बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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के लिये 'वीसलदेव' का व्यवहार नहीं मिलता । लेकिन विग्रहराज तृतीय को हम्मीर महाकाव्य में "वीसल" और चतुर्थ को सेवालिड तथा धोहारी गाँव के शिलालेखों में "वीसल" कहा गया है । चौहानों के वंश वृक्ष के अनुसार बीसलदेव द्वितीय (विग्रहराज) का, जिसने गुजरात के सोलंकी राजा पर चढ़ाई की थी, वि० सं० १०३० में विद्य- मान होना मिलता है । यह वीसलदेव (विग्रहराज) प्रथम विग्रहराज से दस पीढ़ी बाद तथा चौहान राजाओं की तेरहवीं पीढ़ी में आता है। इसके द्वितीय भ्राता का नाम दुर्लभराज द्वितीय था तथा इसके पिता का नाम सिंहराज था । इसको कोई पुत्र न हुआ । इसके भाई के वंश में विग्रहराज तृतीय हुआ । इसका समय कब से कब तक था, यह इतिहास में स्पष्ट नहीं है । और इसी का वंशज विग्रहराज चतुर्थ हुआ, जिसका समय लगभग सं० १२१० से १२२१ था ।¹ विग्रहराज द्वितीय और विग्रहराज चतुर्थ के बीच जिनका समय हमें इतिहास में मिलता है, १८० वर्षों का अन्तर पड़ता है। और इन दोनों के राज्यकाल ( ग ) उज्जैन का दान पत्र—यह दान-पत्र एक किसान ने द्वारा उज्जैन में नागझरी नामक झरने के पास जमीन खोदते हुए प्राप्त किया गया था । इस दान-पत्र के अनुसार राजा भोज ने किसी ब्राह्मण को एक गाँव दान किया है । इसकी तिथि दान-पत्र के ३० वीं और ३१ वीं पंक्ति में वि० सं० १०७८ ( ई० स० १०२२) है । ( घ ) देपालपुर का दान-पत्र—यह दान-पत्र इन्दौर से २४ मील दूर देपाल- पुर में पाया गया था । दान-पत्र की तिथि वि० सं० १०७६ चैत्र शुक्ल १४ ( ई० सन् १०२२) है । ( च ) यशोवर्मा का पत्र—बाम्बे प्रान्त के नासिक जिले के "कालवन" ग्राम में प्राप्त । इसमें किसी संवत् का उल्लेख नहीं है । ( छ ) ब्रिटिश अजायब घर की मूर्ति का लेख—सरस्वती की एक मूर्ति है जिसके पाद्-स्थल में लिखा हुआ है, राजा भोज के राज्य वि० सं० १०६१ में बनी हुई । ( झ ) तिलकवाड़ा का दान-पत्र—यह दान पत्र बड़ौदा राज्य के तिलक- वाडा के पास नर्मदा नदी के किनारे प्राप्त हुआ था । दे० डाइनैस्टिक हिस्ट्री आफ़ नदर्न इण्डिया—डा० एच० सी० राय। भाग द्वितीय—पृ० ८६१ । १. वंश वृक्ष पृ० ३६ ( क ) पर देखिए ।
के भीतर चौहान वंश के और अन्य १२ राजा हुए । हिसाब से प्रत्येक राज का औसत राजकाल १५ वर्ष होता है । यदि इस हिसाब को ठीक माना जाय तो बीसलदेव तृतीय का समय, जो हमें इतिहास में नहीं प्राप्त है, लगभग वि० सं० ११५० होता है; क्योंकि यह विग्रहराज द्वितीय का समय वि० सं० १०३०, विग्रहराज तृतीय का वि० सं० ११५० तथा चतुर्थ का वि० सं० १२१० था और ये तीनों विग्रहराज, राजा भोज, के समय जिसका समय ऊपर कहे गये आधार पर वि० सं० १०७६ है, वर्तमान नहीं थे । इस ऐतिहासिक तथ्य से एक बहुत बड़ा असमंजस यह उपस्थित होता है कि क्या कवि नाल्ह द्वारा कही गयी राजा भोज- बीसलदेव की कथा निरी कपोलकल्पित है ? इसमें तो सन्देह नहीं कि कवि नाल्ह इतिहास का पण्डित नहीं था और न उसने बीसलदेव रासो की रचना किसी ऐतिहासिक दृष्टिकोण से की थी । फिर भी इसे स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि कवि नाल्ह को इस बात का ज्ञान था कि परमार वंश और चौहान वंश का 'रोटी-बेटी' का सम्बन्ध है और बीसलदेव रासो की रचना करते समय यदि वह इतिहास के चार बीसलदेवों में से किस बीसलदेव के सम्बन्ध में कह रहा है इसका स्पष्ट उल्लेख कर देता तो शायद आज ग्रन्थ की रचना-विधि तथा ग्रन्थ की भाषा आदि के सम्बन्ध में कोई सन्देह न रहता । लेकिन इस अभाव के कारण ही हमें ऊपर यह निर्णय कल्पना के आधार पर करना पड़ा है कि बीसलदेव तृतीय का समय क्या था और इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा है कि इनमें कोई राजा भोज के समय वर्तमान नहीं था । लेकिन जैसा कि ऊपर कहा गया है कि कवि की इस उक्ति में सत्यता का अंश अवश्य है जहाँ तक कवि परमार और चौहान वंश के सम्बन्ध का वर्णन करता है, क्योंकि कवि की इस उक्ति की पुष्टि पृथ्वीराज रासो¹ और बिजोलियाँ के शिला-लेख² में दी हुई चौहानों की वंशावली से होती है ।
१—ऊँच धाम बिसराम किय, रग साल चतुरंग । गोदा महल पंवार सौं, कहिय सुकथा प्रसंग ॥ समय १ ॥ छं० ४०६॥ पृथ्वीराज रासो ना० प्र० सभा २—विप्रश्री वत्स गोत्रे भू दहि छत्रपुरे पुरासामनीनंत सामंतः पूर्णतल्लो- नृपस्ततः ॥१२॥ तस्माच्छ्रोजयराजविमद नृपो भो चद गोपेन्द्र कौ तस्माद्दुर्लभ गूर्ज कोरारि नृपो गजाक सच्र्छदनोश्रीमद्वप्प्य राज विंध्य नृपतिः श्री सिंह राश्यि- ग्रहो धीमल्लुर्लभ शुंडुवाक्पति नृपाः श्री वीर्य रामोनुजः श्री चंडो वनिपेति रायकधर श्री सिंह टो ॥ १६ ॥ इप्तलस्तपदाम तयनोवि बिसलो नृपः श्री राजदेवी प्रियः पृथ्वीराज नृपोथ तत्तनुगवो रासत्य देवी विमुक्तत्पुत्रो जयदेव इत्यवत्रियः सोमल्लदेवी पतिः ॥ १४ ॥ जै० आर० ए० एस० (बी०) की वोल्यू २५
- २१ - *(1) Vasudeva (2) Samatraj (3) Ajayraj ( Ajayapal ) (4) Vigraharaj ( i ) (5) Chandraj ( i ) (6) Gopendraraj (7) Durlabharaj ( i ) (8) Govindaraj ( Guvaka i ) (9) Chandraraj (10) Guataka ( ii ) (11) Chandraraj (iii) (12) Vakpatiraj ( i ) (13) Sinharaj (14) Vigraharaj (ii) (15) Durlabharaj (ii) (A D. 973) (16) Govindraj (ii) (17) Vakapatiraj (ii) (18) Viryaram (19) Chamundaraj (About A.D.1040) (21) Vigraharaj (iii) (20) Durlabharaj (iii) (22) Prithviraj ( i ) (About A.D.1075) (A. D. 1105) (23)Ajayraj(sahlana) (24) Arnoraj ( Anaji ) ( A. D. 1140 ) (25) Jugdeva (26) Vigrahraj (iv) (About A.D.1153-1164)
- ३० Ajmer Historical and Descriptive by H. B. Sarada P. 139.
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उपर्युक्त प्रमाणों से यह निश्चय तो हो गया कि परमार और चौहान वंश का आपस का सम्बन्ध था तथा यह भी निश्चय हो गया कि राजा भोज के समकालीन इन तीन बीसलदेवों में से कोई नहीं था। लेकिन जहाँ कवि ने बीसल- देव रासो में यह नहीं लिखा कि बीसलदेव से उसका अर्थ किस बीसलदेव से है, वहीं उसने यह लिखा है कि राजा भोज की पुत्री राजमती से बीसलदेव का विवाह हुआ था जिससे समझने में दुविधा हो जाती है कि कवि किस बीसलदेव की ओर संकेत कर रहा है। बिजोलियाँ के शिलालेख से, जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है यह बात प्रमाणित होती है कि बीसलदेव तृतीय की रानी का नाम राजदेवी था। बीसलदेव रासो की राजा भोज की पुत्री राजमती और यह राजदेवी एक ही रानी के सूचक होने चाहिए। १ लेकिन चूँकि ऊपर यह प्रमाणित किया जा चुका है कि बीसलदेव तृतीय, राजा भोज का समकालीन नहीं था, वरन् राजा भोज के अंतिम समयों में राजा हुआ जिससे यह सिद्ध होता है कि सम्भवतः राजा भोज के भाई उदयादित्य ने, जिसका समय इतिहासकारों ने सं० १११६ से ११४३ वि० सं० १ माना है और जो बीसलदेव तृतीय का समकालीन था २, भोज की पुत्री का विवाह बीसलदेव तृतीय से किया हो। जयानक कृत "पृथ्वीराज विजय काव्य" तथा इतिहास में इसका उल्लेख मिलता है कि वीर्यराम, जिसका उल्लेख बिजोलियाँ के शिलालेख में सिंहट के नाम से हुआ है, विग्रहराज तृतीय का पिता था और इसे अवन्ती के राजा भोज १-न० प्र० पत्रिका—सं० १६६७, पृ० १६८। २—ग्वालियर में उदयपुर का शिलालेख :—इस लेख में उदयादित्य का राज्य काल वि० सं० १११६ तथा शक सं० ६८१ (ई० सन् १०५६-६०) दिया हुआ है तथा यह भी लिखा है उसने शंकर का मंदिर निर्माण करवाया। दे०-कैप्टन नर्ट का होल जे० एन० बी० पोल्यूम ७ पृष्ठ १०५६ उदयपुर मन्दिर का शिलालेख :— यह लेख ग्वालियर के उदयपुर के मंदिर के पूर्वीय दरवाजे के भीतर सुन्दर रूप में सुरक्षित है। इसमें छः पंक्तियाँ हैं और उसमें उदयादित्य का नाम दिया हुआ है तथा तिथि वि० सं० ११३७ दी हुई है। यह लेख सम्भवतः पं० महीपाल रचित है।
- ४८ - ने मार डाला था।¹ इस कारण इन दोनों वंशों में अनबन हो गई थी। 'राज- पूतों में ऐसी अनबन पुत्री बिवाहने से मिटती थी, जिसके अनेक उदाहरण उनके इतिहास में मिलते हैं।² सम्भव है, इसी अनबन को मिटाने के लिए उदयादित्य ने अपनी भतीजी राजा भोज की पुत्री राजदेवी अथवा राजमती का विवाह बीसलदेव तृतीय से किया हो, क्योंकि जहाँ इतिहास में उपर्युक्त अनबन की कथा प्राप्य है वहीं यह वृत्त भी मिलता है कि परमार राजा भोज के अन्तिम समय उसके राज्य पर सोलंकी राजा भीमदेव प्रथम तथा चेदि के राजा कर्ण ने चढ़ाई की और राजा भोज की मृत्यु के पश्चात् उदयादित्य ने विग्रहराज तृतीय की सहा- यता से सोलंकी राजा कर्ण को जीता। ऐतिहासिक सत्य से यही अनुमान दृढ़ होता है कि चौहान और परमार वंश का आपसी बैर मिट गया था एवं राजा भोज की पुत्री के विवाह की सम्भावित कथा की पुष्टि भी इससे होती है। उक्त ऐतिहासिक सत्य को प्रामाणिक मान लेने के पश्चात् यह भी स्वीकार करने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि बीसलदेव रासो की रचना बीसलदेव तृतीय तथा उनके समकालीन परमार वंशी उदयादित्य के समय में हुई होगी, जिनका राज्य काल विक्रम की बारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में था। लेकिन प्राप्य प्रतियों में से किसी भी प्रति में बीसलदेव तृतीय के काल का निर्देश नहीं है। अवश्य इनके राज्य काल के पूर्वार्द्ध सं० १०७७ या १०७३ तथा उत्तरार्द्ध सं० १२१२ या ११७२ का उल्लेख प्राप्त प्रतियों में है। पूर्वार्द्ध संवत् के लिये डा० रामकुमार वर्मा ने गणना का सहारा न लेकर केवल इतना ही कहा है कि चूंकि झालरा पाटन का शिलालेख—यह लेख दे० किलहार्न का लेप आई० ए० वोल्यूम २० पृ० ८३ झालावाड़ राज्य के झालरा पाटन नामक स्थान में पाया गया था। इसमें किसी तेली द्वारा शंभु के निर्माण की बात खुदी हुई है। इसकी तिथि उदयादित्य के राज्य काल वि० सं० ११४३ (ई० सन् १०८६- ८७) की है। दे०, जनरल एण्ड पी० ए० एस० बी०, वोल्यूम १०, पृ० २४१। १—अगम्यो यो नरेन्द्राणां शुभादीधिति-सुंदरः ॥ लभे यशक्षयो यश्च भोजेनावन्ति-भूभृता ॥६७॥ पंचम सर्ग २—ना० प्र० प० सं० १६६७, पृष्ठ १६८।
४ - ४९ - यह संवत् इतिहास के अधिक समीप है इसलिए इस संवत् को मान्यता देने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये । इसके विपरीत उत्तरार्द्ध संवत् के लिये डा० ओझा जी ने गणना की सहायता से तिथि वार आदि को ठीक मानते हुए कहा है कि इस ग्रन्थ की रचना प्रायः डेढ़ सौ वर्ष पश्चात् हुई थी । ग्रन्थ के नायक को बीसलदेव चतुर्थ मानने वाले विद्वानों ने इसका रचना काल १२१२ वि० सं माना है, क्योंकि बीसलदेव चतुर्थ का राज्यकाल संवत् १२१० से १२२० था । लेकिन ऐसे मानने वाले विद्वानों की आलोचना अनेक विद्वानों ने अनेक प्रकार से की है जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है । एक बात विशेष रूप से दर्शनीय यह है कि काव्यगत सारी कथाएँ केवल बीसलदेव और राजमती से सम्बन्धित हैं । यदि राजमती को कथा से पृथक् कर दिया जाय तो कथा कुछ रह ही नहीं जाती । अस्तु, राजमती और बीसलदेव के सम्बन्ध को प्रामाणिक मान कर ही हमें ऐतिहासिक तथ्यों पर विचार करना चाहिये । इस दिशा में बीसलदेव चतुर्थ से प्रसिद्ध राजा भोज की कन्या राजमती से विवाह की संभावना को न देखकर ( राजा भोज से लगभग सौ वर्ष पश्चात् बीसलदेव चतुर्थ का समय सिद्ध होता है ) ग्रन्थ के नायक को बीसलदेव चतुर्थ मानने वालों ने एक तर्क यह उपस्थित किया है कि "हम्मीर काव्य के कवि ने भोज द्वितीय के लिये,-'भोजो भोज इवा- परः," लिखा है । अतः यह भी अनुमान किया जा सकता है कि भोजवंशीय किसी अन्य के लिये कवि नल्ह ने भोज शब्द का व्यवहार किया है ।१ लेकिन इस आधार को मान लेने पर यह सिद्ध करने का प्रयत्न करना कि प्रसिद्ध राजा भोज के वंश के दूसरे किसी शासक की कन्या का नाम राजमती था और उसी का विवाह बीसलदेव चतुर्थ से हुआ था तथा उसी का उल्लेख कवि ने अपने ग्रन्थ में किया है कुछ कुछ आधारहीन जान पड़ता है । माना कि बीसलदेव तृतीय की रानी का नाम राजदेवी था राजमती नहीं, जैसा कि विग्योदयों के शिलालेख में प्राप्त है, लेकिन सम्पूर्ण रूप से आधार-रहित बात पर आधारित होकर यह कहने से कि किसी भोज की कन्या का नाम राजमती था और वह भोज बीसल- देव चतुर्थ का समकालीन था, यह कहना विशेष संगतपूर्ण है कि राजदेवी को ही कवि ने राजमती कहा है । सम्भव है कि बीसलदेव तृतीय की रानी राजदेवी का ही नाम अपने पितृगृह में राजमती रहा हो और विवाह हो जाने के पश्चात् वह राजदेवी कहलायी हो । और इसी कारण विग्योदयों के शिलालेख में 'राजदेवी' के नाम का १-बीसलदेव रासो...सं० सत्यजीवन वर्मा...पृ० १६ भूमिका ।
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लेकिन उपर्युक्त तर्क को उपस्थित करते हुए विद्वान् लेखक ने कहीं यह सिद्ध करने का प्रयास नहीं किया कि बीसलदेव चतुर्थ की रानी का नाम राजमती उसे इतिहास में मिला है अथवा जैसलमेर नगर के बसाने वाले महाराज जयसलदेव के भतीजे रावल भोजदेव की कन्या का नाम इतिहास में कहीं उसे राजमती मिलता है। तब फिर क्यों कर बीसलदेव चतुर्थ का सम्बन्ध भोजदेव (रावल) से स्थापित किया जाय । अब रही बात कवि द्वारा राजमती को जैसलमेर की राजकुमारी कहने की। इस सम्बन्ध में तो ग्रन्थ के रचयिता ने ही ऐसी द्विविधा पैदा कर दी कि किसी निष्कर्ष पर पहुँचना कठिन जान पड़ता है। जहाँ कवि ने राजमती को जैसलमेर की राजकुमारी कहा है वहाँ ही वह राजा बीसलदेव के 'धार नगरी' में राजमती से ब्याह करने के लिये जाने की भी बात कहता है।१ ऐसी स्थिति में प्रक्षिप्त का सहारा लेकर कुछ भी कहना ठीक न होगा। डा० माता- प्रसाद जी गुप्त ने अनेक छान-बीन के पश्चात् केवल १२८ पदों को ही प्रामाणिक माना है। लेकिन इन्हीं प्रामाणिक पदों में ही जैसलमेर में राजमती के जन्म की बात तथा धार के राजा भोज की पुत्री होना दोनों बातें आती हैं। सम्भव है कि जैसलमेर विजय करने के लिये राजा भोज (मालवाधिपति) कभी गये हों और वहीं उन्हें कन्या-रत्न की प्राप्ति हुई हो और इसी कारण कवि ने ऐसा कहा हो अथवा यह भी सम्भव है कि राजमती को जैसलमेर की कुमारी कहकर कवि ने लक्षणा के सहारे यह कहने की चेष्टा की हो कि जैसलमेर की सुन्दरियों जैसी सुन्दर राजमती थी। “मारवाड़ नरनीपजै, नारी जेसलमेर । मिन्धा तुरही सांतरां, फेरहूल बीकानेर ॥” ग्रन्थ में वर्तमानकालिक क्रियाओं के प्रयोग के आधार पर कुछ विद्वान् ग्रन्थ के रचयिता को बीसलदेव का समकालीन तथा बीसलदेव को विग्रहराज चतुर्थ मानते हैं जिनका समय अनेक शिलालेखों तथा इतिहास से सं० १२२० से सं० १२३१ प्रमाणित हो चुका है।२ लेकिन इस तर्क को मान लेने में यह असमंजस उपस्थित होता है कि ग्रन्थ का रचना काल जो कुछ प्रतियों में प्राप्त है और जिसके आधार पर उपर्युक्त
१-राजा उतरय उथार मँझारि। मन माहे हरषियउ राजकुमारि ॥१६॥ —बीसलदेव रासो—सं० माताप्रसाद गुप्त । २-फीरोजशाह की लाट पर खुदवाया हुआ विग्रहराज चतुर्थ का लेख । वि० सं० १२२० वैशाख सुदी गुरुवार ॥
तर्क उपस्थित किया गया है वह 'बारह सै बहोत्तर' है जिसका अर्थ कुछ विद्वानों ने १२१२ तथा कुछ ने १२०२ लगाया है। परन्तु यदि 'बारह सै बहो- तर' का अर्थ १२१२ माना जाय तब तो बीसलदेव चतुर्थ के राज्यकाल से ८ वर्ष पूर्व, और यदि १२०२ अर्थ लगाया जाय तो ४१ वर्ष बाद इस ग्रन्थ की रचना सिद्ध होती है; ऐसी अवस्था में कवि की समकालीनता का दावा कहाँ तक ठीक होगा यह विवाद का विषय बन जाता है। फिर डा० उदयनारायण जी तिवारी का तो यह भी कहना है कि जहाँतक क्रियाओं के प्रयोग का सम्बन्ध है, अनेक ग्रन्थ ऐसे मिलते हैं जिनमें समकालीन न होने पर भी वर्तमानकालिक क्रियाओं का प्रयोग मिलता है। प्रायः घटनाओं को सत्य का रूप देने के लिए ही कवियों ने ऐसा किया है।१ अजमेर के बसने का प्रश्न उठाकर कुछ विद्वान् कहते हैं कि चूंकि विग्रहराज तृतीय के समय अजमेर बसा नहीं था इसलिये इस ग्रन्थ के नायक बीसलदेव तृतीय नहीं हो सकते। ऐसे विद्वानों के मतानुसार अजमेर नगर विग्रहराज तृतीय के पश्चात् महाराज अजयराज ने बसाया था।२ इसमें तो सन्देह नहीं कि वि० सं० ११९५ (ई० स० ११०८) के लगभग चौहान अजयदेव ने अजमेर बसाकर उसे इस वंश की राजधानी बनाया। लेकिन कवि जहाँ गढ़ अजमेर का उल्लेख करता है वहीं बीसलदेव के लिये 'सम्भरीराव' का भी।३ और बीसलदेव, शाकंभरीश्वर या सांमरीराज अपने वशज वासुदेव के अहिच्छत्रपुर से शाकंभरी (सांभर) में आकर अपना राज्य स० ७५१ के लगभग कायम कर लेने के पश्चात् ही कह- लाने लगे थे।४ ज्ञात तो ऐसा होता है कि कवि को अजमेर बसने की तिथि का ज्ञान न था। और चूंकि कवि ने ग्रन्थ की रचना, विग्रहराज तृतीय के समर्थक १—वीर काव्य—प० उदयनारायण तिवारी—पृ० १६० । २—हमारा हिन्दी साहित्य—भवानीशंकर त्रिवेदी—पृ० ५१ । ३—मारवाड़ का इतिहास—पं० विश्वेश्वरनाथ रेउ—पृ० ६-१२ । ४—गरब करि बोलियउ सम्भरि बाल । मो सारिखउ नहीं अवर भुपाल ॥ म्हां परि सम्भरि उमडइ । चितु दिसइं थांपा रे जेसलमेर । लाल तुरीय पायर पडइ । गोरी राजकउ वइसणउ गढ़ अजमेर ॥ ३८ ॥ बीसलदेव रास सं०, डा० माताप्रसाद गुप्त ।
- ५३ - विद्वानों के मतानुसार करीब १५० वर्षों के पश्चात् की जब अजमेर बस चुका था इसलिये उसने अजमेर का उल्लेख कर दिया लेकिन बीसलदेव को सर्वदा सांभरीराज ही कहा। सांभीरीराज कह कर कवि ने यह संकेत किया कि उसका उद्ददेश्य 'सपाद लक्ष' के राजा से है जिसमें नागौर आदि के प्रान्त और बहुत संभव है कि यह स्थान भी, जिसे बीसलदेव के वंशज अजयराज (अजयदेव) ने बसा कर उसका नाम अजमेर रखा, सम्मिलित रहा हो। और इसीलिये कवि ने शायद अपने काल के प्रचलित नाम अजमेर को लिखना विशेष उचित समझा इसके बदले कि उसके काल से डेढ़ सौ वर्ष पुराने नाम को वह लिखे। अथवा यह भी संभव है कि उस पुराने नाम से कवि परिचित ही न रहा हो। दोनों रूपान्तरों में समान रूप से पायी जानेवाली घटनाओं में से दूसरी घटना राजा बीसलदेव की उड़ीसा यात्रा की है जिस पर ऐतिहासिक रूप से विचार किया जा सकता है। बीसलदेव तृतीय को ग्रन्थ के नायक मानने वाले विद्वानों ने इस घटना को कवि की कल्पना माना है क्योंकि इतिहास में या कहीं भी बीसलदेव तृतीय के उड़ीसा विजय करने का प्रमाण नहीं मिलता। लेकिन बीसलदेव चतुर्थ के पक्ष के समर्थकों का कहना है कि चूंकि विग्रहराज चतुर्थ के तीर्थ यात्रा के प्रसंग में विन्ध्याचल से लेकर हिमालय तक के देशों को विजय करने का उल्लेख 'भारत के प्राचीन राजवंश' में मिलता है, इसलिये कवि नाल्ह के ग्रन्थ का नायक बीसलदेव चतुर्थ है। किन्तु इस प्रमाण में कितना सत्य का अंश है यह कहना कठिन है। डा० सत्यजीवन वर्मा ने इसी प्रमाण को आधार मान कर इस प्रसंग से सम्बन्धित बीसलदेव की भावज की इस बात को कि "वह बीसलदेव उड़ीसा जाने के पूर्व भी सात वरस बाहर रहा था और इस प्रकार वह जन्म भर बाहर ही रहता है" असत्य एवं असम्भव न मानते हुए कहा है कि चूंकि बीसलदेव चतुर्थ अपनी वीरता और युद्ध कौशल ही के कारण अपने भाई का उत्तराधिकारी बनाया गया था इसलिए युद्धार्थ उसका सात वर्ष तक एक बार बाहर रहना असम्भव नहीं। इसमें तो संदेह नहीं बीसलदेव चतुर्थ, जिसका राजस्व काल वि० स० १२१० से (क्योंकि इस समय का उसका लिखा हरकेलि नाटक मिलता है) वि० स० १२२० तक माना जाता है, बड़ा पराक्रमी था। दिल्ली के फीरोज़ १- भारत के प्राचीन वंश-पृ० २४४ । २- बीसलदेव रासो-सं० सत्यजीवन वर्मा भूमिका-पृ० २० ।
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शाह की लाट पर बीसलदेव चतुर्थ द्वारा खुदवाए हुए लेख की पंक्तियों से यह भी ज्ञात होता है कि उसने आर्यावर्त को मुसलमानों से रहित कर विन्ध्य से लेकर हिमालय तक की भूमि विजय की । लेकिन इस शिलालेख में कहीं भी उड़ीसा विजय का प्रसंग नहीं आता । फिर आर्यावर्त को मुसलमानों से रहित करने का यह अर्थ नहीं होता कि भारत के प्रत्येक प्रान्त पर विजय प्राप्त की जाय । दिल्ली पर विजय प्राप्त करना ही यह अर्थ रखता था—कि सारे भारत- वर्ष पर विजय प्राप्त कर ली गई । और इतिहास के पन्ने तो यह भी सिद्ध करते हैं कि बीसलदेव चतुर्थ ने दिल्ली जिसमें हरियांक—आजकल हरियाणा कहा जाने वाला प्रदेश—शामिल है तोमर राजपूतों से जीता था । इसके समय तक दिल्ली में मुसलमानों की राजधानी नहीं बनी थी । महमूद गज़नवी अवश्य समय-समय पर भारतवर्ष पर हमला करता था और लुटेरे के समान धन लूट कर अपने देश को लौट जाता था । संभव है कि इसके साथ बीसलदेव चतुर्थ की कोई लड़ाई हुई हो और इसको पराजित कर बीसलदेव ने आर्यावर्त को इसके जैसे लुटेरे से स्वतन्त्र किया हो और इसी का उल्लेख फिरोजशाह की लाट में हो । अस्तु, किसी भी अवस्था में यह नहीं स्वीकार किया जा सकता कि बीसलदेव चतुर्थ का उड़ीसा गमन ऐतिहासिक रूप से प्रामाणिक है तथा यह भी नहीं कहा जा सकता कि सुधायें बीसलदेव चतुर्थ उड़ीसा जाने के पूर्व सात वर्ष तक बाहर रहा । सम्भव है कि विन्ध्य से लेकर हिमालय तक के प्रदेशों को म्लेच्छों के आक्रमण से मुक्त करने में उसे अपने राज्य से बाहर जाने की भी आवश्यकता न पड़ी हो क्योंकि मुसलमानों के आक्रमण का द्वार तो अजमेर ही था और इस प्रकार उनके (मुसलमानों के) आक्रमण का सामना तो उसे अपने किले में ही बैठ कर करना पड़ा होगा । इसलिए उसके सात वर्ष तक बाहर रहने की कथा जिसका उल्लेख बीसलदेव रासो में हुआ है और जिसे श्री सत्यजीवन वर्मा ने सत्य प्रमाणित करने का प्रयत्न किया है सत्य नहीं प्रतीत होती । इसके अतिरिक्त श्री सत्य- जीवन जी वर्मा के उस तर्क में तो कोई सार ही नहीं दिखाई पड़ता, जहाँ वे कहते हैं कि बीसलदेव का राज्य काल सं० १२१० से १२२० तक माना जाता है, लेकिन इसने इन्हीं दश वर्षों में विन्ध्य से लेकर हिमालय तक की भूमि विजय की हो और आर्यावर्त को मुसलमानों से रहित किया हो, यह माननीय नहीं है ।¹ क्योंकि अपने इस तर्क के लिये ये कोई पुष्ट प्रमाण नहीं उपस्थित करते । १. बीसलदेव रासो—स० सत्यजीवन वर्मा—भूमिका पृ० २०
– ५५ – उड़ीसा जाने की कथा के साथ बीसलदेव रासो में लेखक यह भी कहता है कि उड़ीसा जाते समय बीसलदेव ने अपना राज्य अपने भतीजे को सौंपा था । लेकिन कवि की यह उक्ति भी उसको इतिहास से अनभिज्ञता सिद्ध करती है, क्योंकि इतिहास में कहीं भी बीसलदेव तृतीय या चतुर्थ द्वारा अपने भतीजे को राज्य सौंपने की कथा नहीं मिलती । लेकिन इस प्रसंग को भी सत्य प्रमाणित करने तथा ग्रंथ के नायक बीसलदेव चतुर्थ को मानने के लिये श्री सत्यजीवन वर्मा जी यह तर्क उपस्थित करते हैं कि "बीसलदेव के उड़ीसा जाने का समय यदि हम विक्रम संवत् १२०७-८ ही मानें तो उस समय उसके पुत्र अमर गांगेय का जन्म नहीं हुआ था, यह मानना पड़ेगा । और यदि हम उड़ीसा प्रवास के बाद बीसलदेव का लौटना संवत् १२१२ ही मानें, तो उस समय भी उसके पुत्र का होना नहीं मान सकते । संभव है कि उसके पुत्र का जन्म उसके पश्चात् हुआ हो । ऐसा हो भी सकता है, क्योंकि बीसलदेव के पश्चात् उसके पुत्र का कोई शिलालेख नहीं मिलता । इससे यह अनुमान होता है कि उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र की मृत्यु अल्प काल ही में हुई होगी । बीसलदेव और उसके पुत्र दोनो की मृत्यु संवत् १२२१ और १२२४ के बीच किसी समय हुई, यह निश्चित है ।१ अब यदि अमर गांगेय की अवस्था मृत्यु के समय दस या बारह वर्ष मानी जाय, तो उसका जन्म १२१२ के बाद ही होगा । अतएव बीसलदेव रासो के निर्माण काल के समय बीसलदेव के पुत्र का जन्म नहीं हुआ था, इसीलिये उसे अपने भतीजे को राजभार सौंपना पड़ा था । लेकिन इतिहास से यह बात सिद्ध होती है कि बीसलदेव चतुर्थ के, जिसकी मृत्यु सं० १२२० ( ई० सन् ११६३) में हुई, बाद उसका पुत्र अमर गांगेय राजगद्दी पर बैठा । लेकिन जगदेव के पुत्र पृथ्वी भट्ट (पृथ्वीराज द्वितीय) ने उससे राजगद्दी छीन ली और स्वयं राजा बन बैठा । मेवाड़ राज्य के जहाजपुर जिले के धौड़ गाँव के पास रूठी रानी के मन्दिर के स्तम्भ पर वि० संवत् १२२५ का एक लेख खुदा है। जिसमें पृथ्वीराज को अपने भुजबल से साकम्भरी के राजा को जीतने वाला लिखा है ।२ इससे यही सिद्ध होता है कि १-बीसलदेव रासो—स० सत्यजीवन वर्मा—भूमिका पृ० २२ । २-अजमेर हिस्टोरिकल एण्ड डिस्क्रिप्टिव लेखक एच० बी० सारदा-पृ० १४५
- ५२ - वि० सं० १२२५ में जो साठ बीसलदेव चतुर्थ की मृत्यु के प्रायः पाँच या छ वर्षों पश्चात् आता है, पृथ्वी भट ने अमर गांगेय से राज्य छीना। ऊपर कहा जा चुका है कि बीसलदेव चतुर्थ की मृत्यु सं० १२२० में हुई। अतः १२२१ से लेकर १२२५ तक अमर गांगेय ने राज्य किया और तब पृथ्वीभट ने उससे राज्य छीना। इसमें संदेह नहीं कि राजगद्दी पर बैठने के समय अमर गांगेय नाबालिग था लेकिन उसका जन्म ही १२१२ में नहीं हुआ था यह कैसे माना जा सकता है। कल्पना के आधार पर यह कहना कि बीसलदेव चतुर्थ सं० १२०७ या १२०८ में उड़ीसा विजय करने गया और सं० १२१२ में वहाँ से लौटा ठीक नहीं है क्योंकि बीसलदेव चतुर्थ का समय १२१० से १२२० तक था। यदि किसी भी रूप में यह मान लिया जाय कि बीसलदेव उड़ीसा गया था तब भी यह मानना पड़ेगा कि उसका उड़ीसा गमन निश्चय ही सं० १२१० से लेकर १२२० के भीतर हुआ होगा। ऊपर कहा जा चुका है कि राजगद्दी पर बैठने के समय बीसलदेव चतुर्थ का पुत्र अमर गांगेय नाबालिग था। यदि उसकी नाबालिगी की अवस्था राजगद्दी पर बैठने के समय दस वर्ष की भी मान ली जाय तो भी यही बात सिद्ध होती है कि उसका जन्म बीसलदेव के उड़ीसा गमन के समय तक हो चुका था। ऐसी स्थिति में बीसलदेव का अपने पुत्र को राजगद्दी न सौंप कर भतीजे को राजगद्दी सौंप कर जाने की बात की कल्पना केवल कवि कल्पना मात्र है। फिर बीसलदेव चतुर्थ द्वारा उड़ीसा गमन के समय अपने भतीजे अर्थात् जगदेव के पुत्र पृथ्वीभट को राज्य सौंपने के बात यों भी खरी नहीं उतरती कि जिस बीसलदेव ने अपने पिता की हत्या करने वाले अपने भाई जगदेव से राज्य छीन लिया था और उसे देश निकाला कर दिया था वही बीसलदेव उसको या उसी के पुत्र को क्योंकर राज्य सौंप सकता था। बीसलदेव रासो के दोनों रूपान्तरों में समान भाव से यह कथा पाई जाती है कि बीसलदेव उड़ीसा जाने के पूर्व राजमती से बातचात करते समय उसे बारह वर्ष की गोरी कह कर सम्बोधित करता है। इस कथा का सम्बन्ध यद्यपि इतिहास से विशेष नहीं है फिर भी ऐतिहासिक रंग चढ़ाने के हेतु श्री सत्य जीवन जी वर्मा ने 'बारह बरस की गोरड़ी' का अर्थ युवती स्त्री से न लगाकर यह माना है कि राजमती की अवस्था ब्याह के समय अष्टप् अर्थात् बारह वर्ष की थी क्योंकि 'हिन्दुओं में उस समय अधिकतर लोग 'अष्टवर्षा भवेद् गौरी
- ३० - दशकों व रोदियों' पर अन्ध विश्वास करते थे ।¹" किन्तु जिस प्रसंग के साथ उपर्युक्त पंक्ति का उल्लेख है उससे तो यही सिद्ध होता है कि बीसलदेव राजमती के सौन्दर्य की ओर इंगित कर रहा है, न कि बारह वर्ष की अवस्था में उसके विवाह की ओर। बारह वर्ष की अवस्था का उल्लेख कवि इसलिए करता है कि इस अवस्था में नारी का सौन्दर्य एक विशेष प्रकार का होता है। यह अवस्था ऐसी होती है जब बाल्यावस्था का प्रस्थान तथा किशोरावस्था का आगमन होता है। और ऐसी स्थिति में सौन्दर्य का निखर कर मनमोहक हो उठना स्वाभाविक होता है। फिर कवि-जगत् तो इस अवस्था का सर्वदा प्रशंसक रहा है। अस्तु, इस अवस्था का उल्लेख तो ऐसा ज्ञात होता है कि कवि भारह ने कवि परम्परा के निर्वाह के लिये ही किया है। अवस्था के क्रम को लेकर किसी ऐतिहासिक तथ्य से उसे जोड़ना उचित नहीं जान पड़ता और न तो इससे बीसलदेव चतुर्थ से कोई सम्बन्ध स्थापित कर ग्रन्थ की रचनातिथि वि० सं० १२१२ मानना ही उचित है। बीसलदेव रासो की दोनों रूपान्तरों में समान रूप से पायी जाने वाली उपर्युक्त ऐतिहासिक घटनाओं के अतिरिक्त रूपान्तर न० २ में कुछ और ऐसी घटनाएँ हैं जिनको लोग इतिहास से सम्बन्धित बताते हैं। ऐसी घटनाओं में से प्रथम घटना बीसलदेव द्वारा अपने पिता के श्राद्ध और पिंडदान की है जिसे वह उड़ीसा जाने के पूर्व करता है। इस घटना के जरिये श्री सत्यजीवन जी वर्मा ने यह सिद्ध किया है कि बीसलदेव का उड़ीसा प्रवास बारह वर्ष नहीं माना जा सकता। कवि ने यों ही बारह वर्ष लिख दिया है जैसे राम के प्रवास के चौदह वर्ष ।२ निसन्देह इस सम्बन्ध में श्री सत्यजीवन जी वर्मा द्वारा उपस्थित किया हुआ तर्क स्तुत्य है लेकिन इस घटना का इतिहास के साथ योग करने का उनका प्रयास निष्फल परिश्रम है। इस सम्बन्ध में उनका यह मानना कि बीसलदेव का उड़ीसा गमन १२०७ या १२०८ में हुआ, इतिहास की ग्रन्थियों को खोलने के बजाय और कस देता है। दूसरी घटना बीसलदेव की अवस्था से सम्बन्धित है जो बीसलदेव के उड़ीसा गमन के पश्चात् राजमती द्वारा पांडे को पत्र देकर उड़ीसा जाते समय १-नोट-यह अन्धविश्वास हिन्दुओं में मुस्लिम काल से प्रारम्भ हुआ है। २-बीसलदेव रासो-सं० सत्यजीवन वर्मा-पृ० १८ भूमिका।
- ५८ - बताया जाता है। राजमती पांडे से कहती है कि उसके प्रिय को पहचानने का निशान यही है कि उसका प्रिय बीसलदेव बाइस वर्ष का जवान है। यद्यपि बीसलदेव की यह अवस्था श्री सत्यजीवन जी वर्मा को किसी अंश तक मान्य नहीं है फिर भी उन्हें कवि नाहड़ के कथन में इस बात का अंश दिखाई पड़ता है। वे कहते हैं कि "बीसलदेव अधिक अवस्था को प्राप्त होकर नहीं मरा, क्योंकि उसका पुत्र उसकी मृत्यु के समय अल्प अवस्था का था।"" इसमें सन्देह नहीं कि बीसलदेव के पुत्र अपरगांगेय की मृत्यु अल्प अवस्था में हुई जैसा कि इतिहास से सिद्ध होता है लेकिन इससे इस निष्कर्ष पर पहुँचना कि बीसल- देव की अवस्था भी छोटी थी उचित नहीं जान पड़ता। बीसलदेव की अवस्था का हिसाब किसी हद तक लगाना सम्भव था यदि हमें इतिहास में उसके पिता की अवस्था का कोई उल्लेख मिलता। यों इतिहास में अर्णोराज (बीसलदेव चतुर्थ के पिता) का राज्यकाल वि० सं० ११९७ से १२०८ तक माना गया है जो गणना करने पर ११ वर्ष होता है। और इसी प्रकार बीसलदेव चतुर्थ का भी राज्यकाल वि० सं० १२१० से १२२१ तक माना जाता है जो गणना करने पर ११ वर्ष होता है। यदि बीसलदेव रासो में दी हुई बीसलदेव की अवस्था उड़ीसा गमन के समय २२ वर्ष की मानी जाय तो यह मानना पड़ेगा कि उसका जन्म वि० सं० ११९७ से पूर्व हुआ होगा जो कि पूर्ण रूप से कल्पना पर आधारित होगा। और यदि उसका जन्म काल उसके पिता के राज्यारम्भ में माना जाय तो यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि उसकी मृत्यु २२ वर्ष की अवस्था में हुई होगी। ऐसी स्थिति में बारह वर्षों तक उसका उड़ीसा में रहना अथवा उसकी अवस्था का २२ वर्ष का उल्लेख सब कुछ कवि कल्पना ठहरता है। उचित तो यह जान पड़ता है कि २२ वर्ष की अवस्था के उल्लेख से कवि का तात्पर्य उसकी युवावस्था से है। तीसरा प्रसंग बीसलदेव रासो में आनासागर के उल्लेख का है जो कि बीसलदेव को 'धार' से लौटते समय रास्ते में मिला था। इस घटना को सत्य का रूप देकर बीसलदेव रासो के नायक को बीसलदेव चतुर्थ बताने वाले विद्वानों ने यह तर्क उपस्थित किया है कि चूंकि आनासागर बीसलदेव चतुर्थ के पिता अर्णोराज ने बनवाया था और वह बीसलदेव तृतीय के समय वर्तमान नहीं था इसलिये बीसलदेव रासो के नायक बीसलदेव चतुर्थ थे नकि बीसलदेव १- बीसलदेव रासो स० सत्यजीवन वर्मा-पृ० २४ भूमिका।
- ५९ - तृतीय । इतिहास में अवश्य आनासागर के लिये यह लिखा गया है कि इसे सम्राट् पृथ्वीराज के दादा अर्णोराज या अनाजी ने बनवाया था।$^१$ लेकिन डा० श्यामसुन्दरदास जी का कहना है कि अनाजी द्वारा बनवाया गया अनासागर उस अनासागर से बिल्कुल भिन्न है जहाँ बीसलदेव ने धार से लौटते समय विश्राम किया था । धार से लौटते समय बीसलदेव ने जिस अनासागर पर विश्राम किया था वह अनासागर हिन्दुओं की 'अन्ना' या 'अन्नपूर्णादेवी' के नाम पर एक प्राकृतिक झील है जिसके किनारे पुराकाल में 'वाया' ऋषि रहते थे ।$^२$ बीसल- देव रासो में उल्लिखित 'अनासागर' के वाद-विवाद में पड़ना उस समय बिल्कुल निरर्थक जान पड़ता है जब हम यह देखते हैं कि रूपान्तर न० २ के जिस सर्ग ( चतुर्थ सर्ग ) में इसका उल्लेख है वह पूर्ण सर्ग ही प्रक्षिप्त है । उपर्युक्त ऐतिहासिक घटनाओं के विवेचन से निष्कर्ष यह निकलता है कि बीसलदेव रासो में उल्लिखित घटनाओं का सम्बन्ध इतिहास से बहुत कम है अथवा यह भी कहा जा सकता है कि ग्रन्थ के रचयिता को इतिहास का ज्ञान यथेष्ट न था । अतः इन घटनाओं के आधार पर बीसलदेव रासो के निर्माणकाल का निर्णय करना खतरे से खाली नहीं । काव्यागत कथा एवं काव्य का रचयिता नारी के चरित्र को समझना साधारण मनुष्यों के लिए तो दूर काव्य के मूल वेदों के रचने वाले कवियों$^३$ के लिए भी एक समस्या है । ऐसा प्रतीत होता है कि नारी के चरित्र की विषमताओं को देखकर ही किसी कवि ने कहा था कि "स्त्रियाश्चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं देवो न जानाति कुतो मनुष्यः ।" बीसलदेव रासो की कथा भी रानी राजमती के चरित्रविशेष का वह उद्घाटन है जिसके कारण चौहानवंशी पराक्रमी राजा बीसलदेव को भी अपना राजपाट छोड़ कर बारह वर्षों तक बाहर रहना पड़ा था । नारी की वाणी ही उसके द्वारा प्राप्त किये हुए सारे सद्गुणों को नष्ट कर देती है । कवि नारह कहता है कि :- १-Ajmer Historical & Descriptive-H B Sarada P 60 २-हिन्दी हस्तलिखित खोज ग्रन्थों की रिपोर्ट सन् १६०१ पृ० ७८ । ३-वेद काव्य का मूल है, अतएव सच्चिदानन्द घन श्री परमेश्वर द्वारा ही लोक में सबसे प्रथम इसकी प्रवृत्ति हुई है । काव्यकल्पद्रुम-प्रथम भाग पृ० ८.
- १० - स्त्रीय चरित्र घण छप अहइ। एक ही अषर सरब विणास॥ कवि कथा का प्रारम्भ गणेश की वन्दना और सरस्वती से यह वर मांगते हुए करता है कि वह उसकी भूली हुई काव्यशक्ति को उसे सौंप दें ताकि वह ग्रन्थ की रचना करने में समर्थ हो सके। तत्पश्चात् कवि राजा भोज की सभा का वर्णन करता है। महाराज भोज की रानी उनसे प्रस्ताव करती है कि वे अपने अच्छे दिन रहते राजकुमारी का विवाह कर दें। रानी के इस प्रस्तावानुसार राजा ज्योतिषी को बुलाकर अपनी कन्या के लिये सुयोग्य वर खोजने के लिये आग्रह और निवेदन करता है,१ तथा यह भी कहता है कि वह (ज्योतिषी) वीर विख्यात बीसलदेव चौहान को, जो हर प्रकार से उसकी कन्या के योग्य है, उसकी कन्या के लिये वर चुने। ज्योतिषी द्वारा शुभ सूचना प्राप्त होने पर राजा भोज लग्न निश्चित करता है और लग्न की सुपारी ब्राह्मण और भाँट के हाथ अजमेरगढ भेजता है। अजमेरगढ पहुँचकर ब्राह्मण लग्न की सुपारी बीसलदेव को देता है जिसे प्राप्त कर बीसलदेव हर्षित होता है और कहता है कि परमार जाति की कन्या के कुल में आने पर चौहान कुल का उद्धार हो जायगा। यह कहकर बीसलदेव ब्राह्मण और भाँट को नाना प्रकार की बहुमूल्य भेंट देकर उनको विदा करता है।
- निश्चित तिथि पर बारात अजमेरगढ से प्रस्थान करती है। बारात में इतने 'अधिक घोड़े, हाथी, सैनिक तथा बराती हैं कि उनके पदों की धूल, उड़ने; से 'सूर्य आच्छादित हो जाता है और इस बड़ी बारात के साथ राजा बीसलदेव 'धार नगरी में पहुँचता है। राजमती राजा बीसलदेव को देखकर बहुत हर्षित होती है तथा अपनी सखियों से कहती है कि सम्पूर्ण कलाओं से युक्त पूर्णिमा के चन्द्रमा की भाँति, स्वर्ग के देवताओं और मनुष्यों को मोहित करने वाले तथा गोकुल में प्रत्यक्ष गोविंद की भाँति बीसलदेव की आरती उतारी १—रूपान्तर न० २ में राजा भोज की अनुमति से उनका पुरोहित वर ढूंढता हुआ चारों ओर जाता है। जैसलमेर, टोडा, अयोध्या, दिल्ली, मथुरा आदि स्थानों में जाकर राजमती के लिये वर ढूंढता है लेकिन उसे राजमती के अनुरूप कोई वर इन स्थानों में नहीं मिलता। तब वह अजमेर जाता है और बीसलराय को देखता है। इन्हें देखकर वह इनको राजमती के उपयुक्त, हर प्रकार से पाता है और इसकी सूचना राजा भोज को देता है।
- ३१ -
जाय। इसी बीच बारात राजद्वार पर आती है। राजा बीसलदेव तोरण के नीचे सूर्य के समान उदित होता है और सजी-धजी स्त्रियाँ उसकी आरती उता- रती हैं। शुभ मुहूर्त में राजा बीसलदेव और कुमारी राजमती का पाणिग्रहण सम्पन्न होता है। विवाह-मण्डप में बीसलदेव और राजमती कृष्ण और रुक्मिणी की तरह सुशोभित होते हैं। मालवा देश में बड़े उत्सव मनाये जाते हैं। भांवर के समय पहले फेरे के पायण में बीसलदेव को राजा भोज आलोसर (स्थान विशेष) तथा मालवेश (स्थान विशेष) देता है। दूसरे फेरे पर राजकुमारी की माता भानुमती अपने दामाद को अर्थ, द्रव्य का भण्डार, सपादलक्ष देश, तोड़ा, टउक, बूँदी और कुडालदेश देती है। तीसरे फेरे पर राजा भोज राजमती के साथ ताजी और केकाण (घोड़े) मंडोवर का देश तथा समुद्र के साथ सोरठ और समस्त गुजरात देता है।¹ पाणिग्रहण सानन्द समाप्त होता है। बीसलदेव अपनी सास को नमस्कार करने के लिये जाता है और रानी भानुमती 'अजमेर' में अविचल राज्य करने का आशीर्वाद उसको देती हैं। पहिरावनी (वस्त्र भूषणादि पहनाने का रस्म) होती है। सुहावनी धार नगरी को छोड़कर धार का दीपक (राजमती) अजमेर गढ़ को प्रदीप्त करने चढ़ता है।² बारात के लौटने पर अजमेर गढ़ में बड़ा हर्ष मनाया जाता है और राजा अपने मन्त्री से कहता है कि "या तो मुझसे सृष्टिकर्त्ता प्रसन्न हुआ या मैंने विधि का लिखा प्राप्त किया, जो मैं राजा भोज की चौरी पर चढ़ा अर्थात् राजा भोज की कन्या का पाणिग्रहण किया।"³ १-नोट—रूपान्तर न० २ में फेरों के समय पायण स्वरूप दिये हुए स्थानों के नाम में अन्तर है। इस रूपान्तर के अनुसार प्रथम फेरे में 'आलीसर' और कुडाल देश देने का, दूसरे फेरे में घोड़े, धन, मढोवर, सौराष्ट्र और गुजरात देने का, तीसरे फेरे में सांभर, तोड़ा, और टोंक देने का तथा चौथे फेरे में चित्तौड़ देने का वर्णन है। रूपान्तर न० १ में चौथे फेरे का कोई वर्णन ही नहीं है। २—रूपान्तर न० २ में विवाह के पश्चात् अजमेर लौटते समय रास्ते में 'अनासागर' मिलने का उल्लेख है। लेकिन ऐसा कोई उल्लेख रूपान्तर न० १ में नहीं है। ३—नोट—रूपान्तर न० २ में प्रथम खण्ड की कथा यहीं समाप्त होती है और द्वितीय खण्ड की कथा कवि पुनः गणेश की वंदना करके आरम्भ करता है।
- ६२ -
एक दिन राज्य सभा धन सम्पत्ति के सम्बन्ध में रानी राजमती तथा बीसलदेव में वाद् विवाद चल पड़ता है। राजा गर्वपूर्वक कहता है कि उसके समान दूसरा भूपाल नहीं है। रानी इस गर्वोक्ति को सुनकर कहती है कि उसका यह गर्व व्यर्थ है, क्योंकि उससे विशेष धनी तो उड़ीसा का राजा है जिसके राज्य में हीरे ही हीरे खानों से निकलते हैं। उड़ीसा देश की यह वार्ता सुनकर राजा रानी से कहता है कि उसका (रानी का) जन्म तो जैसलमेर में हुआ और विवाह अजमेर में, अतएव वह उड़ीसा देश के सम्बन्ध में उपर्युक्त बातें क्योंकर जानती है। इस विषय में जब तक वह नहीं बतलायेगी तबतक वह (राजा) अन्न-पानी नहीं ग्रहण करेगा। राजा के इस आग्रह पर रानी अपने पूर्व जन्म की कथा बतलाती है कि कैसे वह पूर्व जन्म में हरिणी के रूप में उड़ीसा में रहती थी और कैसे एक बहेरी द्वारा मारे जाने पर उसने उड़ीसा में फिर जन्म न देने की दैव से प्रार्थना की थी तथा उसका धार नगरी में जन्म हुआ था। रानी की यह बात सुनकर राजा कहता है कि "हे गौरी तूने उपर्युक्त बातें कहकर मेरी निंदा की। अतः अब मैं तुझे छोड़कर बारह वर्षों तक प्रवास करूँगा। ताकि मैं भी हीरे की खान अपने घर ला सकूँ। राजा के इन वचनों को सुनकर रानी बड़ी दुःखी होती है और कवि इस स्थान पर ऐसी परिस्थितियों के उपस्थित होने पर नारी द्वारा अपने पति को प्रवास से रोकने के हेतु अपनाये गये सभी उपायों का वयान रानी राजमती से करवाता है। लेकिन राजा उसकी किसी बात पर ध्यान नहीं देता और प्रवास के लिये हठ धरता है। अन्त में राजमती की भावज भी राजा को अनेक प्रकार से समझा बुझा कर और कुछ कटुवी बातें कहकर उसे परदेश गमन से रोकने की चेष्टा करती है। फिर भी राजा परदेश गमन का हठ नहीं त्यागता। राजा ज्योतिषी को बुलाकर यात्रा के लिये शुभ दिन और मुहूर्त पूछता है। लेकिन रानी ज्योतिषी से इसके पहले ही राजा की यात्रा का मुहूर्त चार महीने पश्चात् बतलाने का आग्रह कर चुकी थी क्योंकि उसे पूर्ण विश्वास था कि इन चार महीनों के अन्दर वह अपने पति को परदेश जाने से रोक सकने में समर्थ हो सकेगी। ज्योतिषी रानी के आग्रानानुसार ही राजा को चार महीने पश्चात् का यात्रा का मुहूर्त बतलाता है। कात्तिक मास में ज्योतिषी द्वारा बताये गये शुभ मुहूर्त में राजा परदेश गमन करता है। भीगे हुए नेत्रों से रानी राजा को विदा करती है और नीति की शिक्षा देती है। राजा को विदा करके रानी की अवस्था बड़ी दुःखद हो जाती
- ६३ - है। राजा के विरह में उसे अपने तन-मन का भी स्मरण नहीं रहता। सखियाँ उसे बहुत समझाती हैं लेकिन उसकी विरह वेदना किसी प्रकार कम नहीं होती।१ कवि इसके पश्चात् बारह महीनों का वर्णन करते हुए प्रत्येक महीने में रानी के विरह वेदना की विभिन्न परिस्थितियों का मर्मस्पर्शी वर्णन करता है। रानी की दशा तो राजा के विरह में इधर खराब होती है उधर राजा को रास्ते में शुभ शकुन होते हैं और वह अपनी यात्रा निर्विघ्न समाप्त करता चलता है। क्रमशः समय व्यतीत होता रहता है लेकिन रानी की व्यथा बढ़ती ही जाती है। उसके यौवन की दावाग्नि विरहाग्नि को द्विगुणित कर देती है। अन्त में वह राजा के पास एक दूत भेजती है। दूत को अपने पति की पहचान बताती है और एक मर्मस्पर्शी पत्र राजा को देने के लिये उसे देती है। उपालंभ और दुःख से यह पत्र परिपूर्ण है। दूत पत्र लेकर राजमती को वचन देता है कि वह दुःख न करे क्योंकि वह उसके स्वामी को अवश्य लेकर लौटेगा। रानी उसे शकुन की सामग्री देती और विदा करती है। सातवें महीने दूत उड़ीसा पहुँचता है। राजा को रानी का पत्र देता है और कहता है कि "रानी राजमती ने यह संदेश भेजा है कि हे स्वामी ! तुम घर आओ। क्योंकि पुनः इस जीवन में यौवन लाभ कहाँ करोगे ?" पुनः दूत कहता है कि "हे राजा, यदि तुम आज नहीं चलते हो तो उस स्त्री का हृदय फट जायगा और वह (राजमती) मर जायगी।" राजा पंडित के इन शब्दों को सुनकर व्याकुल हो जाता है और उड़ीसा के राजा से घर लौटने की अनुमति चाहता है। उड़ीसा का राजा अपनी रानी को बुलाकर बीसलदेव के स्वदेश गमन की बात कहता है। रानी अनेक प्रकार से बीसलदेव को घर जाने से रोकती है। लेकिन बीसलदेव किसी प्रकार भी अब रहने को तैयार नहीं होता। तब उड़ीसा का राजा बीसलदेव से कहता है कि उसके नगर में एक ऐसा अपूर्व योगी है जो बहुत शीघ्र सांभर जा सकता है। बीसलदेव इस समाचार को सुनकर एक दिन के लिए उड़ीसा में रुक जाता है और उस योगी के हाथ राजमती के पास अपने आने का समाचार भेजता है। योगी राजा बीसलदेव का पत्र लेकर उड़ीसा से रवाना होता है और राज- मती की बायीं बाँह तथा आँख फड़क-फड़क कर इस बात की सूचना देती हैं कि या तो उसके स्वामी मिलेंगे या उनका कोई प्रेमपूर्ण पत्र ही प्राप्त होगा। योगी- १ नोट — रूपान्तर नं० २ में द्वितीय खण्ड की कथा यहीं समाप्त होती है।
– १४ – राजमती के शुभ शकुनों को सत्य प्रमाणित करता हुआ अजमेर पहुँच जाता है और राजमती को राजा का पत्र देता है। पत्र को राजमती गले से लगा लेती है और योगी को अच्छे भोजन आदि कराकर अपने प्रियतम की बातें पूछती है। योगी रानी को आज के तीसरे दिन राजा के अजमेर पहुँचने का शुभ समाचार देता है और अनेक प्रकार से रानी द्वारा पुरस्कृत होकर अपने स्थान को लौटता है। योगी के कथनानुसार राजा बीसलदेव तीसरे दिन अजमेर लौटता है। अजमेर में उस दिन बड़ी खुशियाँ मनायी जाती हैं। रानी राजमती के हर्ष की कोई सीमा नहीं रहती और वह यह सोचकर अपने मन में और भी हर्षित होती है कि पति के प्रवास की इस लम्बी अवधि में उसे कोई कलंक नहीं लगा जो कि इस यौवन और बढ़ती हुई विरह ज्वाला में लगना बहुत सहज और स्वाभा- विक था। कवि इसके पश्चात् कुछ पंक्तियों में प्रेम और प्रेमिका की उन दशाओं तथा बातों का वर्णन बड़े स्वाभाविक रूप से करता है जो प्रायः लम्बी अवधि के प्रवास के पश्चात् प्रेमी और प्रेमिका में होती हैं। अन्तिम पंक्तियों में कवि यह शुभकामना प्रकट करते हुए कि जिस प्रकार रानी राजा से मिली उसी प्रकार संसार में सभी मिलें ग्रन्थ समाप्त करता है। प्रथम रूपान्तर की कथा उपर्युक्त स्थान पर शेष हो जाती है। लेकिन द्वितीय रूपान्तर में इसके पश्चात् चतुर्थ खण्ड की कथा प्रारम्भ होती है। इस खण्ड में कवि हनुमान की वन्दना करके धार नगरी से राजा भोज का आना वर्णन करता है। बीसलदेव के अजमेर पहुँचने पर उसका भतीजा राजा बीसलदेव का स्वागत करता है। राजा उसे युवराज के पद पर स्थापित कर चित्तौड़ में उसे रहने का स्थान देता है। फिर राजा भोज को अजमेर आने के लिये पुरोहित के हाथ निमन्त्रण भेजता है। राजा भोज बीसलदेव के निमन्त्रण पर अजमेर आता है। दोनों राजा मिलकर अतीव प्रसन्न होते हैं। अजमेर में भी आनन्द मनाया जाता है। राजा भोज कुछ दिनों तक अजमेर में रहकर अपनी राजधानी को लौट जाता है, और राजमती को अपने साथ ले जाता है। तीन महीने पश्चात् फिर रानी राजमती को लेने बीसलदेव धार जाता है और रानी को लेकर वापस लौटता है। चतुर्थ खण्ड की कथा कवि यहीं पर यह आशीर्वाद देकर समाप्त करता है कि "जब तक पृथ्वी पर सूर्य उदय होते रहें, जब तक गंगा में जल प्रवाहित होता रहे, जबतक पृथ्वी पर जगन्नाथ रहें, तबतक राजा तुम अजमेर पर अविच्छन्न राज्य करते रहो।"