भारतकोश
संग्रह पर लौटें

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
  • ७१ - बुद्ध्यमान : सदर्थे वै ग्रन्थार्थं कृतशो नृप । ब्राह्मणादिषु सर्वेषु ग्रन्थार्थं धारयेन्नृप ॥ यः एव वाचयेद् ब्रह्मन् स विप्रो व्यास उच्यते । अर्थात् अन्य अनेक लक्षणों के साथ-साथ व्यास का ब्राह्मण होना भी आवश्यक है। मोनियर-विलियम्स ने भी अपने द्वारा सम्पादित शब्दकोष Sanskrit English Dictionary में लिखा है कि "Vyas— Masc = A Brahmin who recites or expounds the Pur- anas etc. in public. हिन्दी शब्द सागर में भी उपयुक्त अर्थ की पुष्टि की गयी है। इसमें कहा गया है कि व्यास वह ब्राह्मण है जो रामायण, महा- भारत या पुराणों आदि की कथा लोगों को सुनाता हो । अस्तु, कवि को चाहे 'जोइसी' 'जोहसो' कहा जाय अथवा व्यास, इसमें सन्देह नहीं कि यह वयसुचीन ब्राह्मण था । काव्य-सौष्ठव बीसलदेव रासो हिन्दी जगत् की वह अमूल्य निधि है जो हमें आज से शताब्दियों पूर्व के भारत की अवस्था का दिग्दर्शन कराने में समर्थ है। जहाँ इसमें कोलाहलपूर्ण ऐतिहासिक वाद-विवादों की सृष्टि होती है, ताम्रपत्रों, वंशावलियों तथा शिलालेखों के जाँच की आवश्यकता पड़ती है वहीं काव्यगत रस, अलंकार, छन्द तथा वस्तु वर्णन आदि की अभिव्यञ्जना का समावेश भी है। खेद है कि कुछ विद्वानों ने इस ग्रन्थ को काव्य की कसौटी पर भलीभाँति न कस कर इसका साहित्यिक मूल्य न्यून समझा है।१ अस्तु, इसके साहित्यिक मूल्यांकन के लिए आवश्यक यह है कि समूचे ग्रन्थ को काव्य की कसौटी पर कसा जाय । १. क—यह कोई काव्य ग्रंथ नहीं केवल गाने के लिए रचा गया था । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल—हि० सा० इ०-पृ० ३० । ख—इसका विशेष साहित्यिक मूल्य नहीं है।—श्री सत्यजीवनवर्मा—बीसलदेव रासो पृ० ४३ । ग—न तो इसमें किसी प्रकार का साहित्यिक सौष्ठव है और न वर्णनों में किसी प्रकार की रोचकता मिलती है ।—डॉ० उदयनारायण तिवारी— वीर काव्य—पृ० १४६ ।
  • ७२ - वस्तु-वर्णन काव्यों में प्रायः ऐसा देखा जाता है कि विवरण के लिये कवि या तो स्वयं वस्तुओं का वर्णन करता है अथवा पात्रों द्वारा उनका वर्णन करवाता है । वस्तु-वर्णन की कुशलता काव्य में जीवन डालकर उसे सरस बनाने में समर्थ होती है । बीसलदेव रासो में फुटकर वर्णनों का ताँता तो नहीं है लेकिन दो चार स्थल ऐसे अवश्य हैं जहाँ कवि ने स्वयं वस्तुओं का वर्णन किया है अथवा पात्रों द्वारा उनका वर्णन करवाया है । देखिये :- विवाह वर्णन—रासो में राजमती और बीसलदेव के विवाह का वर्णन हमें विस्तारपूर्वक मिलता है। हिन्दू-जाति की परम्पराओं के अनुसार कन्या के बढ़ते ही उसके घरवालों को कन्या के विवाह की व्यग्रता (विशेष कर उसकी माता को) से प्रारम्भ कर वर की खोज, ब्राह्मण द्वारा लग्न भेजना, तिलक, बारात की तैयारी तथा यात्रा, अगवानी, कन्यादान, भांवरी, दान, दहेज और वधू की विदाई आदि के वर्णन पढ़ने को मिलते हैं। विवाह का वर्णन कवि ने तत्कालीन भारत के दो प्रमुख शासकों विग्रहराज और भोज की मर्यादा के अनुकूल किया है । इसलिए इस वर्णन में हमें राजसी ठाट बाट का चित्र मिलता है। सांभर नरेश की बारात का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि— "पूजियो गणपवि चालीधर जान । छहइ चउरासीय हुण जी मान ॥ असी सहस घोड़ा घड़ा । साठ सहस पालकी अपारि ॥ गूजर गहड़ चाल्या घणा । रायराण तण अंत न पार ॥" विवाह वर्णन में जहाँ कवि ने राजसी ठाट बाट का दृश्य उपस्थित किया है वहाँ प्रथम, द्वितीय, तथा तृतीय भांवर के समय राजा भोज द्वारा सांभर नरेश को दहेज स्वरूप देशों को दिखाते समय यह भूल गया कि वह जिन देशों का दहेज दिला रहा है वे राजा भोज के अधिकार में थे भी या नहीं। षड् ऋतु—बारह मास वर्णन—राजा बीसलदेव के प्रवास-काल के पश्चात् रानी राजमती के विरह का वर्णन करते समय कवि ने षड्ऋतुओं का वर्णन, उनमें प्राकृतिक उद्दीपन होने के कारण, रानी के विरह की व्यथा को प्रभावोत्पादक बनाने के लिये किया है। विरहाग्नि राजमती को प्रत्येक मास में सताती है ।

An exact line-by-line transcription of the text from the image:

  • ७३ - विरह में राजमती का शरीर क्षीण हो गया है, और उसे माघ मास में तुषार- पात के कारण दग्ध वनखण्ड को देखकर संसार दग्ध हुआ दिखाई पड़ता है। देखिये, यह कहती है :- "माह मास इसीय पड़इ ठंडार । दाधा छइ वनषण्ड कीधा हो छार । आप दहंती जग दहाउ । म्हा की चोली य मांहि थी दाधउ छइ गात्र । घणीय विहुणी गण तांकिजइ । तूँ तउ छयड्ढाउ रे भाविउयो करह पलाणी जोवन छत्र उमाहियउ । म्हाकी कनक काया माहे फेरथी आण ।" रानी राजमती को माघ की तरह वर्ष का प्रत्येक मास पीड़ा पहुँचाता है और वह विरहाग्नि में जल जल कर छटपटाती है। अन्त में वह ईश्वर से मर्म भरी प्रार्थना करती है। वह 'उलगणा की नारी' (प्रवासी की पत्नी) को छोड़कर और जिसका भी चाहे सृजन करें। देखिये कसक, व्यथा और दर्द भरा उसका उलाहना- "अजी जनम काइ दीयउ रे महेस । अवर जनम थारइ घणा रे नरेस । वनिन सिरजी रोझणी । घणहन सिरजी धवलीय गाइ । वनिहन सिरजी कोइली । हस बइमती आघा नइ चम्पा की डाल । भंपती दाप बिजोरणी । सइतउ काइ सिरजो उलगाणा की नारि ॥" कवि नल्ह का प्रस्तुत षड्ऋतु-वर्णन न तो कवि जायसी के पद्मावत के 'षड्ऋतु-वर्णन और नागमती वियोग खण्ड' के लम्बे-चौड़े वर्णन के समान ईश्वर से मिलन और उनके वियोग के मिस है, न भक्तप्रवर तुलसी के मानस के किष्किन्धा काण्ड के पावस और शरद् के वर्णन की भाँति नीति और भक्ति का उपदेशक, और न रीतिकालीन कवियों की तरह शब्दालंकारो तथा अर्थालंकारों के घटाटोप में मन और बुद्धि को कुछ क्षणों के लिए आच्छादित करने वाला, वरन्
  • ७४ - है अपने ढंग का आकर्षक, मुख्य कथा से जुड़ा हुआ स्वाभाविक और प्रासंगिक, तथा हृदय पर गहरा प्रभाव डालने वाला । यहाँ इस कथन में भी अतिशयोक्ति न होगी कि षड्ऋतु-वर्णन की परम्परा का प्रारम्भ करने का श्रेय हिन्दी साहित्य में सर्वप्रथम कवि नरह को ही है; यदि हम बीसलदेव रासो को हिन्दी साहित्य का प्राचीनतम ग्रंथ मानते हैं, जिसे ऐसा मानने में हमें तब तक कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए जब तक इसे खण्डित करने के लिए कोई पुष्ट प्रमाण न मिल जाय । चरित्र-चित्रण दृश्य काव्यों में महाकाव्य के अतिरिक्त अन्य काव्यों में समग्र रूप से किसी चरित्र का चित्रण सम्भव नहीं होता । चरित्र-चित्रण के दो प्रकार होते हैं एक 'आदर्श' और दूसरा 'यथार्थ' । 'आदर्श' चरित्र-चित्रण में कवि अपनी भावना के अनुसार अपने काव्य के नायक अथवा नायिका के चरित्र में किसी प्रकार का दोष अथवा कोई त्रुटि नहीं आने देता । लेकिन 'यथार्थ' चरित्र के चित्रण के लिये कवि को अपने काव्य के लिये ऐसे नायक या ऐसी नायिका को चुनना पड़ता है जिसका सम्बन्ध संसार में नित्य प्रति देखे जाने वाले चरित्र के यथातथ्य रूप से होता है । 'आदर्श' चरित्र के भी दो प्रकार हैं-एक तो जातीय, राष्ट्रीय, सामाजिक और धार्मिक विचारों का अधिक से अधिक पूर्ण रूप से समन्वय करने वाला 'लोकादर्श चरित्र' जैसे रामचरित मानस के राम का और दूसरा उस ढंग के समन्वय या लौकिक औचित्य की भावना को गौण करके कोई एक भाव पराकाष्ठा तक पहुँचाने वाला 'ऐकान्तिक आदर्श चरित्र' ।¹ ऐसे ऐकान्तिक चरित्र धर्म और अधर्म दोनों के आदर्श हो सकते हैं जैसे धर्म के आदर्श सीता, भरत, हनुमान आदि एवं अधर्म का आदर्श रावण । बीसलदेव रासो के नायक और उसकी नायिका का चरित्र-चित्रण 'यथार्थ' की कोटि में आता है । इस रासो के नायक राजा बीसलदेव एक ऐतिहासिक पुरुष हैं । ग्रंथ की रचना-तिथि पर विचार करते हुए विशद रूप से इस बात पर भी विचार किया गया है कि ग्रन्थ के नायक कौन से बीसलदेव हो सकते हैं, तथा इस निष्कर्ष पर भी पहुँचना पड़ा है कि इस रासो के नायक बीसलदेव तृतीय हैं । यहाँ १. रेवातट — पृथ्वीराजरासो—सं० डा० विपिनबिहारी त्रिवेदी—भूमिका पृ० ४२ ।
  • ७५ -

उन ऐतिहासिक तथ्यों की पुनरुक्ति न होगी यदि यह कहा जाय कि इतिहास में बीसलदेव चतुर्थ का जो चरित्र हमें प्राप्त होता है उसका कोई वर्णन इस रासो में नहीं है। इतिहास के अनुसार बीसलदेव चतुर्थ बड़ा वीर और प्रतापी राजा था। उसने मुसलमानों से कई लड़ाइयाँ लड़ी थीं और उत्तर पश्चिम भारत में पुनः एक बार हिन्दू राज्य की स्थापना की थी। शिब्जी और हाँसी प्रदेश भी इसने अपने राज्य में मिलाया था। २ इसके घोर चरित्र का बहुत कुछ वर्णन इसके राजकवि सोमदेव रचित 'ललित विग्रहराज नाटक' (संस्कृत) में है। ३ ऐसे पराक्रमी राजा के वीर चरित्रों के चित्रण का चूँकि इस रासो में अभाव है इसलिए ऊपर इस बात की सम्भावना प्रगट की गयी है कि इस रासो का सम्बन्ध बीसलदेव चतुर्थ से नहीं है। बीसलदेव तृतीय का चरित्र इतिहास में बीसलदेव चतुर्थ के समान म्लेच्छों से आर्यावर्त का उद्धार करने वाला अथवा विन्ध्य से लेकर हिमालय तक अपना राज्य स्थापित करने वाला नहीं चित्रित किया गया है। अस्तु, बहुत कुछ सम्भव है कि इसी कारण प्रस्तुत रासोकार ने इस खंडकाव्य की रचना करते समय बीसलदेव तृतीय के गुजरात आक्रमण के समय चालुक्यवंशीय राजा कर्ण से युद्ध को गौण रखकर उसके जीवन की एक स्वतः पूर्ण घटना परमारवंशीय राजा भोज की कन्या के साथ विवाह को प्रधानता दी। बीसलदेव के चरित्र का विकास इस रासो में रानी राजमती के विवाह के पश्चात् से आरम्भ होता है। विवाह के पश्चात् रानी द्वारा सिर्फ इतना ही कहने पर कि बीसलदेव के समान और इनसे बढ़कर भी इस भू-खण्ड पर और अन्य नृप हैं, राजा प्रण करता है कि वह अवश्य उन राजाओं को जीतेगा और अपने राज्य को हर प्रकार से समृद्ध बनायेगा। अपने इस प्रण की रक्षा के हेतु वह जिस रानी को ब्याह कर वह कुछ मास पूर्व ही लाया है और जो अनन्य सुन्दरी है उसके रूप और यौवन की कुछ परवाह नहीं करता और बारह वर्षों का उड़ीसा प्रवास धीरे २. आर्यावर्तं यथार्थं पुनरपि कृतवा म्लेच्छविच्छेदनाभि- र्देवः शाकम्भरीन्द्रो जयति विजयते वीसलः क्षोणिपालः ॥ मूते सम्प्रति चाहुवाणतिलकः शाकम्भरीभूपति श्रीमान्विग्रहराज एष विजयी सन्तानगानात्मनः । -- फीरोजशाह की लाट (दिल्ली) पर वि० सं० १२२० वैशाख शुक्ला १५ का लेख ३. Indian Antiquary vol. XX P. 201—D. Keilhorn

  • ७९ - की खान को प्राप्त करने के लिए करता है। उड़ीसा पहुँच कर राजा बीसलदेव को अपने कार्य में सिद्धि बिना किसी लड़ाई के ही प्राप्त हो जाती है और वह उड़ीसा के प्रधान के यहाँ एक अति सम्मानित अतिथि के समान रहता है। कुछ समय पश्चात् रानी राजमती का यह समाचार दूत के हाथ प्राप्त होने पर कि अब रानी राजमती का जीवित रहना राजा के विरह में असम्भव है राजा उड़ीसा से लौटने की तैयारी करता है। उड़ीसा के राजा तथा रानी उसको रोकना चाहते हैं। रानी तो बीसलदेव से यहाँ तक कहती है कि वह अब साँभर लौटकर न जाय और उड़ीसा में ही उसके विवाह का प्रबन्ध सुन्दरी से सुन्दरी कन्या के साथ होने का कर दिया जायगा। लेकिन राजा बीसलदेव उड़ीसा प्रवास के समय रानी राजमती को दिये गये अपने वचन की दृढ़तापूर्वक रक्षा करता है और उड़ीसा की रानी द्वारा किये गये प्रस्ताव को अस्वीकार कर असंख्य धन लेकर अजमेर लौट आता है। इतिहास में कहीं भी बीसलदेव तृतीय के उड़ीसागमन की कथा नहीं मिलती। ऐसा ज्ञात होता है कि कवि ने राजा बीसलदेव के के चरित्र के विकास के हेतु ही इस कथा का सृजन कल्पना के आधार पर किया है। कल्पना की सहायता भले ही कवि ने बीसलदेव के चरित्र चित्रण में ली हो लेकिन इसे तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि बीसलदेव तृतीय के जीवन-चरित्र का यह अंश अधूरा ही रह जाता यदि कवि ने इस ग्रन्थ की रचना न की होती। साहित्य की रक्षा इसीलिए किसी देश अथवा जाति के लिए (इतिहास का भी साहित्य के अन्तर्गत ही मैं मानता हूँ) स्वतन्त्रता से बढ़कर होती है। रानी राजमती के चरित्र को कवि ने स्त्री-सुलभ गुणों से पूर्ण चित्रित किया है। राजमती की प्रगल्भता से ही इस रासो का प्रारम्भ होता है। वह राजा बीसलदेव के गर्वयुक्त कथनों को नहीं सह सकती और ऐसा चुभता हुआ प्रत्युत्तर १ उन्हें देती है कि राजा को अपना राज्य छोड़ कर विदेश गमन करना पड़ता है। लेकिन जहाँ उसमें इतनी प्रगल्भता है वहीं उसका हृदय स्त्रियोचित १—गरब न कीजइ धणी संभरि धाणि। तुहू समा छह घणारि भूवाल। ऐक उडीसा कउ धणी। वचइ माफा मानि न मानि। नउ थारइ साभरिउ महइ। तिन्हठवा घरि उमहइ हीरा की पाणि ॥ ४१ ॥
  • ७७ -

कोमल भावनाओं से भी पूर्ण है। यह राजा के विरह को सहन करने के लिए तैयार नहीं है, और इसीलिए कहती है कि— "म्हे विर। स्या बोलियड दोस। पग की पाणिही संकिसउ रोस। कीडी उपरि कटकी किसी। म्हे हरया थे फेरि जाणोयड साथ। उमी मेलिह ऊलग घडउ। जल विहुणीय किम जीवइ मछ ॥ ४३ ॥” लेकिन उसकी यह चातुरीपूर्ण बातें उसे राजा के विरह से वंचित करने में असमर्थ होती हैं। अतः वह अपने उस अस्त्र का प्रयोग करती है जिस पर प्रत्येक स्त्री को ऐकांतिक भरोसा होता है लेकिन उसका यह शस्त्र भी चूक जाता है जिसे वह अपनी सहेलियों से राजा के विछोह के पश्चात् स्वीकार करती है— सुणउ सहेलीय म्हारीय वात। कंचूउ पोलि दिपाया गात्त। त्रिय चरित्र मइ लप किया। म्हरिय राउ न जाणए घात।… अपने इस शस्त्र के चूक जाने के पश्चात् भी यह राजा के उड़ीसा प्रवास को रोकने का प्रयत्न जारी रखती है। राजज्योतिषी से प्रवास के लिये चार मास पश्चात् की तिथि देने के उसके आग्रह में उसके चरित्र का प्रगाढ़ पति-प्रेम एव पतिव्रता हिन्दू पत्नी का पति द्वारा अनादर होने पर भी पति के प्रति शुभ कामना सन्निहित है। चार मास के बाद निश्चित तिथि पर जब राजा उड़ीसा गमन के लिये तैयार होता है, रानी अपने विरह के समय आने वाले दुखों को भूलकर अपने नीतिपूर्ण उदात्त चरित्र का परिचय देते हुए राजा को शिक्षा देती है कि— "उलग जाण की धरीय अगीस। राज चालण की ऐहछइ सीष। इणि विधि राज माहे संचरे। बइठा राजा सभा परधान। विणि सं मीठा बोलिथ्यो। नाई साहणी दूणउ मान।

  • ७४ - बाह्रिय सरिसउ मति इसउ । बठइ राइ भोलाइसी भीतर गोठि । राजमती करि बोलिज्यो । फाक नरङ्गा अरु नीची दिठि । ८८॥" राजा के उड़ीसा गमन के पश्चात् रानी राजमती राजा के विरह में व्याकुल हो जाती है। वर्ष की किसी ऋतु में उसे शान्ति नहीं मिलती। वह पूर्णयौवना है और युवावस्था में पति का वियोग कितना दुःखदायी होता है यह तो एक विरहिणी नारी ही बता सकती है। ऐसी परिस्थिति में प्राय देखा जाता है कि नारियाँ पातिव्रत धर्म को ताक पर रखकर स्वैराचार की ओर प्रेरित हो जाती हैं। लेकिन राजमती एक आदर्श पतिव्रता हिन्दू नारी की भाँति इन विकट परिस्थितियों का सामना करती है और कुटनी द्वारा भ्रष्ट आचरण के प्रस्ताव को ठुकरा देती है।¹ अन्त में रानी राजमती के सुख के दिन लौटते हैं। बीसलदेव उड़ीसा से अगाध द्रव्य लेकर लौटते हैं। रानी को उन निर्जीव द्रव्यों को तो नहीं पर अपने सजीव द्रव्य को पाकर अत्यन्त खुशी होती है। कवि नाल्ह मुखरा, प्रगल्भा नीति निपुणा, तथा पतिव्रतपरायणा राजमती के चरित्र चित्रण में प्रत्येक दृष्टि से सफल हुआ है। इस रासो में उपर्युक्त दोनों चरित्रों को छोड़कर अन्य चरित्रों का विकास नहीं हुआ है। रस हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों ने रासो काव्य को 'वीरगाथा' काल की संज्ञा दी है। निस्सन्देह यदि 'पृथ्वीराज रासो' को इस काल का प्रतीक ग्रन्थ १—असीय वरस की बुढडइ वेसि । दंत पडूया सिरि पाहुरा केस । आइ आवीसइ सघरी । गलि लागइ अरू रूदन करति । किमदिन काढइ भाखिणी । राति दिवस भामइ घारोय चीत । जेवइ आवइ साभर धणी । तेवइ चञ्चल पाठव करउ ये मीत ॥१३७॥
  • ७९ -

स्वीकार कर लिया जाय तो इतिहासकारों द्वारा दिया गया उपर्युक्त नाम सार्थक सिद्ध हो सकता है। लेकिन 'बीसलदेवरासो' जिसे इस काल का प्राचीनतम ग्रन्थ मानने में दो मत नहीं हो सकते, एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें वीर रस का तो सर्वथा अभाव है और है शृंगार रस की प्रधानता। अतएव प्राचीनतम ग्रन्थ होने के नाते यदि यह काव्य रासो काल का प्रतीक ग्रन्थ माना जाय तब तो इस काल को वीरगाथा काल कहना कहाँ तक सार्थक होगा यह विवादग्रस्त प्रश्न हो जाता है। 'बीसलदेवरासो' चूँकि शृंगार रस प्रधान काव्य है इसलिए इसमें शृंगार रस खोजने का प्रयास नहीं करना पड़ता। संयोग और वियोग शृंगार से सारा ग्रन्थ परिपूर्ण है। संयोग शृंगार का तो कम लेकिन वियोग शृंगार का अभाव ग्रन्थ में परिलक्षित नहीं होता। कहा तो यह भी जा सकता है कि वियोग शृंगार की ही प्रधानता है। वियोग शृंगार का चित्र इस खण्ड काव्य में हमें बीसलदेव के रानी राजमती के विवाह के पश्चात् उड़ीसा गमन पर मिलता है। रानी राजमती का विवाह राजा के साथ उसकी बारह बरस की अवस्था में होता है। विवाह के तुरन्त पश्चात् ही राजा के परदेश गमन से राजमती को विरह का सामना करना पड़ता है। प्रोषितपतिका नायिका राजमती के विरह को षड्ऋतु में घटने वाली प्राकृतिक घटनायें उद्दीप्त करती हैं। सावन का सुन्दर महीना है। वर्षा-ऋतु आरम्भ हो गयी है। पानी की छोटी-छोटी बूँदें पड़ रही हैं। युवतियाँ कजली गा रही हैं। पपीहा 'पी कहाँ-पी कहाँ' की रट लगाये हुए है। लेकिन ये सारे सुन्दर दृश्य विरहिणी राजमती के हृदय में शूल पैदा करते हैं। वह कहती है- सावण वरसइँ छइ छोटिय धार । प्रीयविण जीविजइ किसइ आधारि । छह को खेलइ काजली । तठइ चोतीय कमठीय पड़िया झाल । पापीहा पीव पीव करइ । मोनई अणप छायइ सावण मास ॥ २९ ॥ विप्रलम्भ शृङ्गार के प्रवासहेतुक वियोग के भविष्यत् प्रवास का चित्र अंकित करते हुए कवि बीसलदेव के भविष्यत् प्रवास से व्याकुल राजमती के मुख से कहवाता है-

  • ५० - हिव छंडी स्वामी थारूरी आस। जोगणि होई सेवं बनवास। कहूं तप तपूं बनर बसी। कहू सरीर संपउं देसि फेडारि। कहिहि, हिमालइ माहि गिलउ। स्वामी घण मरिसी गंग नई बारि ॥ ७० ॥ संताप, निद्रा भंग, कृशता, प्रलापादि विप्रलम्भ शृंगार के अनुभाव के कारण प्रवात्स्यत्पतिका नायिका की कृशता के चित्र अनेक लक्षण और लक्ष्य ग्रन्थों के रचयिता आचार्यों तथा रीतिकालीन कवियों द्वारा उपस्थित किए गये हैं। रासो का नायक भी यद्यपि न तो लक्षण या लक्ष्य ग्रंथ की रचना कर रहा था और न उसका उद्देश्य नायिकाभेद की रचना करना था, फिर भी रानी राजमती की कृशता का चित्र जो उसने चित्रित किया है वह रीतिकालीन कवियों अथवा उर्दू के शायरों के ऐसे चित्रित किये गये चित्र से किसी रूप में कम नहीं है। रानी राजमती राजा के विरह में इतनी कृशगात हो गयी है कि उसकी अँगुली की अँगूठी उसकी बांह में आ जाती है।¹ देखिये कवि कहता है कि— गोरही घइली छइ बंभणक जाइ। करि जोड़ी थारइ लागू पाइ। राजमती करइ बीनती। पंड्या कहिज्यो धण का नांह नई जाइ। आँगुली थारूी मुद्रड़ी। ढलिकन आवइ हो धणकीय बाह ॥ १४२ ॥ रसराज शृंगार का जो निखरा सौन्दर्य हमें वियोग में देखने को मिलता है १—सुनहु स्याम ब्रज में लगी दसन दसा की ज्योति। जहँ मुंदरी अंगुरीन की बाह में ढीली होति ॥ × × × तुम पूछत कहि मुद्रिके, मौन होत यहि नाम। कंकन की पदवी दई तुम बिन या कहँ राम ॥—केशव × × × जीवन की अब हे कवि आस न मोहि। कनुगुरिया की मुंदरी कंकन मोहि ॥—तुलसीदास

६ - ८१ - वह सम्भवतः संभोग में नहीं मिलता, और इसीलिए शायद किसी शायर ने कहा है कि 'जो मज़ा इन्तज़ार में देखा, वह नहीं वस्लेयार में देखा।' वियोग के पश्चात् सम्भोग का होना स्वाभाविक है। अस्तु, कवि नाल्ह ने वियोग के वर्णन को प्राथमिकता देकर अपने कवि हृदय का परिचय देते हुए परम्परा के निर्वाह के लिए ग्रन्थ को समाप्त करते करते सम्भोग शृंगार का चित्र भी अंकित कर दिया है। नायक नायिका के पारस्परिक अवलोकन, आलिंगन आदि असंख्येय भेदों को सम्भोग शृंगार के अन्तर्गत माना गया है, तथा कहीं यह नायिकारब्ध और कहीं नायकारब्ध होता है। इस रासो में नायकारब्ध सम्भोग शृंगार का उदाहरण ही हमें प्राप्त होता है। बीसलदेव बारह वर्षों के प्रवास के पश्चात् लौटकर जब रानी राजमती से मिलता है तो उसकी अंग शोभा वीसल- देव के मन में उद्दीपन भाव उत्पन्न करती है। उसके पयोधर पर राजा का हाथ अनुभाव तथा राजा द्वारा उसका आलिंगन व्यभिचारी भाव हैं। नायकारब्ध सम्भोग शृंगार के इस चित्र का कवि ने अपने शब्दों में इस प्रकार वर्णन किया है— बारा वरस। घरि आवीयउ राउ। दियठलइ हाथ गळा गाढ़े बाहु। अवली सबलो चुंबणी। आंत रग थी राजा लीयउ टीपि। सही सहेली चमकउ हूवड। म्हारुइ भैरव कचूड भीनउ छइ पारु ॥ २३६ ॥ विप्रलम्भ और सम्भोग शृंगार के अतिरिक्त न तो अन्य रसों की अवतारणा का कवि ने प्रयास किया है और न इस खण्ड काव्य में अन्य रसों के पूर्ण परि- पाक की सम्भावना थी। कहीं-कहीं तो ऐसा भी देखने को मिलता है कि रस परिपाक तो दूर, वर्ण्य विषय को सुन्दर ढंग से रखने में भी कवि असमर्थ होकर रसाभास के उदाहरण उपस्थित करता है। राजमती द्वारा अनादृत होकर बीसलदेव जब उड़ीसा चला जाता है तब राजमती कलहान्तरिता नायिका की भाँति जहाँ विप्रलंभ शृंगार का उदाहरण सामने रखती है उसी जगह बीसलदेव को भैंस का पीड़ार (पाड़ा) कहकर बीभत्स रस उपस्थित कर देती है और ग्रामीण कलहान्तरिता नायिकाओं तक को भी लज्जित कर देती है। संदर्भ से सम्बन्धित पंक्तियाँ इस प्रकार हैं—

  • ८१ -

गुणम सहेलिय म्हारीय वात । कंचूउ खोति दिपाया गात । त्रिय चरित्र मह छपकिया । म्हारिय राढ न जाणए बात । तउ नउ उपरि अगस पीड़ाडू । जिण दीठा मुनियर चळइ । म्हे सठ कर योंलियउ कोपियउ नाह । तिणि कुवचनइ सपीधण छती । ढालीयउ पांसउ चूकउ दाउ ॥ ६९ ॥ [ अर्थात् हे सखी मेरी बात सुनो—मैंने कंचुकी खोलकर अपने अपूर्व यौवन का दर्शन राजा को कराया तथा अनेक प्रकार के त्रियाचरित्र भी किये ताकि राजा विदेश भ्रमण न करें लेकिन राजा मेरी बात को मानने के लिए तैयार नहीं हुआ । जिस नारी सौन्दर्य ने बड़े बड़े मुनियों को भी वशीभूत कर लिया उसी सौन्दर्य की राजा ने उपेक्षा की । ऐसा करके राजा ने 'भैंस के आगे बीन बजावे भैस पड़ी पगुराय' वाली उक्ति को चरितार्थ किया है । इत्यादि । ] ऐसे ही एक अन्य स्थल पर जहाँ बीसलदेव राजमती की पहिचान बताते हुए उसके सौन्दर्य का वर्णन नाना प्रकार की उपमाओं को देकर योगी को बताता है उसी जगह उसकी अंगुलियों की उपमा 'मूँगफली' से देकर हास्य रस उपस्थित कर देता है । देखिये - भति जोगी कहइ नर नाथ । रतन अचोलउ धण कइ हाथि । मुंगफली जैसी आँगुली । वणारागवन पयडहर काजला रेखि । बोलती बोलइ वर अकरी । रुणरइ सोवन चूडली झझकइ हाथि । चूड़ि ददइ कइ चूडिलउ । थे तउ धीरा तिण धण कइ हाथि ॥ २४१ ॥ [ अर्थात् रानी राजमती की अंगुलियाँ मूंगफली जैसी हैं, उसके पयोधर पर काली रेखायें हैं, वह सुन्दर वाणी बोलती है, उसके हाथों में सुवर्ण की चुड़िया सुशोभित हैं, इत्यादि ।

  • ८३ -

यद्यपि भैंस और मूरगच्छी की उक्तियाँ शृंगार रस में रसाभास उत्पन्न करती हैं फिर भी इन उक्तियों के अप्रस्तुत रूप में लाये जाने के कारण इस काव्य के लोकगीत होने का प्रमाण भी मिलता है । अलंकार जिस प्रकार 'रस' काव्य की आत्मा है और काव्य के लिए परमावश्यक है उसी प्रकार अलंकारों के अतिरिक्त भी काव्य रचना संभव नहीं। क्योंकि अलंकार हैं क्या ? वर्णन करने की अनेक प्रकार की चमत्कारपूर्ण शैलियाँ जिन्हें काव्यों से चुन कर प्राचीन आचार्यों ने नाम रखे और लक्षण बनाये ।¹ शैलियाँ विभिन्न कवियों की विभिन्न हो सकती हैं । इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि जितने अलंकारों के नाम आचार्यों ने निश्चित कर दिये हैं उनके अतिरिक्त अलंकार नहीं हो सकते । देखा यह गया है कि नए आचार्य नये अलंकारों की सृष्टि करते आये हैं । अतः किसी ग्रन्थ विशेष में यदि हमें मिलने वाले अलंकारों में से कोई अलंकार नहीं मिलता तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह काव्यग्रन्थ अलंकार शून्य है, क्योंकि काव्य रचना के लिए किसी न किसी शैली की आवश्यकता कवि को पड़ेगी और जब वह किसी शैली का अनुसरण करेगा तब अलंकार भी उस काव्य में होगा ही । बीसलदेव रासो में नाल्ह ने सादृश्यमूलक अलंकारों का ही आश्रय अधिक लिया है । इन अलंकारों के सहारे कवि को अपनी कल्पना की उड़ान में बहुत ऊपर तक उड़ने का अवसर मिला है । कहीं कहीं तो ऐसे उपमान और उपमेय का आयोजन हुआ है जिनका सम्बन्ध पृथ्वी के जीव से नहीं वरन् ज्योतिष शास्त्र से है । सादृश्यमूलक अलंकारों में से उपमा अलंकार का आरोप गौरीनन्दन की शोभा में देखिये :— गवरि कानंदन त्रिभुवन सार । नाद भेदइ थारइ चउर मडार । एक दंतउ मूषक लाइलइ । मुखिकउ बाहण तिलक संदूरि । करि जोडी नरपति भणइ । जाणि फरि रोहिणी जिभ तपउ सूरि ॥ १ ॥ १—जायसी ग्रन्थावली—सं० आचार्य रामचन्द्र शुक्ल—पृ० १४६-१४७।

– ८१ – उपमा में भी श्रोती उपमा का उदाहरण कवि ने राजा बीसलदेव के माण्डव पहुँचने पर 'गोकुल माहि गोविंद' से दिया है :— राजा जी पहूंच्या नगर मण्डारि । गल माहे हरषीय राजकुमारि । जाइ समी करइ आरसी । कलश संपूर्ण पूनिम चन्द । सुर १ नर मोह्या सुग्ग का । गोकुल माहि जिउठ प्रविश्य गोवंद ॥ २५ ॥ श्रोत्री उपमा की तरह 'आर्थी उपमा' का प्रयोग भी हमें निम्न पंक्तियों में देखने को उस समय मिलता है जब राजमती बीसलदेव को विदेश-गमन से रोकने के लिए यह कहती है कि विवाह के पश्चात् उसकी अवस्था ठीक बिकने वाले घोड़े के समान हुई है जिस पर व्यापारी सौ सौ दिनों तक हाथ नहीं फेरता । भाटिन कहइ सुणि राजा का पूत । अलख नाण कउ परउ कु सूत । पेटि व्याही राजा भोज की । सोनउ सोलहउ फाहि करइ छार । मरणजीवण राजा पग तलइ । कनक क्चोलउ डर धरइ भार । हेडाऊँ का तुरीय जिऊँ । हथ न फेरइ सह सट वार ॥ ८२ ॥ विरह वर्णन में कवि णल्ह ने उद्भावनक शैली का अवलम्बन किया है। इस शैली में अधिकतर ऐसा देखा जाता है कि ऊहा की आधारभूत वस्तु का स्वरूप तो सत्य रहता है लेकिन उसके हेतु की कल्पना कल्पित होती है। इस प्रकार के विधान में उत्प्रेक्षा का सहारा आवश्यक होता है। यह अलंकार स्वरूपों की व्यंजना के लिये बड़ा शक्तिशाली होता है। प्रस्तुत की अप्रस्तुत रूप में सम्भावना के द्वारा कवि जिस क्रिया को हमारे सम्मुख उपस्थित करता है वह स्वाभाविक लगने लगती है और हम इस बात की छानबीन नहीं करते कि हेतु ठीक है या गल्त । आसाढ़ माह में जल से परिपूर्ण मेघों को आकाश में घुमड़ते देख कर राजमती को ऐसा प्रतीत होता है कि मदगलित हाथी की भाँति प्रमत्त मेघ आकाश में चल रहे हैं। देखिये वह कहती है कि—

  • ८५ -

आसाढइ धुरि बाहुड्या मेह । पहिल्हया पाझ नइ वहि गई पोह । जइरि आसाढु न आवहो । माता रे महगल जेठ पग बेई । खद मत घाला जं दुजई । तिह घर ऊलग काइ करेइ ॥ १२८ ॥ प्रस्तुत की अप्रस्तुत रूप में सम्भावना कर कवि ने 'वस्तूत्प्रेक्षा' का सुन्दर उदाहरण उपर्युक्त पद्म में दिया है । 'उत्प्रेक्षा' के समान अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग भी कवि ने इस रासो में कहीं-कहीं किया है । राजा बीसलदेव की बारात की विशालता का वर्णन करते हुए कवि कहता है :- राजा चालो परिणवा । नवइ चेदाउँधर छड़िउ सूरि ॥ २० ॥ राजमती की चमत्कारपूर्ण उक्ति भी पण्डित को बीसलदेव के पास भेजते समय अतिशयोक्ति अलंकार का सृजन करती है । राजमती की यह उक्ति कि बीसलदेव के वियोग में उसके बायें हाथ की मुद्रिका ढलक कर उसकी दाहिनी बांह में आने लगी है लोक सीमा का उल्लंघन कर जाती है । देखिये उसके अलंकार का चमत्कार :- गोरडी बइठी छह थभणक जाइ । करि जोडी थारइ लागू पाइ । राजमती करइ बीनती । पंथ्या कहिज्यो धण का नाह नइ जाइ । आंगुली थाकी मुदडी । ढलिकन आगइहो धण कीयमाइ ॥ १४२ ॥ सादृश्यमूलक अलंकारों में 'रूपक' का अपना विशेष स्थान होता है । इस अलंकार की झलक इस रासोकार ने कहीं-कहीं दिखायी है । इसके प्रयोग में यद्यपि कवि को पूर्ण सफलता नहीं प्राप्त हुई है फिर भी रूपक बाँधने की उसकी दक्षता अवश्य श्लाघ्य है । ऐसा एक स्थान देखिये :- रहासू कहइ बहु परिमाहे बाइ । धंवरइ भोळइ गिलेसी राह ।

  • ८१ - चंदु पुनिह्मां यन गयउ । दुहू विगड मग्गू मंजारि कह फिरि । अलगाणा की गोरटी । थारउ नाह घटीसइ धाणु अजमेरि ॥ १४१ ॥ [ अर्थात्—राजमती का मुख पूर्ण चन्द्रमा है । उसके मुख रूपी चन्द्रमा को राहु रूपी सौन्दर्य छोड़न रूपवान् कहीं प्राप्त न कर लें अथवा उसके यौवन रूपी दुग्ध को माजार रूपी कामी पुरुष कहीं भक्ष्य न कर जायें क्योंकि उसका पति परदेश में है और उसका उभड़ा यौवन छिपाये नहीं छिपता । इसलिए राजमती की सास कहती है कि बहू घर में आओ । ] छन्द भारतीय छंदों के गणित पक्ष तथा सूत्र लक्षण का विधान संसार के छंद शास्त्रों में अद्वितीय है, इसे स्वीकार करने में किसी को संकोच न होगा । ब्राह्मण ग्रन्थों के रचना-काल से ही छंदों का प्रारम्भ भारतीय साहित्य में हो जाता है, यद्यपि उन ग्रन्थों में छंदों की दार्शनिक धारणायें ही केवल प्राप्त हैं परन्तु उन्हें उनका सैद्धान्तिक विवेचन नहीं कहा जा सकता । ब्राह्मण युग के पश्चात् वैदिक युग के प्रारम्भ काल से लेकर अपभ्रंश काल तक छन्दों का क्रमशः विकास हुआ है । विद्वानों के मतानुसार वैदिक छंदों में वर्ण विचार की प्रधानता पायी जाती है लेकिन डा० पुत्तूलाल शुक्ल के मतानुसार इनके पाठ में केवल अक्षर की गणना के अतिरिक्त स्वरों का भी प्रयोग किया जाता है, अन्यथा केवल अक्षर संख्या लय को जन्म देने में असफल हो जाती । वैदिक छंद पाठकारों और उनके छन्दों के लिपिकारों ने उदात्त, अनुदात्त, स्वरित का प्रयोग तो किया, परन्तु वैदिक युग के छन्द-शास्त्रियों और परवर्ती युग के आचार्यों ने वैदिक छंदों पर विचार करते हुए मात्रा मैत्री का विवेचन नहीं किया और फलतः पृथक्- विषयक कोई सिद्धान्त भी निश्चित नहीं किया गया । चूँकि अक्षर और मात्रा भाषा के आदि काल से इतने अभिन्न और एकाकार हैं कि उनमें भेद करना कठिन है, सम्भवतः इसी कारण वैदिक छन्दों के सम्बन्ध में यह निश्चित सिद्धान्त नहीं बन सका कि वे केवल वर्णिक हैं या केवल मात्रिक । ऐसी विषम परिस्थिति में छन्द शास्त्रियों ने शायद इस नियम का, कि छन्द की पाठ पद्धति में जिस वर्ण के नियम प्रधान हों उसमें ही उन छन्दों की गणना होनी चाहिए, पालन किया है । वैदिक छन्दों को वर्णिक बताने में ही उपर्युक्त कहे गये नियम का अनुसरण

किया गया है क्योंकि वैदिक छन्दों में वर्णवृत्त की प्रधानता यहाँ तक विशेष थी कि १०४ अक्षरों तक के छन्द निर्मित होते थे । वर्ण और मात्रा की खिचड़ी संस्कृत काल के छन्दों में भी पकती रही ! छन्दों में वर्णिक और मात्रिक का भेद तब स्पष्ट रूप से स्थापित हुआ जब वैदिक छन्द, वर्ग विशेष का साहित्य बन गया और जनता से उसका सम्पर्क छूट गया । जनता ने यद्यपि अपना सम्बन्ध-विच्छेद वैदिक और संस्कृत छन्दों से कर लिया फिर भी उनमें छान्द- सिक संस्कार वैदिक और सांस्कृतिक ही थे । अतः जिस लय में वर्ण पर स्वराघात देकर या उदात्त उच्चारण से छन्द पूरा किया जाता था जनता ने उस स्थान पर एक मात्रा का योग करके उस लय को पूरा किया । लय को पूर्ण करने के लिये मात्राओं के योग की यह जनपदीय पद्धति ही धीरे धीरे अपने अलग स्वरूप में विकसित होने लगी । प्राकृतकाल के आगमन तक यह इतनी लोकप्रिय हो गई कि इस काल के छन्द प्रारम्भ काल से ही मात्रावृत्त होने लगे । मात्रावृत्त छन्दों के विकसित होने तथा जनता द्वारा अपनाये जाने के प्रधानतः दो कारण थे । प्रथमतः जन गीतों के चरण बहुत छोटे होते हैं जिनमें मात्रावृत्त छन्दों का ही सफल प्रयोग सम्भव होता है । द्वितीयतः मात्रावृत्त छन्दों में कवि को स्वच्छन्दता का अवसर रहता है जो वर्णवृत्त छन्दों में अपेक्षाकृत कम प्राप्त होता है । मात्रा- वृत्त छन्द जनता के आदर के पात्र इसलिए भी बन गये कि इसमें संगीत के उपयुक्त गुण भी वर्तमान थे । गीत में ताल का निशान प्रधान होता है जो कि मात्राओं पर निर्भर होता है, वर्णों पर नहीं । मात्रिक छन्द अपनी उपर्युक्त विशेषताओं और सुविधाओं के कारण इतना विशेष लोकप्रिय बन गया कि प्राकृतों के साहित्यिक रूप धारण करने पर जहाँ मध्यकाल की प्राकृत रचनायें संगीत विहीन हो गयीं वहीं अपभ्रंश में जनता द्वारा अपनाये जाने वाले मात्रिक छन्द इतने प्रचलित हुए कि इन छन्दों में आद्यो- पान्त महाकाव्यों की रचना होने लगी । चौरासी सिद्धों और जैनाचार्यों की कृतियों का सृजन, जो प्रायः नवीं शताब्दी के बाद हुआ, मात्रिक छन्दों में ही हुआ । इन छन्दों का प्रचार उत्तरोत्तर इतना अधिक हुआ कि संस्कृत के कवि गोवर्द्धनाचार्य तथा जयदेव ने भी अपनी कृतियों की रचना वर्ण-वृत्तों में न कर मात्रिक छन्दों में की । मात्रिक छन्दों में भी 'पद्धटिका' छन्द का प्रयोग बहुशः अपभ्रंश काव्य में पाया जाता है । इस छन्द में ८ मात्राओं के बाद स्वभावतः ही ताल लगने के कारण संगीत के लिये यह विशेष रूप से उपयोगी होता है । सङ्गीतोपयोगी छन्द पद्धटिका के समान ही नृत्योपयोगी 'घत्ता' और

जिस प्रकार हीरे का सौन्दर्य सफल खराद करने वाले के हाथों में जाकर प्रस्फुटित होता है उसी प्रकार काव्य भी छन्दों के प्रयोग से निखर उठता है । यद्यपि कवि छन्दों का मुखापेक्षी नहीं होता और न वह यति गति के नियमों से ही बँधा होता है फिर भी भावों की मधुरिमा के लिये लय की आवश्यकता होती है जो वर्णों और मात्राओं की योजना पर निर्भर करती है । अतः छन्दों के मुखा- पेक्षी न रहने पर भी अदृश्य रूप से ये ही व्यञ्जना सिद्धि में प्रेरक हैं इसे स्वीकार करना ही पड़ेगा । छन्दों का चुनाव वर्ण्य विषय और भाषा को दृष्टिगत रख कर ही होना चाहिए । आज तक के प्रकाशित ग्रन्थों को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि न तो प्रत्येक छन्द हर प्रकार के वर्णन के लिये उपयुक्त होता है और न प्रत्येक भाषा में ही प्रत्येक छन्द का सफल प्रयोग हो पाता है । 'अवधी' में जितनी सफलता दोहा और चौपाई को मिली उतनी सफलता ब्रजभाषा में इन्हें नहीं प्राप्त हुई । ब्रजभाषा के सफल छन्द तो कवित्त और सवैया ही थे । इसी प्रकार नीति और उपदेशात्मक विषयों की व्यञ्जना में दोहा छन्द जितना सफल रहा उतना अन्य छन्द नहीं । यह ठीक है कि छन्द शास्त्रियों ने ऐसा कोई विधान नहीं बनाया कि अमुक विषय अथवा अमुक भाषा के लिये अमुक छन्द का ही प्रयोग होना चाहिये फिर भी प्रकाशित रचनाओं की सफलता और विफलता को दृष्टिगत रखते हुए उपर्युक्त निष्कर्ष निकाला जा सकता है । बीसलदेव रासो के छन्दों का निर्णय करते समय हमें उपर्युक्त सभी बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है । इस रासो का विषय शृङ्गार रस सिक्त है और इसकी भाषा डिंगल है, यद्यपि भाषा की अस्तव्यस्तता और डिंगल व्याकरण के नियमों की अवहेलना को देखते हुए ऐसा कहना निर्मूल न होगा । हाँ, इसकी भाषा को नागर अपभ्रंश और साहित्यिक डिंगल का मिश्रण कहने में सम्भवतः कोई अत्युक्ति नहीं होगी । अस्तु, ऐसी भाषा और इस ग्रन्थ के वर्ण्य विषय के लिये कौन-सा छन्द उपयुक्त हो सकता था यह विचारणीय है । यों तो दसवीं से लेकर बारहवीं शताब्दी तक के राजस्थानी काव्य में सबसे अधिक प्रयोग दोहा और छप्पय छन्दों का हुआ है जिसका कारण इसके काव्य में वीर रस की प्रधानता है फिर भी इनके अतिरिक्त मन्दाक्रान्ता, शुभादाम, सु० ग० प्रभात, पद्धरी, तोमर और गीत छन्दों का प्रयोग भी बहुत हुआ है—गीत छन्द डिंगल साहित्य में अपनी विशेषता रखता है । डिंगल रीति-ग्रन्थों में इसके ८५ प्रकारों के लक्षण उदाहरण सहित मिलते हैं ।¹ १. रघुवर जसप्रकाश ।

२. द्वितीय खण्ड: बीसलदेव का उड़ीसा प्रवास, राजमती विरह व सन्देश

बीसलदेव रासो के छन्द इसकी अस्तव्यस्त भाषा और गणना-शून्य मात्राओं से जड़ित रहने के कारण एक समस्या अवश्य उपस्थित करते हैं लेकिन सुविधा यह भी है कि आरम्भ से इति तक प्रायः एक ही प्रकार के छन्द का प्रयोग हुआ है। इसके कतिपय छन्दों की मात्राओं की गणना करने पर इस निर्णय पर पहुँ- चना पड़ता है कि छन्दों के चरणों की संख्या छप्पय छन्द के अनुसार प्रायः छः चरणों की होते हुए भी मात्राएँ प्रत्येक छन्द की भिन्न-भिन्न हैं और छप्पय छन्द के लिये आवश्यक नियम का—प्रथम चार चरणों की, रोला के (२४, २४ मात्रायें ११, १३ की यति से) तथा अन्तिम दो चरणों का उल्लाला के (२८, २८ मात्रायें, १५, १३ की यति से या २६, २६ मात्रायें १२, १४ की यति से) --पालन नहीं हुआ है। ये छंद, छंद-शास्त्र के नियमानुसार विषम कोटि के हैं—क्योंकि इनके प्रत्येक चरण की मात्रा असमान है और ये साधारण जाति के हैं क्योंकि प्रत्येक चरण की मात्रा ३२ से अधिक नहीं है । इस विचित्रता को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि ग्रन्थ का रचयिता छन्द-शास्त्र का पण्डित नहीं था । इसी- लिए बीसलदेव रासो की रचना छंद-शास्त्र की कसौटी पर खरी नहीं उतरती । यह कहने में अत्युक्ति न होगी कि 'संगीत' शब्द का प्रयोग यहाँ शास्त्रीय संगीत के लिये नहीं वरन् उस 'संगीत' के लिये किया गया है। जो मानव जीवन के अन्त- : दर्शन और साथ ही उसकी रागात्मक प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति में सहायता पहुँचाता है। पशु पक्षी तक में अनुभूति और उसकी अभिव्यक्ति की क्षमता है । आनन्द या दुःख के कारण जिस प्रकार मानव में आत्मप्रसार का भाव जागृत होता है उसी प्रकार पशु-पक्षियों में भी । वैज्ञानिकों ने तो यहाँ तक सिद्ध कर दिया है कि उद्भिद् जगत् में भी राग-द्वेषात्मक अनुभूति वर्त्तमान है । लेकिन जहाँ मानव ने वाणी द्वारा अपनी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति को स्थायित्व देने की चेष्टा की है वहाँ पशु-पक्षी और उद्भिद् जगत् विवश हैं । पशु-पक्षी या उद्भिद् जगत् अपनी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति को स्थायित्व मानव की तरह भले ही न दे सकें पर इतना तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि सरिता का कलकल निनाद, अमराई में बठे हुये पपीहे की 'पी कहाँ' 'पी कहाँ' की पुकार, नीड़ में सायंकाल लौटते हुए पक्षियों का कलरव, उषा के आगमन के साथ ही कलियों का विकसना स्थायी है और साथ ही है संगीतात्मक अर्थात् मधुर लययुक्त एव भावात्मक । मनुष्य ने अपनी अनुभूतियों को वाणी द्वारा संगीतात्मक रूप में अभिव्यक्त करने की चेष्टा कब से की यह कहना तो कठिन है लेकिन प्राचीन जातियों के

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण (Transcription) प्रस्तुत है:

— ४१ — इतिहास में—जिसका अधूरा ज्ञान ही आज उपलब्ध है—इसका संकेत अवश्य मिलता है कि शब्दों का उस काल तक कोई विशेष महत्त्व नहीं था तथा विषय- विधान का विकास भी नहीं हो सका था । भाषा ऐसी अवस्था में थी जिसमें भावप्रकाशन की क्षमता न्यून थी और भावप्रकाशन के विस्तार के लिये भाषा के साथ वाद्य यन्त्रों की सहायता अपेक्षित थी । वाद्य यन्त्र भी अपने पूर्ण विक- सित रूप में न थे वरन् साधारण वाद्य यन्त्र ही काम में आते थे । इस काल के प्राप्त काव्य यह भी सिद्ध करते हैं कि इस काल तक सामूहिक और वैयक्तिक भावना में अधिक अन्तर न आ सका था । अस्तु, इसके द्वारा कुछ अंशों में यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि काव्य में प्रकट किये गये मनुष्यों की भाव- नाओं से अधिक प्रभावित उनके संगीतात्मक रूप से होता रहा होगा क्योंकि समाज की अविकसित अवस्था में मनुष्य के लिये काव्य में प्रकट की हुई भावनाओं को समझना सहज सम्भव नहीं । स्वर सम संगीत की उत्पत्ति जिसका—उल्लेख ऊपर किया गया है—वहीं से मानी जा सकती है । काव्य के इसी संगीतात्मक स्वरूप का विकास होता रहा और क्रमशः इसकी दो शाखायें हो गयीं । एक शाखा का विकास संगीत के शास्त्रीय विधान के रूप में हुआ और दूसरी का काव्य के रूप में । काव्य में संगीतात्मकता और चित्रात्मकता दोनों का सामञ्जस्य और सन्तुलन ही चूँकि उसमें जीवन डाल देता है, इसलिये कवि की सफलता भी दोनों के सामञ्जस्य और समन्वय उपस्थित करने में ही है। ऐसे काव्य का जो अपने प्रारम्भिक काल में अवश्य लोक गीतों के रूप में रहे होंगे, नमूना अब प्राप्त नहीं है । आज तो लोकगीतों का वही नमूना मिलता है जहाँ संगीत (शास्त्रीय संगीत) और गीत का अन्तर स्पष्ट होने लगता है । संगीत में जहाँ शास्त्रीय विधान की रक्षा का आग्रह होता है वहाँ लोकगीतों में भावुकता और आत्मा- भिव्यञ्जना का । विद्वानों के मतानुसार लोकगीत और संगीत के तीन प्रधान अन्तर हैं । संगीत | लोक गीत (१) संगीत में शब्दों का महत्त्व नगण्य है | (१) लोक गीतों में शब्द केवल स्वर के वे केवल स्वर के विस्तार और संकोच | विस्तार और संकोच के लिये के लिये आते हैं । स्वर प्रवाह ही | नहीं आते वरन् अर्थ की परिधि उनका प्रधान लक्ष्य है । अर्थ की | को विस्तृत भी करते हैं । परिधि को केवल स्पर्श मात्र करते हैं ।