बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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एक दिन राज्य सभा धन सम्पत्ति के सम्बन्ध में रानी राजमती तथा बीसलदेव में वाद् विवाद चल पड़ता है। राजा गर्वपूर्वक कहता है कि उसके समान दूसरा भूपाल नहीं है। रानी इस गर्वोक्ति को सुनकर कहती है कि उसका यह गर्व व्यर्थ है, क्योंकि उससे विशेष धनी तो उड़ीसा का राजा है जिसके राज्य में हीरे ही हीरे खानों से निकलते हैं। उड़ीसा देश की यह वार्ता सुनकर राजा रानी से कहता है कि उसका (रानी का) जन्म तो जैसलमेर में हुआ और विवाह अजमेर में, अतएव वह उड़ीसा देश के सम्बन्ध में उपर्युक्त बातें क्योंकर जानती है। इस विषय में जब तक वह नहीं बतलायेगी तबतक वह (राजा) अन्न-पानी नहीं ग्रहण करेगा। राजा के इस आग्रह पर रानी अपने पूर्व जन्म की कथा बतलाती है कि कैसे वह पूर्व जन्म में हरिणी के रूप में उड़ीसा में रहती थी और कैसे एक बहेरी द्वारा मारे जाने पर उसने उड़ीसा में फिर जन्म न देने की दैव से प्रार्थना की थी तथा उसका धार नगरी में जन्म हुआ था। रानी की यह बात सुनकर राजा कहता है कि "हे गौरी तूने उपर्युक्त बातें कहकर मेरी निंदा की। अतः अब मैं तुझे छोड़कर बारह वर्षों तक प्रवास करूँगा। ताकि मैं भी हीरे की खान अपने घर ला सकूँ। राजा के इन वचनों को सुनकर रानी बड़ी दुःखी होती है और कवि इस स्थान पर ऐसी परिस्थितियों के उपस्थित होने पर नारी द्वारा अपने पति को प्रवास से रोकने के हेतु अपनाये गये सभी उपायों का वयान रानी राजमती से करवाता है। लेकिन राजा उसकी किसी बात पर ध्यान नहीं देता और प्रवास के लिये हठ धरता है। अन्त में राजमती की भावज भी राजा को अनेक प्रकार से समझा बुझा कर और कुछ कटुवी बातें कहकर उसे परदेश गमन से रोकने की चेष्टा करती है। फिर भी राजा परदेश गमन का हठ नहीं त्यागता। राजा ज्योतिषी को बुलाकर यात्रा के लिये शुभ दिन और मुहूर्त पूछता है। लेकिन रानी ज्योतिषी से इसके पहले ही राजा की यात्रा का मुहूर्त चार महीने पश्चात् बतलाने का आग्रह कर चुकी थी क्योंकि उसे पूर्ण विश्वास था कि इन चार महीनों के अन्दर वह अपने पति को परदेश जाने से रोक सकने में समर्थ हो सकेगी। ज्योतिषी रानी के आग्रानानुसार ही राजा को चार महीने पश्चात् का यात्रा का मुहूर्त बतलाता है। कात्तिक मास में ज्योतिषी द्वारा बताये गये शुभ मुहूर्त में राजा परदेश गमन करता है। भीगे हुए नेत्रों से रानी राजा को विदा करती है और नीति की शिक्षा देती है। राजा को विदा करके रानी की अवस्था बड़ी दुःखद हो जाती