बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- ६३ - है। राजा के विरह में उसे अपने तन-मन का भी स्मरण नहीं रहता। सखियाँ उसे बहुत समझाती हैं लेकिन उसकी विरह वेदना किसी प्रकार कम नहीं होती।१ कवि इसके पश्चात् बारह महीनों का वर्णन करते हुए प्रत्येक महीने में रानी के विरह वेदना की विभिन्न परिस्थितियों का मर्मस्पर्शी वर्णन करता है। रानी की दशा तो राजा के विरह में इधर खराब होती है उधर राजा को रास्ते में शुभ शकुन होते हैं और वह अपनी यात्रा निर्विघ्न समाप्त करता चलता है। क्रमशः समय व्यतीत होता रहता है लेकिन रानी की व्यथा बढ़ती ही जाती है। उसके यौवन की दावाग्नि विरहाग्नि को द्विगुणित कर देती है। अन्त में वह राजा के पास एक दूत भेजती है। दूत को अपने पति की पहचान बताती है और एक मर्मस्पर्शी पत्र राजा को देने के लिये उसे देती है। उपालंभ और दुःख से यह पत्र परिपूर्ण है। दूत पत्र लेकर राजमती को वचन देता है कि वह दुःख न करे क्योंकि वह उसके स्वामी को अवश्य लेकर लौटेगा। रानी उसे शकुन की सामग्री देती और विदा करती है। सातवें महीने दूत उड़ीसा पहुँचता है। राजा को रानी का पत्र देता है और कहता है कि "रानी राजमती ने यह संदेश भेजा है कि हे स्वामी ! तुम घर आओ। क्योंकि पुनः इस जीवन में यौवन लाभ कहाँ करोगे ?" पुनः दूत कहता है कि "हे राजा, यदि तुम आज नहीं चलते हो तो उस स्त्री का हृदय फट जायगा और वह (राजमती) मर जायगी।" राजा पंडित के इन शब्दों को सुनकर व्याकुल हो जाता है और उड़ीसा के राजा से घर लौटने की अनुमति चाहता है। उड़ीसा का राजा अपनी रानी को बुलाकर बीसलदेव के स्वदेश गमन की बात कहता है। रानी अनेक प्रकार से बीसलदेव को घर जाने से रोकती है। लेकिन बीसलदेव किसी प्रकार भी अब रहने को तैयार नहीं होता। तब उड़ीसा का राजा बीसलदेव से कहता है कि उसके नगर में एक ऐसा अपूर्व योगी है जो बहुत शीघ्र सांभर जा सकता है। बीसलदेव इस समाचार को सुनकर एक दिन के लिए उड़ीसा में रुक जाता है और उस योगी के हाथ राजमती के पास अपने आने का समाचार भेजता है। योगी राजा बीसलदेव का पत्र लेकर उड़ीसा से रवाना होता है और राज- मती की बायीं बाँह तथा आँख फड़क-फड़क कर इस बात की सूचना देती हैं कि या तो उसके स्वामी मिलेंगे या उनका कोई प्रेमपूर्ण पत्र ही प्राप्त होगा। योगी- १ नोट — रूपान्तर नं० २ में द्वितीय खण्ड की कथा यहीं समाप्त होती है।