भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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पृष्ठ 279
  • १७६ - (The Ancient Geography of India P P 205 206)। इसके बसाने वाले सूर्यवंशी राजपूत वचन पाल थे, जिनके सम्बन्ध में विशेष बातें नहीं ज्ञात हैं। ऐसा कहा जाता है कि इसको पुनः स्थापित करने वाले गुजरात के राजा अली खाँ थे जिन्हें शङ्कर वर्मा ने सन् ८८३ और ६०१ के बीच पराजित किया था। इन कथाओं के अतिरिक्त यह भी कहा जाता है कि सन् १३०३ में गुजरात पूर्णतया नष्ट हो गया था और गूजरों ने इसे पुनः अकबर के शासन काल में सन् १५८८ में निर्मित किया। बनास बनास नदी उदयपुर राज्य के प्रसिद्ध कुम्भलगढ़ के क़िले से तीन मील दूर की पर्वत श्रेणी से निकल कर उदयपुर, जयपुर, बूंदी, टाक और करौली राज्यों में बहती हुई रामेश्वर तीर्थ ग्वालियर राज्य के पास चम्बल नदी में मिल जाती है। इसकी लम्बाई अनुमान से ३०० मील है। मडोर-मडारोरा-मँडार मडोर जोधपुर नगर से ५ मील उत्तर नागाद्री नामक एक छोटी-सा नदी के किनारे बसा हुआ है। यहाँ का किला एक पहाड़ी पर स्थित है। इसका अस्तित्व ई० सन् की चौथी सदी के आस पास माना जाता है। शिला-लेखों में इसका नाम “माडव्यपुर” मिलता है। “माडव्यपुर का ही अपभ्रंश “मडोर” है। ऐसा कहा जाता है कि माण्डव्य ऋषि का आश्रम यहाँ था। ब्राह्मण वंशी हरिश्चन्द्र के पुत्र भागभट, कवक, रज्जिल और दद्द ने मडोर को जीतकर यहाँ किला बनवाया था, लेकिन काल की गति से वह अब नष्ट हो गया है। यहाँ एक पञ्चकुण्ड नामक स्थान है जहाँ पाँच कुण्ड बने हुए हैं। आज भी हिन्दू गण इसे पवित्र मान कर स्नानार्थ यहाँ जाते हैं। पुरा काल में यह राजाओं के शमशान का स्थान था जो यहाँ के बने हुए रावचूड़ा, राव रणमल, रावजोधा तथा राव गागा के स्मारकों से सिद्ध होता है। मालदेव के समय से शमशान इस स्थान से हटाकर मोतीसिंह के बगीचे के पास रखा गया, जहाँ अन्य छत्र्रियों में महाराज अजीत सिंह की भी एक छत्री है जो उन सब में विशाल और दर्शनीय है। इससे थोड़ी दूर पूर्व में “तानापार” की दरगाह है। नागाद्री नदी के किनारे किनारे यहाँ महाराज तख्त सिंह के काल तक के मारवाड़ के राजाओं, राजकुमारों आदि के स्मारक बने हुए हैं। इस दग्धस्थान के पास महाराज अभयसिंह के समय का “पैंतीस करोड़ देवता” का देवालय भी