भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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पृष्ठ 78
  • ७१ - बुद्ध्यमान : सदर्थे वै ग्रन्थार्थं कृतशो नृप । ब्राह्मणादिषु सर्वेषु ग्रन्थार्थं धारयेन्नृप ॥ यः एव वाचयेद् ब्रह्मन् स विप्रो व्यास उच्यते । अर्थात् अन्य अनेक लक्षणों के साथ-साथ व्यास का ब्राह्मण होना भी आवश्यक है। मोनियर-विलियम्स ने भी अपने द्वारा सम्पादित शब्दकोष Sanskrit English Dictionary में लिखा है कि "Vyas— Masc = A Brahmin who recites or expounds the Pur- anas etc. in public. हिन्दी शब्द सागर में भी उपयुक्त अर्थ की पुष्टि की गयी है। इसमें कहा गया है कि व्यास वह ब्राह्मण है जो रामायण, महा- भारत या पुराणों आदि की कथा लोगों को सुनाता हो । अस्तु, कवि को चाहे 'जोइसी' 'जोहसो' कहा जाय अथवा व्यास, इसमें सन्देह नहीं कि यह वयसुचीन ब्राह्मण था । काव्य-सौष्ठव बीसलदेव रासो हिन्दी जगत् की वह अमूल्य निधि है जो हमें आज से शताब्दियों पूर्व के भारत की अवस्था का दिग्दर्शन कराने में समर्थ है। जहाँ इसमें कोलाहलपूर्ण ऐतिहासिक वाद-विवादों की सृष्टि होती है, ताम्रपत्रों, वंशावलियों तथा शिलालेखों के जाँच की आवश्यकता पड़ती है वहीं काव्यगत रस, अलंकार, छन्द तथा वस्तु वर्णन आदि की अभिव्यञ्जना का समावेश भी है। खेद है कि कुछ विद्वानों ने इस ग्रन्थ को काव्य की कसौटी पर भलीभाँति न कस कर इसका साहित्यिक मूल्य न्यून समझा है।१ अस्तु, इसके साहित्यिक मूल्यांकन के लिए आवश्यक यह है कि समूचे ग्रन्थ को काव्य की कसौटी पर कसा जाय । १. क—यह कोई काव्य ग्रंथ नहीं केवल गाने के लिए रचा गया था । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल—हि० सा० इ०-पृ० ३० । ख—इसका विशेष साहित्यिक मूल्य नहीं है।—श्री सत्यजीवनवर्मा—बीसलदेव रासो पृ० ४३ । ग—न तो इसमें किसी प्रकार का साहित्यिक सौष्ठव है और न वर्णनों में किसी प्रकार की रोचकता मिलती है ।—डॉ० उदयनारायण तिवारी— वीर काव्य—पृ० १४६ ।