भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 315 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 305
  • २०३ - चींत-चिन्ता । चतइ-चित्त । चंपीया-दबा हुआ। चउरी-चउरिया-शुभ मण्डप । चंडीयउ-प्रबल, उग्र । चउरासिया-विशिष्ट पदाधिकारी । चिन्तवइ-चिन्ता करना, विचार करना । चऊथि-चतुर्थी ( गणेश चतुर्थी ) । चौरजउ-जिस प्रकार चोर रखता है । चउपंडी-चार खण्ड, चार खण्ड का राजमहल । चीड़ीय-चिड़िया । चीरी-चिट्ठी । चउरा-चौपाल । चाउ-चादर । "छ" छाइड-छाना। छुंडी-छोड़ दी । छिवणी-स्पर्श करना, छूना । छार-राख । छोड़ि-डाल दी । छोटीय-छोटी छाड़ई-छांट । "ज" जूवा-जुव-तरुण । जइतूं-जो तू । जनम हूयउ-जन्म हुआ । जान-यान- बारात । जोसि-ज्योतिषी-पण्डित । जोग-युक्ति । जूठउ-झूठा । जोगनी- जोइणी-योगिनी (ये ६४ हैं) । जुइ (जुड़ई)-जुड़ जाते हैं । जिहा-जिस । जोइ ज्योँ-देखना, खोजना । जइरि-यदि । जमडाढ़-तलवार । जुहारण-नमस्कार । जोड़इ-आरम्भ करना । जायता-जीवता । जाइ-जाता है, जाकर । ज-प्रमान । "झ" झलवलइ-चमकना । झूग्ता-चिन्ता, झूरना, सूखना, पछताना, विलाप करना । झुण कार-रुनझुन । झिगमिगइ-जगमगाना । झंपियउ-झांपना, व्यथित हुआ । झीड़ई-पतली । झलकय-झलकती है, चमकती है । झलमलई- चमकता है । झाल-ज्वाला । झुनाकउ-जूनागढ़ का । "ट" टसकला मुसकला-घटकना, मटकना । टउरि-मैं जिस प्रकार । टेकि- पकड़कर । "ठ" ठअकती-ठुमकती चाल, रुक कर चलना । ठयइ-ठह्रइ-ठविय-रखता । ठाकुर-राजा । ठामोठामि-जगह-जगह । ठांइ-स्थान । "ड" डालीयउ-फेंकना ।