बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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के पश्चात् इनके पिता तथा इनके सभी सगे सम्बन्धी एक पहाड़ी जाति द्वारा मार डाले गए थे। ये एक योगी की कृपा से किसी प्रकार बच गये और जैस- लमेर की स्थापना की। रावल की उपाधि भी इन्हीं के समय से प्रचलित हुई। इनके पूर्वजों के इतिहास से ऐसा ज्ञात होता है कि इस वंश की उत्पत्ति भारत के प्रसिद्ध यदुवंशियों से हुई, जिसके नेता कृष्ण थे। कृष्ण की मृत्यु के पश्चात् 'यदु' जाति विभाजित हो गई और भारत के विभिन्न भागों में जाकर बस गई। इनमें से कृष्ण के दो पुत्र सिन्धु नदी के पार उत्तर दिशा की ओर आकर बस गए। कुछ समय के पश्चात् इन्हीं के वंशजों में से कोई एक किसी लड़ाई में मारा गया और यह जाति पुनः दक्षिण दिशा की ओर चली आई, जहाँ गज के लड़के शालिवाहन ने एक नगर की स्थापना की और धीरे धीरे सारे पंजाब प्रान्त पर अपना आधिपत्य जमा लिया। इसी का प्रपौत्र 'भाटी' नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह बड़ा वीर और योद्धा था। इसने अपने बल और शौर्य से आसपास के राजाओं को जीता और तभी से यदुवंश के लोगों ने अपनी पैतृक उपाधि को छोड़कर इस राजा के नाम की उपाधि को धारण किया। पंजाब प्रान्त में भी यह जाति अपनी सत्ता अधिक काल तक नहीं कायम रख सकी। गजनी के राजा ने इस जाति पर आक्रमण कर इस जाति को दक्षिण दिशा की ओर खदेड़ दिया और इस जाति ने सतलज नदी को पार कर भारत की मरुभूमि में प्रवेश किया। यहाँ ही ये लोग बस गये। यहाँ बस जाने के बाद मुसलमानों के आक्रमणों से इस जाति का बराबर मोर्चा लेना पड़ा। मुसलमानों के आक- मणों के अतिरिक्त इस जाति को राज्य के आसपास की बसी हुई जातियों से भी लड़ना पड़ा। ऐसी लड़ाइयों में सबसे बड़ी लड़ाई इस जाति की 'सोदा' जाति वालों से हुई। ऐसे आक्रमणों तथा नित्य के लड़ाई झगड़ों ने इस जाति को लुटेरा बना दिया। इस जाति का यह स्वभाव देवराज की छठी पीढ़ी में होने वाले राजा जेसल के समय में भी वर्तमान था, जब जैसलनगर और किला पहले से अधिक दृढ़ हो गया था। इस जाति के इस स्वभाव ने इतना आतंक मचाया कि सन् १२९४ में बादशाह अलाउद्दीन को इस जाति को दबाने के लिए शाही सेना भेजनी पड़ी। शाही सेना ने इनके नगर को बिलकुल वीरान बना दिया। इसके पश्चात् रावल सबलसिंह के राजा होने तक की कोई ऐसी घटना नहीं है जो उल्लेख योग्य हो। रावल सबल सिंह, जेसल की पचीसवीं पीढ़ी में हुआ था। इसी ने सर्वप्रथम जैसलमेर के इतिहास में मुसलमानों का आधिपत्य