बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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आसाढइ धुरि बाहुड्या मेह । पहिल्हया पाझ नइ वहि गई पोह । जइरि आसाढु न आवहो । माता रे महगल जेठ पग बेई । खद मत घाला जं दुजई । तिह घर ऊलग काइ करेइ ॥ १२८ ॥ प्रस्तुत की अप्रस्तुत रूप में सम्भावना कर कवि ने 'वस्तूत्प्रेक्षा' का सुन्दर उदाहरण उपर्युक्त पद्म में दिया है । 'उत्प्रेक्षा' के समान अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग भी कवि ने इस रासो में कहीं-कहीं किया है । राजा बीसलदेव की बारात की विशालता का वर्णन करते हुए कवि कहता है :- राजा चालो परिणवा । नवइ चेदाउँधर छड़िउ सूरि ॥ २० ॥ राजमती की चमत्कारपूर्ण उक्ति भी पण्डित को बीसलदेव के पास भेजते समय अतिशयोक्ति अलंकार का सृजन करती है । राजमती की यह उक्ति कि बीसलदेव के वियोग में उसके बायें हाथ की मुद्रिका ढलक कर उसकी दाहिनी बांह में आने लगी है लोक सीमा का उल्लंघन कर जाती है । देखिये उसके अलंकार का चमत्कार :- गोरडी बइठी छह थभणक जाइ । करि जोडी थारइ लागू पाइ । राजमती करइ बीनती । पंथ्या कहिज्यो धण का नाह नइ जाइ । आंगुली थाकी मुदडी । ढलिकन आगइहो धण कीयमाइ ॥ १४२ ॥ सादृश्यमूलक अलंकारों में 'रूपक' का अपना विशेष स्थान होता है । इस अलंकार की झलक इस रासोकार ने कहीं-कहीं दिखायी है । इसके प्रयोग में यद्यपि कवि को पूर्ण सफलता नहीं प्राप्त हुई है फिर भी रूपक बाँधने की उसकी दक्षता अवश्य श्लाघ्य है । ऐसा एक स्थान देखिये :- रहासू कहइ बहु परिमाहे बाइ । धंवरइ भोळइ गिलेसी राह ।