भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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पृष्ठ 9
  • ३ - साधारणतया ठीक; चार खण्डों में विभाजित । अक्षर— देवनागरी । सुरक्षित स्थान--विद्याप्रचारिणी जैन सभा, जयपुर । श्री अगरचन्दजी नाहटा ने 'राजस्थान भारती', पृ० ८३ में लिखा है कि "सं० १६५६ लिखित मदनपरा गुटका हमारे संग्रह में खरीद करके संग्रह कर लिया गया है।" पुष्पिका—इति राजा बीसलदे रास राजमती च्यारै- खण्ड संपूर्ण भवति । संवत १६५६ वर्षे फागुण वदि १ भौमे दिवसैं फूलपेड़ा मध्ये राज्य श्री बीवी राजचंदजी राज्ये । शुभ भवतु । आदि—श्री गुरुभ्योनमः । हंसवाहन मृगलोचनी नारि । सीस समारह दिन गिसह । झिल सिरजह उजिगाणा घरी नारि । जाई चीदाउद शरीती ॥ १ ॥ गौरिका नंदन त्रिभुवन सार ॥ नाद पेया थारह उदिर भंडार ॥ कर जोड़ नरपति कहई ॥ मूसा वाहन विघ्नस्यंदूर ॥ एक दन्तउ मुख राक्षसखई । जांणिक रोहणीउ नवर सूर ॥ अन्त—ज्यूं तारायण मिलियो चंद्र । गोवल मांहि मिलहू ज्यूं गोव्यन्द ! ज्यूं उझीरीयान्ह घरी मीहयो । गहि उजिगांण्हई दीधो हो बास । मन का मनोरथ पूरभ्या । भणई सूणईं तिणि पूज्यो आस ॥ रचनातिथि—बारह सै बहोत्तराँ हाँ मंझारि । जेठ बदी नवमी बुधवारि ॥ "नाल्ह" रसायण आरंभइ । सारदा' तुठि ब्रह्म-कुमारि । कासमीराँ-दुहा-मण्डणी । रास प्रगासौ बीसल-दे राइ । टि०—यही प्रति नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हुई है :— [ ३ ] नाम—श्री वीसलदे रास । कागज—देशी (हाथ का बना हुआ) आकार—११ ई० x ५ ई० । पंक्तियाँ-१५ से १६ प्रत्येक पृष्ठ पर । पद्यसंख्या—२४६ । प्रकार—पुराना; पूर्ण; साधारणतया ठीक । अक्षर—देव-
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