदियों से मिलन अथवा उसका समुद्र में मिलन हिन्दुओं का तीर्थ स्थान है। प्रयाग में जहाँ यह यमुना और सरस्वती से मिलती है, आज भी कुम्भ पर्व का आयोजन होता है और लाखों नर नारी इस अवसर पर त्रिवेणी की धारा में स्नान कर अपने पापों का क्षय करते हैं। इसी प्रकार बंगाल की खाड़ी में भी जहाँ गंगा समुद्र से मिलती है प्रत्येक वर्ष गंगा सागर का मेला आयोजित होता है और लाखों नर नारियाँ एकत्र होते हैं और गंगा की धारा में स्नान कर पुण्य लाभ करती हैं। वैदिक साहित्य में तो कम लेकिन पुराणों में गंगा की अपार महिमा का वर्णन है। ऐसा कहा जाता है कि सूर्यवंशी राजा सगर ने किसी समय अश्व- मेध यज्ञ आयोजित किया था। यज्ञ में विघ्न डालने की इच्छा से इन्द्र ने राजा सगर के अश्वमेध के घोड़े को पातालपुरी में कपिलदेव मुनि के आश्रम में चुरा दिया। राजा सगर की एक रानी से उत्पन्न साठ हजार पुत्र घोड़े को खोजते खोजते मुनि के आश्रम में पहुँचे और यह समझकर कि मुनि के द्वारा ही यज्ञ का अश्व चुरा कर रख लिया गया है, मुनि के प्रति अपशब्दों का व्यवहार किया और उनके शाप से क्षार हो गये। राजा सगर की दूसरी रानी के पुत्र असमंजस के पुत्र अंशुमान ने गरुड के उपदेशानुसार ब्रह्मलोक से पाताल में अपने पूर्वजों को तारने के लिए गंगा को लाने की अनेक चेष्टा की लेकिन उनकी चेष्टा विफल हुई। अन्त में उनके प्रपौत्र महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ गंगा को पृथ्वी पर लाने में समर्थ हुए और उनके पूर्वज जो ऋषि के शाप से क्षार हो गये थे, गंगा की पावन धारा के स्पर्श होते ही मुक्त हो गए। पौराणिक युग में यदि गंगा की पवित्र धारा ने राजा के साठ हजार पुत्रों का उद्धार किया तो वर्तमान युग भी उनकी धारा से कम लाभ नहीं उठा रहा है। चूँकि भारत कृषिप्रधान देश है इसलिए इसे अन्नादि उपजाने के लिए सदा जल की आवश्यकता रहती है। गंगा की नहरों द्वारा यह कार्य बड़े सुविधापूर्वक हो रहा है। नहर की एक शाखा द्वारा एटा, मैनपुरी, फर्रुखाबाद, इटावा, कानपुर, फतेहपुर, इलाहाबाद जिलों की प्राय ८३२००० एकड़ भूमि सींची जाती है तथा इसकी दूसरी शाखा द्वारा भी प्राय इतने ही एकड़ भूमि सींची जाती है। रेलों की लाइन के बिछने के पहले तथा उसके बाद भी गंगा यातायात का प्रधान साधन रही है।

  • ३८७ - पुराणों में गंगा के चार नाम और मिलते हैं: - १ सोता, २ अलकनन्दा, ३ चक्षु तथा ४ भद्रा। एक कथा के अनुसार जह्नु ऋषि ने इनके सम्पूर्ण जल को पान कर लिया था, और फिर कान के मार्ग से बाहर किया था, इसलिए इनका नाम जाह्नवी पड़ा। एक दूसरी कथा के अनुसार अगस्त्य ऋषि द्वारा समुद्र के जल को सोख लेने के बाद गंगा ने ही समुद्र को जल का दान किया था—ऋग्वेद तथा सपादलक्ष ब्राह्मण में गंगा का उल्लेख देवधुनि या देव- नदी के नाम से हुआ है। तैत्तिरीय आरण्यक में कहा गया है कि गंगा और यमुना के मध्य रहने वाले लोग विशेष आदर के पात्र हैं। हरिवंश के अनुसार पुरूरवा तथा उर्वशी ने मन्दाकिनी, जिनका आधुनिक नाम गंगा है, के किनारे ५ वर्षों तक वास किया था। मेगास्थनीज़ लिखता है कि "by the two ( the Ganges & the Indus) the Ganga is much the larger . It receives besides, the river sones and the sittokatis the solomatis which are also navigable, and also the Kondochates & the sambos and the magou & the Agoramio & the omalis moreover their fall into it the Karmenasas, a great river, and the Kakanthis and the Anomatio ( Mccrindle Ancient India P P 190—91 ) कुडाल यह सावन्तवाडी के रईस का दुर्ग था। इस दुर्ग के सम्बन्ध में यह छोड़ कर कि इसे सन् १६६१ ई० में शिवाजी ने जीत लिया था और कुछ भी इति- हास में उपलब्ध नहीं है। हिमालय भारतवर्ष का उत्तरी सीमान्त हिमालय अपनी उत्तुंग चोटियों के लिए केवल भारतवर्ष में ही नहीं वरन् सारे संसार में प्रसिद्ध है। इस पर्वत श्रेणी के लिए प्रयुक्त शब्द 'हिमालय' इसके नाम और अर्थ का अक्षरशः द्योतक है। हिमालय का अर्थ 'हिमस्य + आलयः' 'हिम का घर' या हिमानाम् + आलय 'हिम के रहने का घर' होता है। प्राचीन भूगोल वेत्ताओ ने इसका नाम इमौस या दियमौस और हैमोडास दिया है। इन नामों के द्वारा ऐसा पता चलता है कि ये नाम इस पर्वत श्रेणी के पूर्वी और पश्चिमी हिस्से के लोगों द्वारा दिए गए हैं। हैमोडास संस्कृत शब्द हिमरत् (हेमोत) से निकला है, जिसका अर्थ हिमाच्छादित होता है। अलेक्जेण्डर के साथ आने वाले ग्रीक निवासियों ने इसे भारतीय काकेशस के नाम से प्रसिद्ध किया था।
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हिमालय की चौहद्दी के सम्बन्ध में श्री भागवत में ५ वें स्कन्ध के १६वें अध्याय में लिखा है :—'एवं दक्षिणेनेलावृतं निषधो हेमकूटो हिमालयः इति प्रागायता यथा नीलादयः । अयुतयोजनोत्सेधा हरिवर्षकिम्पुरुषभारतानां यथामसंख्यम् ।' अर्थात् इसका विस्तार जहाँ भागवत पुराण के अनुसार सहस्र योजन बताया गया है, वहीं आज के वैज्ञानिक युग में इसकी सीमा को नापने- जोखने का कार्य हो रहा है और इसकी चौहद्दी को निर्धारित करने का प्रयास जारी है। सफलता कहाँ तक मिलेगी कहा नहीं जा सकता। यों कहा जा सकता है कि इसके उत्तरी-पश्चिमी छोर पर काश्मीर और जम्मू राज्य का आधे से अधिक हिस्सा है। इसके पूर्व में उत्तर-प्रदेश, कुमायूँ तथा टेहरी राज्य हैं। इनके अतिरिक्त नेपाल, भूटान तथा सिक्किम के वे राज्य हैं, जो भारतवर्ष की सीमा में सम्मिलित नहीं हैं। हिमालय भारतवर्ष की प्रायः सभी प्रसिद्ध नदियां यथा गंगा, यमुना, शारदा या काली आदि नदियों का उद्गम हिमालय के उत्तरी पर्वत श्रेणी है। 'करनाली' नदी का, जो घाघरा के नाम से भारत में प्रसिद्ध है, उद्गम स्थान उत्तर पर्वत-श्रेणियों से दूर तिब्बत से है। हिमालय की प्रसिद्ध चोटियों में एवरेस्ट चोटियाँ २६००२ फुट, नागा पर्वत २६१८२ फुट, नन्दादेवी २५६६१ फुट, त्रिशूल २३३८२ फुट, पाचौखो २२६७३ फुट तथा नन्दकोट २२५३८ फुट हैं। हिमालय की तराइयों में विभिन्न प्रकार के लोग पाए जाते हैं। काश्मीर में लद्दाख से लेकर भूटान तक हिन्दचीन के लोग ऊपरी हिस्सा में ही पाये जाते हैं, लेकिन सिक्किम, दार्जिलिंग और भूटान में ये लोग इन देशों के निचले भागों में भी वर्तमान हैं। हिमालय का एक यही ऐसा हिस्सा है जहाँ बौद्ध धर्म जीवित रूप में वर्तमान है। मुसलमानों ने इस भाग में इस्लाम धर्म के प्रचार का यथेष्ट प्रयत्न किया लेकिन यहाँ का जलवायु तथा प्राकृतिक असुविधाओं ने सर्वदा उनके प्रयत्न को निष्फल बनाया। १४ वां शताब्दी में मुलतान सिकन्दर ने इस्लाम धर्म का प्रचार तलवार के जोर पर इन हिस्सों में करना आरम्भ किया लेकिन काश्मीर प्रान्त को छोड़कर इस धर्म का प्रचार ओर कहीं नहीं हो सका। जम्मू तथा हिमालय की तराई में उत्तर प्रदेश और पंजाब के हिस्सों में हिन्दू धर्म को ही प्रधानता है। नेपाल में भी राज-परिवार का धर्म हिन्दू ही है। यद्यपि यहाँ हिन्दू धर्म के साथ ही साथ बौद्ध धर्म का प्रचार भी यथेष्ट हुआ है। यहाँ के जिन हिस्सों में हिन्दू धर्म की प्रधानता है वहाँ के

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लोगों की भाषा पहाड़ी है। जो राजस्थानी से मिलती-जुलती है, जिससे यह सिद्ध होता है कि इन स्थानों के रहने वालों के पूर्वज भारतवर्ष से ही आए थे। हिमालय के कुमायूँ प्रदेश के रहने वाले लोग बड़े लजाधुर प्रकृति के हैं और वे सभ्य जगत् के लोगों से मिलने-जुलने में बहुत शर्माते हैं। इस प्रकार के लोग नेपाल के कुछ हिस्सों में भी पाए जाते हैं। लेकिन उनके सम्बन्ध में विशेष नहीं कहा जा सकता। व्यापारिक दृष्टि से हिमालय में उत्पन्न होने वाले अनाजों का कोई विशेष स्थान नहीं है। चावल, गेहूँ, जौ और मडुआ यहाँ की मुख्य उपज है। आलू की खेती भी कुमायूँ प्रदेश में होता है। कुल्लू प्रदेश में सेब, पीच आदि फल भी सफलतापूर्वक उपगाये जाते हैं। हिमालय के इन प्रदेशों में खेती वर्ष में केवल एक बार ही हो सकती है। चाय के बगीचे १६ वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में कुमायूँ प्रदेश में अधिकता से लगाये गए थे लेकिन इस शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ये बगीचे कागड़ा और दार्जिलिंग की सम्पत्ति हो गये हैं। दार्जिलिंग में 'कुनाइन' बनाने के लिये सिनकोना की भी खेती होती है। हिमालय की तराई में शाल, सीसम, देवदार, चीड़ आदि के जंगल बहुत पाए जाते हैं तथा पूर्वी हिमालय में जगली रबर भी पाया जाता है जो कि 'असम' में बिक्री हेतु आता है। हिमालय का पुराना नाम 'हेमवात', 'हिमवान्', 'हिमाचल' 'हिमवत्प्रदेश', 'हिमाद्रि' तथा 'हिमवात' है। कालिका पुराण में इसका उल्लेख पर्वतराज तथा कुमारसम्भव में 'नगाधिराज' के नाम से हुआ है। महाभारत के वनपर्व में लिखा है कि हिमवात प्रदेश नेपाल के ठीक पश्चिम दिशा की ओर बसा हुआ है और यह गंगा, यमुना, सतलज आदि नदियों का उद्गम स्थान है। 'मा र्कण्डेय पुराण, 'महाभारत' तथा 'कुमारसम्भव' के अनुसार यह पहाड़ एक समुद्र से दूसरे समुद्र तक 'कार्मुकस्य यथा गुणा.' के समान फैला हुआ है। 'कुणालजातक' के अनुसार हिमालय प्रदेश का प्रसार ऊँचाई में ५०० लोग तथा चौड़ाई में ३००० लीग माना गया है। कैलास, जिनका उल्लेख संस्कृत साहित्य में अनेक स्थलों पर है, हिमालय पर्वत श्रेणी के मध्य भाग के उत्तर में स्थित है। बौद्ध ग्रन्थों में हिमालय के सात बड़ी-बड़ी झीलों का उल्लेख मिलता है। उनके नाम हैं-अरावणमुण्ड, रवशर, छदन्त, कुणाल, मन्दाकिनी, अनोतत्त तथा सीहप्पपात। महाभारत के सभापर्व और वनपर्व के अनुसार 'मैनाक' पर्वत भी हिमालय का एक हिस्सा था जो कैलास के समीप स्थित था।

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साम्भर सम्भैर नगर जोधपुर और जयपुर राज्यों की सीमा के अन्दर राजपूताने में २६°५५ उत्तर तथा ७५°११ पूर्व साभर झील के किनारे बसा हुआ है। आधु- निक नगर की प्रायः सभी उपयोगी वस्तुयों, जैसे तार घर, विद्यालय, अस्पताल आदि से यह नगर सुसज्ज है। यह नगर चौहान राजपूतों की ८ वीं शताब्दी से ही प्रधान राजधानी माना जाता है। अन्तिम हिन्दू राजा पृथ्वीराज चौहान साभर राय अर्थात् साभर के महाप्रभु कहलाते थे। इतिहास से ज्ञात होता है कि यह नगर मुसलमान बादशाहों के अधिकार में १३ वीं शताब्दी से सन् १७०८ ई० तक रहा, जब कि यह जोधपुर और जयपुर के शासन-कर्त्ताओं द्वारा पुनः उनसे ले लिया गया। साभर झील यहाँ की प्रमुख झील है। यह झील जयपुर और जोधपुर राज्यों के छोर पर २६°५३ तथा २७°२ उत्तर एव ७४°५४ और ७५°१४ पूर्व अजमेर से ५१ मील उत्तर पूर्व तथा दिल्ली से २३० मील दक्षिण पश्चिम बना हुआ है। यह झील समुद्र की सतह से करीब १२०० फुट की ऊँचाई पर है। जब यह भरी रहती है तो इसका क्षेत्रफल करीब ६० वर्गमील हो जाता है। गर्मी के दिनों में यदि कोई इसके एक छोर पर खड़ा होकर दूसरे छोर पर दृष्टि डाले तो यह उसे एक अति विशाल हिम का टुकड़ा नज़र आयगा। लेकिन सचमुच में यह हिम का टुकड़ा नहीं वरन् नमक का शान्त और स्थिर समुद्र है, जो देखने में हिम के टुकड़े के समान दिखाई पड़ता है। किंवदंती प्रसिद्ध है कि शाकभरी देवी ने अपनी पूजा से प्रसन्न होकर एक घने जंगल को विशाल चाँदी के टुकड़े में परिवर्तित कर दिया था और बाद में वहाँ के निवा सियों द्वारा प्रार्थना करने पर उसी स्थान को नमक की झील के रूप में बदल दिया। इसलिए इस झील का नाम 'साम्बर', साकभर का परिवर्तित रूप, पड़ा। यह कथा ६ ठी शताब्दी की है। इतिहास बताता है कि अकबर के राज्य काल से लेकर अहमदशाह के समय तक मुसलमान बादशाहों के हाथ में रहा। अब यह जयपुर और जोधपुर के महाराजाओं के हाथ में है। इसका पश्चिमी हिस्सा पूरा महाराज जोधपुर तथा पूर्वी हिस्सा साभर नगर के साथ जोधपुर और जयपुर दोनों महाराजाओं के हाथ में है। कुछ समय के लिए यह झील मराठों और अमीर खाँ के हाथ में चली गयी थी, जब कि १८३५ से १८४३ तक अगरेजों ने इसे शेखावटी में शान्ति स्थापनार्थ खर्चे के निमित्त अपने अधिकार में रखा था। अन्त में १८७० से यह झील पूर्ण रूप से अगरेजों को लीज पर दे दी गई। और जयपुर तथा

  • १६१ - जोधपुर के महाराज-गण केवल रायल्टी तथा कुछ वार्षिक रुपये पाने के अधि- कारी रह गए । केदारनाथ केदारनाथ ज्योतिर्लिंग हिमालय पर्वत पर स्थित है । यह अति शीतल स्थान है । हिम का साम्राज्य वर्ष के प्रत्येक माह में रहता है । इसकी ऊँचाई २२८३५ फुट है । यहाँ श्री केदारनाथ जी का अति प्राचीन मन्दिर है । ऐसा कहा जाता है कि यह मन्दिर पाण्डवों के समय का बना हुआ है । यहाँ की भूमि जलमयी है । यह मन्दाकिनी गंगा का उद्गम स्थान है । पवित्र स्थान के एक ओर मन्दाकिनी और दूसरी ओर सरस्वती नदी है जो हिमालय से निकलती है । इस प्राचीन मन्दिर की मरम्मत कुछ काल पूर्व महाराज नेपाल ओर ग्वालियर ने करवाई थी जिसके कारण अभी तक मन्दिर सुरक्षित है । मन्दिर के द्वार पर द्वारपाल खड़े हैं और दीवार पर चारों तरफ पाँचों पाण्डव, द्रोपदी, कुन्ती, पार्वती, लक्ष्मी आदि की मूर्तियों बनी हुई हैं । मन्दिर में जाते ही पहले दालान में इसके दाहिनी ओर लक्ष्मण और जानकी जी सहित भगवान् रामचन्द्र जी के दर्शन होते हैं । बीच में नन्दी ओर गरुड जी हैं । मन्दिर के भीतरी भाग में एक ओर पार्वती जी दूसरी ओर लक्ष्मी जी मूर्तियां हैं । मन्दिर के अन्दर भगवान् शंकर के पीठ भाग का दर्शन होता है । मूर्त्ति लिंग सदृश नहीं है । किन्तु एक टीले के समान है । लोगों का विश्वास है कि भगवान थक कर यहाँ विश्राम के हेतु लेट गये थे । मूर्त्ति इतनी बड़ी है कि दर्शनार्थियों को खड़े होकर घृत का स्नान कराना पड़ता है । मन्दिर का भीतरी भाग अँधेरा है और रातदिन घी का दीपक जला करता है । महाभारत के अध्याय ८३ के ७२ वें श्लोक में केदारनाथ का उल्लेख मिलता है । वाराणसी वाराणसी भारतवर्ष में हिन्दुओं के तीर्थ स्थानों में से एक पवित्र तीर्थ स्थान माना जाता है । पाणिनी की अष्टाध्यायी, पतंजलि के महाभाष्य, भागवत पुराण, स्कन्द पुराण तथा योगिनीतन्त्र में इस पवित्र स्थान का उल्लेख मिलता है । कूर्म पुराण के अनुसार यह नगर प्रयाग से ८० मील नीचे गंगा के उत्तरी किनारे पर वरणा और असी नदियों के बीच बसा हुआ है । चूंकि यह नगर वरणा और असी नदियों के बीच है इसलिये इस नगर का नाम वाराणसी है ।
  • १६२ - जैनों के "विविधतीर्थ कल्प" के अनुसार वाराणसी चार भागों में विभाजित है । १—देव वाराणसी, जहाँ श्री विश्वनाथ का मन्दिर स्थापित है । २— राजधानी वाराणसी—जहाँ यवनों का वास है । ३—मदन वाराणसी और ४—विजय वाराणसी । जैनियों के मतानुसार पार्श्वनाथ का जन्म काशी में ही हुआ था । चीनदेश के यात्रियों द्वारा वाराणसी पो-लो निस्सी समझा जाता है । उन लोगों के अनुसार इसका क्षेत्रफल ४००० ली माना गया है और इस नगर की बस्ती घनी मानी गई है । उनके मतानुसार इसके मन्दिरों में ३० संघाराम और १०० देवालय हैं । वेदों और पुराणों में अनेक स्थानों पर वाराणसी या काशी का उल्लेख मिलता है । महाभारत के "अनुशासन पर्व" के अनुसार इस नगर के स्थापित करने वाले देवदास किसी युद्ध में हराए जाने के बाद जंगल में भाग गये थे तथा "उद्योग पर्व" के अनुसार भीमसेन के पुत्र इन्हीं देवदास को प्रवर्त्तन नामक एक पुत्र भी था । देवदास की जीवनी के सम्बन्ध में "हरिवंश" में भी बहुत कुछ हमें मिलता है । यद्यपि हिन्दू और जैन धर्म ग्रन्थों में अनेक स्थलों पर काशी का उल्लेख है या अनेक कथाएँ भी मिलती हैं फिर भी इस नगरी की राजनैतिक अवस्था का स्पष्ट वर्णन हमें बौद्ध ग्रन्थों से प्राप्त होता है । बौद्ध काल में काशी ने अपना राजनीतिक महत्व खो दिया था क्योंकि कोशल के राजा प्रसेनजित के समय में काशी कोशल में मिला ली गयी थी । प्रसेनजित के पिता महाकोशल ने अपनी पुत्री कोशलदेवी के राजा बिम्बसार के साथ पाणिग्रहण के अवसर पर काशी नगरी को दहेज स्वरूप दिया था । इसके पश्चात् उत्तरी भारत के शक्तिशाली राजा अजातशत्रु द्वारा यह नगर पूर्ण रूप से जीत लिया गया था और मगध राज्य में मिला लिया गया था । 'गउड' १६ वीं शताब्दी के अन्त तक 'गौड' बंग प्रदेश की राजधानी हिन्दू और मुसलमान राजाओं के शासन-काल में रह चुका है । जैनियों के आचारागसूत्र के अनुसार गौड देश रेशमी कपडों (दुकूल) के लिए प्रसिद्ध था । कुछ लोगों के मतानुसार "गौड़" नाम "गुड़" से निकला है, क्योंकि किसी जमाने में यह देश "गुड़" के व्यापार का केन्द्र समझा जाता था । आज भी मालदा शहर से १० मील की दूरी पर गौड के भग्नावशेष अपने पुरातनपने का

१३ - १६३ - परिचय दे रहे हैं। यह एक पुराना शहर है, जो गंगा और महानन्दा के संगम पर बसा हुआ है। पद्मपुराण में गौड़ देश का उल्लेख मिलता है और इस देश के राजा का नाम "नरसिंह" था, ऐसा पाया जाता है। पाल वंश के राजाओं ने गौड़ प्रदेश की राजधानी कालिन्दी नदी के किनारे "रामावती" नगरी को बनायी थी। लेकिन इस राजधानी का अब कुछ भी पता नहीं चलता। गौड के राजा लक्ष्मण सेन द्वारा बनायी गयी लक्ष्मणावती बहुत काल तक सेन वंश, और मुसलमान राजाओं की राजधानी रही। सेन वंश के राजा वल्लालसेन के द्वारा गौड में "वल्लालवाडी" नामक एक दुर्ग बनवाया गया था, जिसका भग्नावशेष अब शाहदुल्लापुर के समीप प्राप्त है। आज भी गौड के समीप श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा पवित्र किए हुए स्थान 'रामकेलि' तथा 'रूप' और 'सनातन' के रहने के स्थान रूप सागर, तालाब, कदम्ब का वृक्ष, कुछ कूप एवं मदनमोहन जी का पुरातन मन्दिर पाये जाते हैं। मुसलमान काल के कुछ उल्लेख योग्य स्थान जैसे जामज नमियों की मस्जिद, हवेली खास का भग्ना- वशेष, सोना मसजिद, फीरोज मीनार आदि यहाँ वर्तमान हैं। इनके अतिरिक्त गौडेश्वरी देवी, जहरवासिनी देवी तथा शिव के पुराने मन्दिर भी अभी यहाँ वर्तमान हैं। हर्ष के काल से लेकर लक्ष्मणसेन के काल तक एक नहीं अनेक ऐसे शिलालेख तथा ताम्रपत्र प्राप्त हो चुके हैं, जो गौड देश के प्राचीन इतिहास पर पूर्ण रूप से प्रकाश डालते हैं। इन शिलालेखों और ताम्रपत्रों में से मालवा के राजाओं के नागपुर के शिलालेख 'ई० सन् ११०४-११०५' का उल्लेख इसलिए आवश्यक है कि बीसलदेव रासो में गौड देश के उल्लेख का सूत्र इसके द्वारा स्थापित हो जाता है। इस शिला लेख के द्वारा पता चलता है कि परमार राजा लक्ष्मदेव ने गौड के राजा को हराया था। 'उडीसा' उड़ीसा प्रदेश गंगा नदी के मुहाने से लेकर कृष्णा नदी के मुहाने तक फैला हुआ है। कलिंग के नाम से इस प्रदेश का उल्लेख संस्कृत ग्रन्थों में अनेक स्थलों पर किया गया है। यह भारत के पाँच प्राचीन राज्यों में से एक है। इसकी पुरानी राजधानी अभी भी नगर से आध मील की दूरी पर कलिंगपट्टनम् में वर्तमान है। राज्य दो भागों विभाजित है। गोदावरी के मुहाने (Delta) तक के स्थानो को कलिंग कहा जाता है तथा उत्तर की ओर महानदी के मुहाने तक के स्थान एक अलग प्रदेश बनाते हैं, जिन्हें ओड्र या उत्कल कहा जाता