भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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शाह की लाट पर बीसलदेव चतुर्थ द्वारा खुदवाए हुए लेख की पंक्तियों से यह भी ज्ञात होता है कि उसने आर्यावर्त को मुसलमानों से रहित कर विन्ध्य से लेकर हिमालय तक की भूमि विजय की । लेकिन इस शिलालेख में कहीं भी उड़ीसा विजय का प्रसंग नहीं आता । फिर आर्यावर्त को मुसलमानों से रहित करने का यह अर्थ नहीं होता कि भारत के प्रत्येक प्रान्त पर विजय प्राप्त की जाय । दिल्ली पर विजय प्राप्त करना ही यह अर्थ रखता था—कि सारे भारत- वर्ष पर विजय प्राप्त कर ली गई । और इतिहास के पन्ने तो यह भी सिद्ध करते हैं कि बीसलदेव चतुर्थ ने दिल्ली जिसमें हरियांक—आजकल हरियाणा कहा जाने वाला प्रदेश—शामिल है तोमर राजपूतों से जीता था । इसके समय तक दिल्ली में मुसलमानों की राजधानी नहीं बनी थी । महमूद गज़नवी अवश्य समय-समय पर भारतवर्ष पर हमला करता था और लुटेरे के समान धन लूट कर अपने देश को लौट जाता था । संभव है कि इसके साथ बीसलदेव चतुर्थ की कोई लड़ाई हुई हो और इसको पराजित कर बीसलदेव ने आर्यावर्त को इसके जैसे लुटेरे से स्वतन्त्र किया हो और इसी का उल्लेख फिरोजशाह की लाट में हो । अस्तु, किसी भी अवस्था में यह नहीं स्वीकार किया जा सकता कि बीसलदेव चतुर्थ का उड़ीसा गमन ऐतिहासिक रूप से प्रामाणिक है तथा यह भी नहीं कहा जा सकता कि सुधायें बीसलदेव चतुर्थ उड़ीसा जाने के पूर्व सात वर्ष तक बाहर रहा । सम्भव है कि विन्ध्य से लेकर हिमालय तक के प्रदेशों को म्लेच्छों के आक्रमण से मुक्त करने में उसे अपने राज्य से बाहर जाने की भी आवश्यकता न पड़ी हो क्योंकि मुसलमानों के आक्रमण का द्वार तो अजमेर ही था और इस प्रकार उनके (मुसलमानों के) आक्रमण का सामना तो उसे अपने किले में ही बैठ कर करना पड़ा होगा । इसलिए उसके सात वर्ष तक बाहर रहने की कथा जिसका उल्लेख बीसलदेव रासो में हुआ है और जिसे श्री सत्यजीवन वर्मा ने सत्य प्रमाणित करने का प्रयत्न किया है सत्य नहीं प्रतीत होती । इसके अतिरिक्त श्री सत्य- जीवन जी वर्मा के उस तर्क में तो कोई सार ही नहीं दिखाई पड़ता, जहाँ वे कहते हैं कि बीसलदेव का राज्य काल सं० १२१० से १२२० तक माना जाता है, लेकिन इसने इन्हीं दश वर्षों में विन्ध्य से लेकर हिमालय तक की भूमि विजय की हो और आर्यावर्त को मुसलमानों से रहित किया हो, यह माननीय नहीं है ।¹ क्योंकि अपने इस तर्क के लिये ये कोई पुष्ट प्रमाण नहीं उपस्थित करते । १. बीसलदेव रासो—स० सत्यजीवन वर्मा—भूमिका पृ० २०