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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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तर्क उपस्थित किया गया है वह 'बारह सै बहोत्तर' है जिसका अर्थ कुछ विद्वानों ने १२१२ तथा कुछ ने १२०२ लगाया है। परन्तु यदि 'बारह सै बहो- तर' का अर्थ १२१२ माना जाय तब तो बीसलदेव चतुर्थ के राज्यकाल से ८ वर्ष पूर्व, और यदि १२०२ अर्थ लगाया जाय तो ४१ वर्ष बाद इस ग्रन्थ की रचना सिद्ध होती है; ऐसी अवस्था में कवि की समकालीनता का दावा कहाँ तक ठीक होगा यह विवाद का विषय बन जाता है। फिर डा० उदयनारायण जी तिवारी का तो यह भी कहना है कि जहाँतक क्रियाओं के प्रयोग का सम्बन्ध है, अनेक ग्रन्थ ऐसे मिलते हैं जिनमें समकालीन न होने पर भी वर्तमानकालिक क्रियाओं का प्रयोग मिलता है। प्रायः घटनाओं को सत्य का रूप देने के लिए ही कवियों ने ऐसा किया है।१ अजमेर के बसने का प्रश्न उठाकर कुछ विद्वान् कहते हैं कि चूंकि विग्रहराज तृतीय के समय अजमेर बसा नहीं था इसलिये इस ग्रन्थ के नायक बीसलदेव तृतीय नहीं हो सकते। ऐसे विद्वानों के मतानुसार अजमेर नगर विग्रहराज तृतीय के पश्चात् महाराज अजयराज ने बसाया था।२ इसमें तो सन्देह नहीं कि वि० सं० ११९५ (ई० स० ११०८) के लगभग चौहान अजयदेव ने अजमेर बसाकर उसे इस वंश की राजधानी बनाया। लेकिन कवि जहाँ गढ़ अजमेर का उल्लेख करता है वहीं बीसलदेव के लिये 'सम्भरीराव' का भी।३ और बीसलदेव, शाकंभरीश्वर या सांमरीराज अपने वशज वासुदेव के अहिच्छत्रपुर से शाकंभरी (सांभर) में आकर अपना राज्य स० ७५१ के लगभग कायम कर लेने के पश्चात् ही कह- लाने लगे थे।४ ज्ञात तो ऐसा होता है कि कवि को अजमेर बसने की तिथि का ज्ञान न था। और चूंकि कवि ने ग्रन्थ की रचना, विग्रहराज तृतीय के समर्थक १—वीर काव्य—प० उदयनारायण तिवारी—पृ० १६० । २—हमारा हिन्दी साहित्य—भवानीशंकर त्रिवेदी—पृ० ५१ । ३—मारवाड़ का इतिहास—पं० विश्वेश्वरनाथ रेउ—पृ० ६-१२ । ४—गरब करि बोलियउ सम्भरि बाल । मो सारिखउ नहीं अवर भुपाल ॥ म्हां परि सम्भरि उमडइ । चितु दिसइं थांपा रे जेसलमेर । लाल तुरीय पायर पडइ । गोरी राजकउ वइसणउ गढ़ अजमेर ॥ ३८ ॥ बीसलदेव रास सं०, डा० माताप्रसाद गुप्त ।