बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें– ८१ – उपमा में भी श्रोती उपमा का उदाहरण कवि ने राजा बीसलदेव के माण्डव पहुँचने पर 'गोकुल माहि गोविंद' से दिया है :— राजा जी पहूंच्या नगर मण्डारि । गल माहे हरषीय राजकुमारि । जाइ समी करइ आरसी । कलश संपूर्ण पूनिम चन्द । सुर १ नर मोह्या सुग्ग का । गोकुल माहि जिउठ प्रविश्य गोवंद ॥ २५ ॥ श्रोत्री उपमा की तरह 'आर्थी उपमा' का प्रयोग भी हमें निम्न पंक्तियों में देखने को उस समय मिलता है जब राजमती बीसलदेव को विदेश-गमन से रोकने के लिए यह कहती है कि विवाह के पश्चात् उसकी अवस्था ठीक बिकने वाले घोड़े के समान हुई है जिस पर व्यापारी सौ सौ दिनों तक हाथ नहीं फेरता । भाटिन कहइ सुणि राजा का पूत । अलख नाण कउ परउ कु सूत । पेटि व्याही राजा भोज की । सोनउ सोलहउ फाहि करइ छार । मरणजीवण राजा पग तलइ । कनक क्चोलउ डर धरइ भार । हेडाऊँ का तुरीय जिऊँ । हथ न फेरइ सह सट वार ॥ ८२ ॥ विरह वर्णन में कवि णल्ह ने उद्भावनक शैली का अवलम्बन किया है। इस शैली में अधिकतर ऐसा देखा जाता है कि ऊहा की आधारभूत वस्तु का स्वरूप तो सत्य रहता है लेकिन उसके हेतु की कल्पना कल्पित होती है। इस प्रकार के विधान में उत्प्रेक्षा का सहारा आवश्यक होता है। यह अलंकार स्वरूपों की व्यंजना के लिये बड़ा शक्तिशाली होता है। प्रस्तुत की अप्रस्तुत रूप में सम्भावना के द्वारा कवि जिस क्रिया को हमारे सम्मुख उपस्थित करता है वह स्वाभाविक लगने लगती है और हम इस बात की छानबीन नहीं करते कि हेतु ठीक है या गल्त । आसाढ़ माह में जल से परिपूर्ण मेघों को आकाश में घुमड़ते देख कर राजमती को ऐसा प्रतीत होता है कि मदगलित हाथी की भाँति प्रमत्त मेघ आकाश में चल रहे हैं। देखिये वह कहती है कि—