भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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के लिये 'वीसलदेव' का व्यवहार नहीं मिलता । लेकिन विग्रहराज तृतीय को हम्मीर महाकाव्य में "वीसल" और चतुर्थ को सेवालिड तथा धोहारी गाँव के शिलालेखों में "वीसल" कहा गया है । चौहानों के वंश वृक्ष के अनुसार बीसलदेव द्वितीय (विग्रहराज) का, जिसने गुजरात के सोलंकी राजा पर चढ़ाई की थी, वि० सं० १०३० में विद्य- मान होना मिलता है । यह वीसलदेव (विग्रहराज) प्रथम विग्रहराज से दस पीढ़ी बाद तथा चौहान राजाओं की तेरहवीं पीढ़ी में आता है। इसके द्वितीय भ्राता का नाम दुर्लभराज द्वितीय था तथा इसके पिता का नाम सिंहराज था । इसको कोई पुत्र न हुआ । इसके भाई के वंश में विग्रहराज तृतीय हुआ । इसका समय कब से कब तक था, यह इतिहास में स्पष्ट नहीं है । और इसी का वंशज विग्रहराज चतुर्थ हुआ, जिसका समय लगभग सं० १२१० से १२२१ था ।¹ विग्रहराज द्वितीय और विग्रहराज चतुर्थ के बीच जिनका समय हमें इतिहास में मिलता है, १८० वर्षों का अन्तर पड़ता है। और इन दोनों के राज्यकाल ( ग ) उज्जैन का दान पत्र—यह दान-पत्र एक किसान ने द्वारा उज्जैन में नागझरी नामक झरने के पास जमीन खोदते हुए प्राप्त किया गया था । इस दान-पत्र के अनुसार राजा भोज ने किसी ब्राह्मण को एक गाँव दान किया है । इसकी तिथि दान-पत्र के ३० वीं और ३१ वीं पंक्ति में वि० सं० १०७८ ( ई० स० १०२२) है । ( घ ) देपालपुर का दान-पत्र—यह दान-पत्र इन्दौर से २४ मील दूर देपाल- पुर में पाया गया था । दान-पत्र की तिथि वि० सं० १०७६ चैत्र शुक्ल १४ ( ई० सन् १०२२) है । ( च ) यशोवर्मा का पत्र—बाम्बे प्रान्त के नासिक जिले के "कालवन" ग्राम में प्राप्त । इसमें किसी संवत् का उल्लेख नहीं है । ( छ ) ब्रिटिश अजायब घर की मूर्ति का लेख—सरस्वती की एक मूर्ति है जिसके पाद्-स्थल में लिखा हुआ है, राजा भोज के राज्य वि० सं० १०६१ में बनी हुई । ( झ ) तिलकवाड़ा का दान-पत्र—यह दान पत्र बड़ौदा राज्य के तिलक- वाडा के पास नर्मदा नदी के किनारे प्राप्त हुआ था । दे० डाइनैस्टिक हिस्ट्री आफ़ नदर्न इण्डिया—डा० एच० सी० राय। भाग द्वितीय—पृ० ८६१ । १. वंश वृक्ष पृ० ३६ ( क ) पर देखिए ।