बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
पृष्ठ 304, कुल 315 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट (ग) शब्दार्थ 'अ' अठार—अठारह, प्रहारह । अडहव—अनोखा, अद्वितीय । अकुलीणीय— अकुलीन । अवफर--अपशब्द । अगध—दोष । अछइ—है । अगुहार—अगुशारि, अनुकरण करने वाला, समान । अरथ-अर्थ, धन । अस-ऐसा । अपहछ- अपद छू, अपच्छ, अहितकर । अनइ-अरण-जाना, नाग, पानी । अम्हि-मेरे । अवली सवली-सजी धजी । अहिनाण-अभिज्ञान, चिन्ह । अरण—आदि । 'आ' आपणइ-अपने । आभर-आभरण-गहना । आपडीया-आँख । आहेटीय- अहेरी । आखदियउ-आनन्दित हुआ । आगिला-आगे । आजणी-अजन । आवासइ-रहने का स्थान । आसजीयउ-आरुजिन्न-आसक्त । आगली-बढ कर, अच्छी, सुन्दर । आल-दोषारोपण, आड, अवलम्ब । आखरी-तेज । आणि- आनि-लाकर । आगलउ-आगे । आपि-ठमका—पलक मारते ही । 'इ' इसउ—ऐसे । "उ ऊ" उलगाणा-प्रवासी । ऊलगइ-स्मरणीय । उछाह-उत्साह । उघरउ-उद्धार । उलीभ-उलीय-कुलीय-उभइइ-निकलता है, सान से निकलता है । उलग- परदेश, प्रवास । उलगायउ-प्रवास के निमित्त । उचाय-उभय-त्याग देना,छोड़ देना । उछइ-उच्छइ-आच्छादित । उसीस-उस्सास-उच्छ्वास ( उस्रं प्रबल : श्वास • उच्छ्वास : ) ऊँचा श्वास लेना । उमाईयउ-उमग पर । उलट्यउ- उलट पडा हो । ऊतउ-वहा । उजला-उज्ज्वल । उसाकी-उसकी । उधर-उदर- पेट । उमाहियउ-उम्भाहियउ-विनाथित । उलपउ-देख सकना । उशनइ- उनको । उभादियउ-आवेगा । उबरउ-उसका, उनका । उरिआ-हृदय में । उमाही-उमग । उससाइ-उत्साह । उल्ली-गहरा रही है । उभलयउ-अच्छा ।