बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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इसके किनारे पर बसे हुए प्रमुख नगर हैं उत्तर प्रदेश में हरिद्वार, मोरों, कानपुर, प्रयाग, मिर्जापुर तथा बनारस, बिहार का पटना एवं बंगाल का कलकत्ता। गंगा का एक या दो अन्य नदियों से मिलन अथवा उसका समुद्र में मिलन हिन्दुओं का तीर्थ स्थान है। प्रयाग में जहाँ यह यमुना और सरस्वती से मिलती है, आज भी कुम्भ पर्व का आयोजन होता है और लाखों नर नारी इस अवसर पर त्रिवेणी की धारा में स्नान कर अपने पापों का क्षय करते हैं। इसी प्रकार बंगाल की खाड़ी में भी जहाँ गंगा समुद्र से मिलती है प्रत्येक वर्ष गंगा सागर का मेला आयोजित होता है और लाखों नर नारियाँ एकत्र होते हैं और गंगा की धारा में स्नान कर पुण्य लाभ करती हैं। वैदिक साहित्य में तो कम लेकिन पुराणों में गंगा की अपार महिमा का वर्णन है। ऐसा कहा जाता है कि सूर्यवंशी राजा सगर ने किसी समय अश्व- मेध यज्ञ आयोजित किया था। यज्ञ में विघ्न डालने की इच्छा से इन्द्र ने राजा सगर के अश्वमेध के घोड़े को पातालपुरी में कपिलदेव मुनि के आश्रम में चुरा दिया। राजा सगर की एक रानी से उत्पन्न साठ हजार पुत्र घोड़े को खोजते खोजते मुनि के आश्रम में पहुँचे और यह समझकर कि मुनि के द्वारा ही यज्ञ का अश्व चुरा कर रख लिया गया है, मुनि के प्रति अपशब्दों का व्यवहार किया और उनके शाप से क्षार हो गये। राजा सगर की दूसरी रानी के पुत्र असमंजस के पुत्र अंशुमान ने गरुड के उपदेशानुसार ब्रह्मलोक से पाताल में अपने पूर्वजों को तारने के लिए गंगा को लाने की अनेक चेष्टा की लेकिन उनकी चेष्टा विफल हुई। अन्त में उनके प्रपौत्र महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ गंगा को पृथ्वी पर लाने में समर्थ हुए और उनके पूर्वज जो ऋषि के शाप से क्षार हो गये थे, गंगा की पावन धारा के स्पर्श होते ही मुक्त हो गए। पौराणिक युग में यदि गंगा की पवित्र धारा ने राजा के साठ हजार पुत्रों का उद्धार किया तो वर्तमान युग भी उनकी धारा से कम लाभ नहीं उठा रहा है। चूँकि भारत कृषिप्रधान देश है इसलिए इसे अन्नादि उपजाने के लिए सदा जल की आवश्यकता रहती है। गंगा की नहरों द्वारा यह कार्य बड़े सुविधापूर्वक हो रहा है। नहर की एक शाखा द्वारा एटा, मैनपुरी, फर्रुखाबाद, इटावा, कानपुर, फतेहपुर, इलाहाबाद जिलों की प्राय ८३२००० एकड़ भूमि सींची जाती है तथा इसकी दूसरी शाखा द्वारा भी प्राय इतने ही एकड़ भूमि सींची जाती है। रेलों की लाइन के बिछने के पहले तथा उसके बाद भी गंगा यातायात का प्रधान साधन रही है।