भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 315 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 287
  • १८४ - स्वीकार किया । इसके समय दिल्ली का पादशाह शाहजहाँ था । इसने शाहजहाँ का आधिपत्य स्वीकार कर यद्यपि अपने राज्य को दृढ़ बनाया फिर भी राज्य की भाग्य रवि अस्त ही रही, और इसकी सातवीं पीढ़ी में होने वाले राजा रावल मूल राज के समय तो ऐसी टूटी कि इस राज्य ने फिर स्वतन्त्रता का मुँह नहीं देखा । मूलराज जैसलमेर की राजगद्दी पर सन् १७६२ में बैठा था । उसके राज्यकाल में राज्य का सारा प्रबन्ध उसके एक मंत्री सलीम सिंह द्वारा होता था । यह मन्त्री अपने काले कारनामों और अपनी क्रूरता के लिए विख्यात था । अस्तु, राज्य की व्यवस्था उचित रूप में नहीं हुई । सन् १८१८ में इस राज्य के साथ अँगरेज शासकों की सन्धि सम्पन्न हुई । (Rajputana gazetter Vol II P 167) जैसलमेर का नाम प्राचीन शिलालेखों में 'वल्लभटल', वल्लदेश और माड भी मिलता है । यहाँ के लोग इसे अब 'माड' भी कहते हैं । यहाँ की स्त्रियाँ सुन्दर होती हैं । कहा भी जाता है कि — मारवाड़ नर नीपने, नारी जैसलमेर । सिंधी तुरङ्गी सांतरां, करहक बीकानेर ॥ अर्थात् मारवाड़-जोधपुर में पुरुष, जैसलमेर में स्त्रियाँ, सिंध में घोड़े और बीकानेर में ऊँट अच्छे मिलते हैं । 'चम्पावती' यह नगर चम्पावती देवी के नाम पर वहाँ के राजा "साल" के कश्मीर के राजा अनन्त द्वारा ई० सन् १०२८ और १०३१ के बीच मारे जाने पर उसके पुत्र द्वारा बसाया गया था । "चम्पा" के नाम से आज भी यह स्थान काश्मीर प्रान्त में प्रसिद्ध है । "चम्पा" एक बहुत बड़ा जिला है । यह लाहौल और कास्त वार के मध्य रावी और चनाब की घाटी पर बसा हुआ है । ह्वेनस्यांग ने अपने यात्रा-वर्णन में इसका कोई उल्लेख नहीं किया है । जिससे यह सिद्ध होता है कि उस समय यह काश्मीर की हद के भीतर था और इसकी कोई अलग स्थिति नहीं थी । लेकिन कुछ ऐसे ऐतिहासिक चिह्न इस जिले में वर्तमान हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि यह एक पुराना नगर था और इसका अपना अलग स्थिति थी । इस जिले में प्राप्त होने वाले सुन्दर मन्दिरों के समूह तथा आदमकद काँसे का एक साँड इसके प्राचीन राजाओं के धन वैभव के साक्षी हैं । शिला-लेखों में प्राप्त वार्त्ताओं से ज्ञात है कि ये कला की वस्तुएँ ६वीं और १०वीं शताब्दी की हैं । काश्मीर के जातीय इतिहास में इस स्थान का नाम "चम्पा" अनेक स्थानों पर आया है । काश्मीर के राजवंश वाले चम्पा वंश के लोगों के