बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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~ १०६ ~ भाटपर-भागे-भाटपद । भाग-गर्थं । भुह-भूमि । भाइम-भाई । भत्तार- स्वामी । भमर-भ्रमर-घूमता है । भीनउ-भीग गया । भयग्य-भाग्यवाद । "म"
- मुवि-मूंछें, मूर्ख । मंडिड-मोटा, गूँथा । मटिय-भग हुआ । मंगा- मांग । मेकलह-मोसरग्य-प्रेरित, भेजा हुआ । मोकल्या-मोकल्य-मोकलवु ( गुजराती )-भेजना । मुझ-मेग, मेरो । म्हारइउ-मेरे यहां । म्हारइ-मेरे । मेलहउ-छोटा । मिलायउ-मिलागय, मिलायो । मुगवि-मुक्ति । मनइ-मनमें । मेगा-मेघों का समूह । माय-माइ-मातृ या, मातृ या पूजन । मांडहउ-मंडरा, मंडप । मेल्था-मेलाय, मिलाप । मेलिह मेलह-छोड़ना । मज्न मेरुणि-नेदिनी । मारू-मारवाड़ । मउतउ-मौदकर निकाल, देर से निकाल । मेटउ-मुड, संग्राम । माम-शामल ब्राह्मण सूचक अव्यय । महारि-महारिय-मेरा । महला महल-पीछा-मर्दान । मुदि मुह मुग्म-मुह करना । गहर-गटि-दूषित । म्हारी-मेरी । माहि-में । मेल्हाण-छोड़ना, परित्याग, छोड़ा । मशाण-श्मशान । गढिया-गढिय-रचित, लगाकर । भोनइ-मुझे, मुझको । मेलउ, मेलय-सम्बन्ध, संयोग । मरेसि, मरेगा-मरेगी । मुया-मृतक । मिलण - मिलना । माजा- मस्त । मङ्गल-मङ्गलित । 'र' रावलउ-राना का । रावली-राजाओं की। रति-ऋतु । रया-सुन्दर । रोस- क्रोध । राजरउ-राजा के । रावडी-राबड़ी-शीश फूल । रिपग्यो-रखना । राउ-राजा । रावलइ-राजभवन, (अन्त पुर) । रवि-अग्नि, नायक सरदार । रोहणी-रोहिण-दिन का दूसरा पहर, नक्षत्र विशेष, शकेन्द्र की एक पटरानी, आषाढ़ के कृष्ण पक्ष में रोहिणी से चन्द्रमा का योग होता है । रनी-रुदन । 'ल' लपलहइ-लाज प्राप्त करने, पहचानने योग्य । लठि-२१ । लाल-लाल संख्या । लोपीय-लुप्त, अप्राप्त । लावीय-लाभ, सुन्दर रम्य । लुणिजइ-लुञ्च- काटा हुआ । लोवट्टी-लोभपत्री, सुन्दर बारीक । लूण-नीमक, लयण । लापा- लापा । लेइ-लेकर । लागिय-लगती थी । लाउ-प्रेम । लछण-लाछना । लागामी-लगाम । लथइ-हिल जाता है ।