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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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पृष्ठ 77
  • ७० - और इस प्रकार वह अपने ज्योतिष ज्ञान को प्रकट करने हुए उस नेत्रात्मक रोहिणी नक्षत्र की ओर संकेत करता है जो क्रान्ति वृत्त का ही एक भाग है और जिसका स्पर्शात्मक संबंध सूर्य्यके साथ प्रतिवर्ष एक बार होता ही रहता है और जिसका फल शास्त्रों में प्रायः शुभ माना गया है। इस प्रकार जहाँ कवि ने अपने ज्योतिष-ज्ञान को प्रकट किया है, वहीं उसने गणपति की वन्दना के साथ सौन्दर्य, आकर्षण और शुभ के प्रतीक रोहिणी नक्षत्र का यश के प्रतीक सूर्य से सम्बन्ध बताकर इस ओर भी संकेत किया है कि उसका यह काव्य सुन्दर, आकर्षक, मगलमय तथा यश का देने वाला है। एक दूसरे पद्य में राजा' बीसलदेव के विदेश गमन के लिये शुभ तिथि को बताते हुये कवि ने फिर अपने ज्योतिषी होने का प्रमाण दिया है। परन्तु, इन प्रमाणों के रहते हुए कवि को ज्योतिषी स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं उठायी जा सकती और तब कवि को ब्राह्मण मानना ही ठीक होगा। यहाँ यह कहना असंगत न होगा कि इस रासो में ऐसे अनेक स्थल आये हैं जहाँ यदि कवि 'जोसी' वर्ग का होता तो दानादि द्वारा दुष्ट ग्रहों की शान्ति की बात करता। लेकिन ऐसा उसने किया नहीं है। इसलिये वह 'जोसी' वर्ग का नहीं था यह सिद्ध है। सं० १६३३ वाली प्रति में जिस प्रकार नाह्मण जोइसी आदि शब्द कवि क साथ युक्त हैं उसी प्रकार स० १६६९ वाली प्रति में व्यास शब्द युक्त है कवि के साथ। व्यास शब्द पुल्लिंग है और बना हुआ है वि + अस् + घञ् के संयोग से जिसका अर्थ होता है पाठक प्रवक्ता। 'शब्दकल्पद्रुम' में भविष्य पुराण के एक पद को उद्धृत करके व्यास के लक्षणों को बतलाया गया है। विस्पष्टमद्रुत शान्त स्पष्टाक्षर पदं तथा। कलस्वरसमायुक्तं रसभावसमन्वितम् ॥

१- मास च्यार राजा दिन नहीं। तिथि तेइस अरु मगलवार ॥ इग्यारउ चन्द्र थारा घोडलाजोग ॥ नाँका लाभइ नहीं। पूपि नक्षत्र अरु कातिक मास ॥ तिण दिन राजा के गम करउ ॥ वउ आग्लउ राठ पूरइ थारी आस ॥५॥