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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 315 में से

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पृष्ठ 62

– ५५ – उड़ीसा जाने की कथा के साथ बीसलदेव रासो में लेखक यह भी कहता है कि उड़ीसा जाते समय बीसलदेव ने अपना राज्य अपने भतीजे को सौंपा था । लेकिन कवि की यह उक्ति भी उसको इतिहास से अनभिज्ञता सिद्ध करती है, क्योंकि इतिहास में कहीं भी बीसलदेव तृतीय या चतुर्थ द्वारा अपने भतीजे को राज्य सौंपने की कथा नहीं मिलती । लेकिन इस प्रसंग को भी सत्य प्रमाणित करने तथा ग्रंथ के नायक बीसलदेव चतुर्थ को मानने के लिये श्री सत्यजीवन वर्मा जी यह तर्क उपस्थित करते हैं कि "बीसलदेव के उड़ीसा जाने का समय यदि हम विक्रम संवत् १२०७-८ ही मानें तो उस समय उसके पुत्र अमर गांगेय का जन्म नहीं हुआ था, यह मानना पड़ेगा । और यदि हम उड़ीसा प्रवास के बाद बीसलदेव का लौटना संवत् १२१२ ही मानें, तो उस समय भी उसके पुत्र का होना नहीं मान सकते । संभव है कि उसके पुत्र का जन्म उसके पश्चात् हुआ हो । ऐसा हो भी सकता है, क्योंकि बीसलदेव के पश्चात् उसके पुत्र का कोई शिलालेख नहीं मिलता । इससे यह अनुमान होता है कि उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र की मृत्यु अल्प काल ही में हुई होगी । बीसलदेव और उसके पुत्र दोनो की मृत्यु संवत् १२२१ और १२२४ के बीच किसी समय हुई, यह निश्चित है ।१ अब यदि अमर गांगेय की अवस्था मृत्यु के समय दस या बारह वर्ष मानी जाय, तो उसका जन्म १२१२ के बाद ही होगा । अतएव बीसलदेव रासो के निर्माण काल के समय बीसलदेव के पुत्र का जन्म नहीं हुआ था, इसीलिये उसे अपने भतीजे को राजभार सौंपना पड़ा था । लेकिन इतिहास से यह बात सिद्ध होती है कि बीसलदेव चतुर्थ के, जिसकी मृत्यु सं० १२२० ( ई० सन् ११६३) में हुई, बाद उसका पुत्र अमर गांगेय राजगद्दी पर बैठा । लेकिन जगदेव के पुत्र पृथ्वी भट्ट (पृथ्वीराज द्वितीय) ने उससे राजगद्दी छीन ली और स्वयं राजा बन बैठा । मेवाड़ राज्य के जहाजपुर जिले के धौड़ गाँव के पास रूठी रानी के मन्दिर के स्तम्भ पर वि० संवत् १२२५ का एक लेख खुदा है। जिसमें पृथ्वीराज को अपने भुजबल से साकम्भरी के राजा को जीतने वाला लिखा है ।२ इससे यही सिद्ध होता है कि १-बीसलदेव रासो—स० सत्यजीवन वर्मा—भूमिका पृ० २२ । २-अजमेर हिस्टोरिकल एण्ड डिस्क्रिप्टिव लेखक एच० बी० सारदा-पृ० १४५

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