संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* अवन्तीके महाराज इन्द्रद्युम्नका पुरुषोत्तमक्षेत्रमें जाना * १०१
और सुभद्राकी स्थापना कैसे की ? ये सब बातें विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें।
ब्रह्माजी बोले— द्विजवरो ! तुम लोग जो प्राचीन वृत्तान्त पूछ रहे हो, वह सब पापोंको दूर करनेवाला, पवित्र, भोग और मोक्ष देनेवाला तथा शुभ है। इस प्रश्नके लिये तुम्हें साधुवाद देता हूँ। तुम जितेन्द्रिय एवं विशुद्धचित्त होकर सुनो। मैं सत्ययुगके राजा इन्द्रद्युम्नका चरित्र बतलाता हूँ। इस पृथ्वीपर मालवामें अवन्ती (उज्जैन) नामकी नगरी विख्यात है। वही राजा इन्द्रद्युम्नकी राजधानी थी। अवन्ती इस पृथ्वीके मुकुटके समान थी। वहाँ हृष्ट-पुष्ट मनुष्य भरे थे। उसकी चहारदीवारी और दरवाजे दृढ़ बने हुए थे। दरवाजोंपर मजबूत किंवाड़ और सुदृढ़ यन्त्र लगे थे। नगरके चारों ओर अनेकों खाइयाँ बनी हुई थीं। नगरमें बहुत-से व्यापारी बसते थे। नाना प्रकारके बर्तनोंकी अच्छी बिक्री होती थी। रथ चलने लायक सड़कें और बाजार सुन्दर थे। चौराहोंसे चारों ओर जानेके लिये मार्गोंका अच्छी प्रकार विभाग हुआ था। अनेकों घर और गोपुर बने हुए थे। बहुत-सी गलियाँ उस नगरकी शोभा बढ़ाती थीं। राजहंसोंके समान श्वेत और मनोहर महल लाखोंकी संख्यामें बने हुए थे, जो उस पुरीकी श्रीवृद्धि कर रहे थे। अनेकों यज्ञसम्बन्धी उत्सवोंके कारण उस नगरमें आनन्द छाया रहता था। गाने और बजानेकी ध्वनि गूँजती रहती थी। भाँति-भाँतिकी ध्वजा और पताकाओंसे वह पुरी सुशोभित थी। हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंकी सेना सब ओर व्याप्त थी। अनेक प्रकारके सैनिक वहाँ भरे थे। अनेकों जनपदोंके लोग वहाँ बसे हुए थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा विद्वान् पुरुषोंसे वह नगरी सुशोभित थी। वहाँ मलिन, मूर्ख, निर्धन, रोगी, अङ्गहीन तथा जुवारी मनुष्योंका अभाव था। वहाँके स्त्री-पुरुष सदा प्रसन्नचित्त दिखायी देते थे। वे सब रत्नोंके दाता तथा सब प्रकारकी सम्पत्तियोंको भोगनेवाले थे। वहाँकी कुलवती स्त्रियाँ सब गुणोंमें आचार्य थीं। वे पतिव्रता, सौभाग्यशालिनी तथा सम्पूर्ण गुणोंसे सम्पन्न थीं। उस नगरमें अनेकों वन, उपवन, पवित्र एवं मनोरम उद्यान, भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे सुशोभित दिव्य देवमन्दिर, शाल, ताल, तमाल, बकुल, नागकेसर, पीपल, कनेर, चन्दन, अगर, चम्पा तथा अन्यान्य मनोहर वृक्ष, लता-गुल्म आदि शोभा पाते थे। अनेकों जलाशय उस महापुरीकी शोभा बढ़ा रहे थे। अवन्तीपुरीमें त्रिनेत्रधारी त्रिपुरशत्रु भगवान् शिव महाकाल नामसे प्रसिद्ध होकर रहते हैं। वे समस्त कामनाओंके पूर्ण करनेवाले हैं। वहाँ एक शिवकुण्ड है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। उसमें विधिपूर्वक स्नान करके देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण करे। फिर शिवालयमें जाकर भगवान् शिवकी तीन बार प्रदक्षिणा करे। तत्पश्चात् स्नान, पुष्प, गन्ध, धूप और दीप आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक महाकालका विधिवत् पूजन करे। ऐसा करनेवाला मनुष्य एक हजार अश्वमेध-यज्ञोंका फल पाता है। वह सब पापोंसे मुक्त हो समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले विमानोंद्वारा भगवान् शिवके परम धाममें जाता है।
अवन्तीमें शिप्रा नामसे प्रसिद्ध पवित्र नदी है। उसमें विधिपूर्वक स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता और श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकमें नाना प्रकारके भोग भोगता है। वहीं देवाधिदेव भगवान् जनार्दन भी निवास करते हैं, जो गोविन्दस्वामीके नामसे प्रसिद्ध हैं। वे भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। उनका दर्शन करके मनुष्य अपनी इक्कीस पीढ़ियोंसहित मुक्त हो जाता है। उनके सिवा वहीं विक्रमस्वामीके नामसे भी भगवान् विष्णुका निवास