भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 315 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 64
  • ३० - दशकों व रोदियों' पर अन्ध विश्वास करते थे ।¹" किन्तु जिस प्रसंग के साथ उपर्युक्त पंक्ति का उल्लेख है उससे तो यही सिद्ध होता है कि बीसलदेव राजमती के सौन्दर्य की ओर इंगित कर रहा है, न कि बारह वर्ष की अवस्था में उसके विवाह की ओर। बारह वर्ष की अवस्था का उल्लेख कवि इसलिए करता है कि इस अवस्था में नारी का सौन्दर्य एक विशेष प्रकार का होता है। यह अवस्था ऐसी होती है जब बाल्यावस्था का प्रस्थान तथा किशोरावस्था का आगमन होता है। और ऐसी स्थिति में सौन्दर्य का निखर कर मनमोहक हो उठना स्वाभाविक होता है। फिर कवि-जगत् तो इस अवस्था का सर्वदा प्रशंसक रहा है। अस्तु, इस अवस्था का उल्लेख तो ऐसा ज्ञात होता है कि कवि भारह ने कवि परम्परा के निर्वाह के लिये ही किया है। अवस्था के क्रम को लेकर किसी ऐतिहासिक तथ्य से उसे जोड़ना उचित नहीं जान पड़ता और न तो इससे बीसलदेव चतुर्थ से कोई सम्बन्ध स्थापित कर ग्रन्थ की रचनातिथि वि० सं० १२१२ मानना ही उचित है। बीसलदेव रासो की दोनों रूपान्तरों में समान रूप से पायी जाने वाली उपर्युक्त ऐतिहासिक घटनाओं के अतिरिक्त रूपान्तर न० २ में कुछ और ऐसी घटनाएँ हैं जिनको लोग इतिहास से सम्बन्धित बताते हैं। ऐसी घटनाओं में से प्रथम घटना बीसलदेव द्वारा अपने पिता के श्राद्ध और पिंडदान की है जिसे वह उड़ीसा जाने के पूर्व करता है। इस घटना के जरिये श्री सत्यजीवन जी वर्मा ने यह सिद्ध किया है कि बीसलदेव का उड़ीसा प्रवास बारह वर्ष नहीं माना जा सकता। कवि ने यों ही बारह वर्ष लिख दिया है जैसे राम के प्रवास के चौदह वर्ष ।२ निसन्देह इस सम्बन्ध में श्री सत्यजीवन जी वर्मा द्वारा उपस्थित किया हुआ तर्क स्तुत्य है लेकिन इस घटना का इतिहास के साथ योग करने का उनका प्रयास निष्फल परिश्रम है। इस सम्बन्ध में उनका यह मानना कि बीसलदेव का उड़ीसा गमन १२०७ या १२०८ में हुआ, इतिहास की ग्रन्थियों को खोलने के बजाय और कस देता है। दूसरी घटना बीसलदेव की अवस्था से सम्बन्धित है जो बीसलदेव के उड़ीसा गमन के पश्चात् राजमती द्वारा पांडे को पत्र देकर उड़ीसा जाते समय १-नोट-यह अन्धविश्वास हिन्दुओं में मुस्लिम काल से प्रारम्भ हुआ है। २-बीसलदेव रासो-सं० सत्यजीवन वर्मा-पृ० १८ भूमिका।