भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 315 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 288
  • १८५ - साथ आज भी वैवाहिक सम्बन्ध करते हैं । मुसलमानों के आक्रमण-काल में कुछ समय के लिए यह नगर स्वतन्त्र हो गया था । लेकिन महाराज गुलाब सिंह ने पुनः इसे बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में काश्मीर में मिला लिया था । 'गंगा' समुद्र की सतह से १३८०० फुट की ऊँचाई पर हिमाच्छादित उत्तरी हिमा- लय के गंगोत्री नामक स्थान से गंगा का उद्गम माना जाता है । अपना नाम गंगा धारण करने के पहले ये उत्तर-पश्चिम से आती हुई जाह्नवी और इसके पश्चात् ही अलकनन्दा को भेंटती हैं और तब ये तीनों धाराएँ एक साथ मिल कर गंगा की धारा कहाती हैं । और तब सुखो के पास हिमालय पर्वत को भेदती हुई ये दक्षिण और पश्चिम दिशा में हरिद्वार की ओर घूमती हैं । इस स्थान से ये दक्षिण और दक्षिण पूर्व-उत्तरप्रदेश के मेरठ और रोहिलखण्ड जिलों में प्रवेश करती हैं, और इसके बाद रोहिलखण्ड को आगरा से अलग करती हुई ये फर्रूखाबाद जिले में जाती हैं । इसके बाद अवध की दक्षिण-पश्चिमी सीमा को बनाती हुई ये इलाहाबाद, मिर्जापुर, बनारस तथा गाजीपुर और बलिया के जिलों को बंगाल से अलग करती हैं । इस प्रकार उत्तर-प्रदेश के अनेक नगरों और जिलों की सिंचाई का मुख्य साधन बन कर यह बिहार और बंगाल प्रान्तों की ओर बढ़ती है । २५° ३१' उत्तर और ८३° ५२' पूर्व में ये शाहाबाद जिले में प्रवेश कर इसकी सीमा को निर्धारित करती हुई और इस जिले को उत्तर-प्रदेश से अलग करती हुई उत्तरी छोर पर घाघरा और दक्षिणीछोर पर सोन नदी से मिलती हैं । इसके पश्चात् यह पटना शहर की ओर अग्रसर होती है और नेपाल से आने वाली गंडक को अपनी सहचरी बनाती हैं । फिर पूर्व में यह कोसी से मिलकर राजमहाल पर्वत श्रेणियों को पार करती हुई द्रुत गति से दक्षिण की ओर चलती हैं और बंगाल प्रान्त के गौड़ नगर को पवित्र करती हुई समुद्र से भेंट करने के लिए आगे बढ़ती हैं । इस स्थान से करीब बीस मील की दूरी पर इसकी कई एक शाखाएँ फूटती हैं । इनमें से प्रमुख शाखा "पद्मा" के नाम से प्रसिद्ध है । पद्मा का भीषण रूप हमें वर्षा काल में दिखाई पड़ता है, जब जहाजरानी को भी इसकी तीक्ष्ण धारा को पार करना कठिन हो जाता है । इस प्रकार गंगा २३°१३' उत्तर और ६०°३३' पूर्व में मेघना नदी को योग देती हुई बंगाल में ५४० मील तथा अपने उद्गम स्थान से १५५७ मील की दूरी तै करके समुद्र में प्रवेश करती है ।