बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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लेकिन उपर्युक्त तर्क को उपस्थित करते हुए विद्वान् लेखक ने कहीं यह सिद्ध करने का प्रयास नहीं किया कि बीसलदेव चतुर्थ की रानी का नाम राजमती उसे इतिहास में मिला है अथवा जैसलमेर नगर के बसाने वाले महाराज जयसलदेव के भतीजे रावल भोजदेव की कन्या का नाम इतिहास में कहीं उसे राजमती मिलता है। तब फिर क्यों कर बीसलदेव चतुर्थ का सम्बन्ध भोजदेव (रावल) से स्थापित किया जाय । अब रही बात कवि द्वारा राजमती को जैसलमेर की राजकुमारी कहने की। इस सम्बन्ध में तो ग्रन्थ के रचयिता ने ही ऐसी द्विविधा पैदा कर दी कि किसी निष्कर्ष पर पहुँचना कठिन जान पड़ता है। जहाँ कवि ने राजमती को जैसलमेर की राजकुमारी कहा है वहाँ ही वह राजा बीसलदेव के 'धार नगरी' में राजमती से ब्याह करने के लिये जाने की भी बात कहता है।१ ऐसी स्थिति में प्रक्षिप्त का सहारा लेकर कुछ भी कहना ठीक न होगा। डा० माता- प्रसाद जी गुप्त ने अनेक छान-बीन के पश्चात् केवल १२८ पदों को ही प्रामाणिक माना है। लेकिन इन्हीं प्रामाणिक पदों में ही जैसलमेर में राजमती के जन्म की बात तथा धार के राजा भोज की पुत्री होना दोनों बातें आती हैं। सम्भव है कि जैसलमेर विजय करने के लिये राजा भोज (मालवाधिपति) कभी गये हों और वहीं उन्हें कन्या-रत्न की प्राप्ति हुई हो और इसी कारण कवि ने ऐसा कहा हो अथवा यह भी सम्भव है कि राजमती को जैसलमेर की कुमारी कहकर कवि ने लक्षणा के सहारे यह कहने की चेष्टा की हो कि जैसलमेर की सुन्दरियों जैसी सुन्दर राजमती थी। “मारवाड़ नरनीपजै, नारी जेसलमेर । मिन्धा तुरही सांतरां, फेरहूल बीकानेर ॥” ग्रन्थ में वर्तमानकालिक क्रियाओं के प्रयोग के आधार पर कुछ विद्वान् ग्रन्थ के रचयिता को बीसलदेव का समकालीन तथा बीसलदेव को विग्रहराज चतुर्थ मानते हैं जिनका समय अनेक शिलालेखों तथा इतिहास से सं० १२२० से सं० १२३१ प्रमाणित हो चुका है।२ लेकिन इस तर्क को मान लेने में यह असमंजस उपस्थित होता है कि ग्रन्थ का रचना काल जो कुछ प्रतियों में प्राप्त है और जिसके आधार पर उपर्युक्त
१-राजा उतरय उथार मँझारि। मन माहे हरषियउ राजकुमारि ॥१६॥ —बीसलदेव रासो—सं० माताप्रसाद गुप्त । २-फीरोजशाह की लाट पर खुदवाया हुआ विग्रहराज चतुर्थ का लेख । वि० सं० १२२० वैशाख सुदी गुरुवार ॥