बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- ५९ - तृतीय । इतिहास में अवश्य आनासागर के लिये यह लिखा गया है कि इसे सम्राट् पृथ्वीराज के दादा अर्णोराज या अनाजी ने बनवाया था।$^१$ लेकिन डा० श्यामसुन्दरदास जी का कहना है कि अनाजी द्वारा बनवाया गया अनासागर उस अनासागर से बिल्कुल भिन्न है जहाँ बीसलदेव ने धार से लौटते समय विश्राम किया था । धार से लौटते समय बीसलदेव ने जिस अनासागर पर विश्राम किया था वह अनासागर हिन्दुओं की 'अन्ना' या 'अन्नपूर्णादेवी' के नाम पर एक प्राकृतिक झील है जिसके किनारे पुराकाल में 'वाया' ऋषि रहते थे ।$^२$ बीसल- देव रासो में उल्लिखित 'अनासागर' के वाद-विवाद में पड़ना उस समय बिल्कुल निरर्थक जान पड़ता है जब हम यह देखते हैं कि रूपान्तर न० २ के जिस सर्ग ( चतुर्थ सर्ग ) में इसका उल्लेख है वह पूर्ण सर्ग ही प्रक्षिप्त है । उपर्युक्त ऐतिहासिक घटनाओं के विवेचन से निष्कर्ष यह निकलता है कि बीसलदेव रासो में उल्लिखित घटनाओं का सम्बन्ध इतिहास से बहुत कम है अथवा यह भी कहा जा सकता है कि ग्रन्थ के रचयिता को इतिहास का ज्ञान यथेष्ट न था । अतः इन घटनाओं के आधार पर बीसलदेव रासो के निर्माणकाल का निर्णय करना खतरे से खाली नहीं । काव्यागत कथा एवं काव्य का रचयिता नारी के चरित्र को समझना साधारण मनुष्यों के लिए तो दूर काव्य के मूल वेदों के रचने वाले कवियों$^३$ के लिए भी एक समस्या है । ऐसा प्रतीत होता है कि नारी के चरित्र की विषमताओं को देखकर ही किसी कवि ने कहा था कि "स्त्रियाश्चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं देवो न जानाति कुतो मनुष्यः ।" बीसलदेव रासो की कथा भी रानी राजमती के चरित्रविशेष का वह उद्घाटन है जिसके कारण चौहानवंशी पराक्रमी राजा बीसलदेव को भी अपना राजपाट छोड़ कर बारह वर्षों तक बाहर रहना पड़ा था । नारी की वाणी ही उसके द्वारा प्राप्त किये हुए सारे सद्गुणों को नष्ट कर देती है । कवि नारह कहता है कि :- १-Ajmer Historical & Descriptive-H B Sarada P 60 २-हिन्दी हस्तलिखित खोज ग्रन्थों की रिपोर्ट सन् १६०१ पृ० ७८ । ३-वेद काव्य का मूल है, अतएव सच्चिदानन्द घन श्री परमेश्वर द्वारा ही लोक में सबसे प्रथम इसकी प्रवृत्ति हुई है । काव्यकल्पद्रुम-प्रथम भाग पृ० ८.