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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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पृष्ठ 93
  • ८१ - चंदु पुनिह्मां यन गयउ । दुहू विगड मग्गू मंजारि कह फिरि । अलगाणा की गोरटी । थारउ नाह घटीसइ धाणु अजमेरि ॥ १४१ ॥ [ अर्थात्—राजमती का मुख पूर्ण चन्द्रमा है । उसके मुख रूपी चन्द्रमा को राहु रूपी सौन्दर्य छोड़न रूपवान् कहीं प्राप्त न कर लें अथवा उसके यौवन रूपी दुग्ध को माजार रूपी कामी पुरुष कहीं भक्ष्य न कर जायें क्योंकि उसका पति परदेश में है और उसका उभड़ा यौवन छिपाये नहीं छिपता । इसलिए राजमती की सास कहती है कि बहू घर में आओ । ] छन्द भारतीय छंदों के गणित पक्ष तथा सूत्र लक्षण का विधान संसार के छंद शास्त्रों में अद्वितीय है, इसे स्वीकार करने में किसी को संकोच न होगा । ब्राह्मण ग्रन्थों के रचना-काल से ही छंदों का प्रारम्भ भारतीय साहित्य में हो जाता है, यद्यपि उन ग्रन्थों में छंदों की दार्शनिक धारणायें ही केवल प्राप्त हैं परन्तु उन्हें उनका सैद्धान्तिक विवेचन नहीं कहा जा सकता । ब्राह्मण युग के पश्चात् वैदिक युग के प्रारम्भ काल से लेकर अपभ्रंश काल तक छन्दों का क्रमशः विकास हुआ है । विद्वानों के मतानुसार वैदिक छंदों में वर्ण विचार की प्रधानता पायी जाती है लेकिन डा० पुत्तूलाल शुक्ल के मतानुसार इनके पाठ में केवल अक्षर की गणना के अतिरिक्त स्वरों का भी प्रयोग किया जाता है, अन्यथा केवल अक्षर संख्या लय को जन्म देने में असफल हो जाती । वैदिक छंद पाठकारों और उनके छन्दों के लिपिकारों ने उदात्त, अनुदात्त, स्वरित का प्रयोग तो किया, परन्तु वैदिक युग के छन्द-शास्त्रियों और परवर्ती युग के आचार्यों ने वैदिक छंदों पर विचार करते हुए मात्रा मैत्री का विवेचन नहीं किया और फलतः पृथक्- विषयक कोई सिद्धान्त भी निश्चित नहीं किया गया । चूँकि अक्षर और मात्रा भाषा के आदि काल से इतने अभिन्न और एकाकार हैं कि उनमें भेद करना कठिन है, सम्भवतः इसी कारण वैदिक छन्दों के सम्बन्ध में यह निश्चित सिद्धान्त नहीं बन सका कि वे केवल वर्णिक हैं या केवल मात्रिक । ऐसी विषम परिस्थिति में छन्द शास्त्रियों ने शायद इस नियम का, कि छन्द की पाठ पद्धति में जिस वर्ण के नियम प्रधान हों उसमें ही उन छन्दों की गणना होनी चाहिए, पालन किया है । वैदिक छन्दों को वर्णिक बताने में ही उपर्युक्त कहे गये नियम का अनुसरण