संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
है। स्त्री अथवा पुरुष, कोई भी उनका दर्शन करके पूर्वोक्त फल प्राप्त कर लेता है। वहाँ इन्द्र आदि देवता और समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेवाली देवियाँ भी निवास करती हैं। उन सबकी भक्तिपूर्वक पूजा और प्रणाम करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो स्वर्गलोकमें जाता है। इस प्रकार राजाओंमें श्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नके द्वारा पालित वह रमणीय पुरी इन्द्रकी अमरावतीके समान नित्य उत्सवके आनन्दसे परिपूर्ण रहती थी। वहाँ दिन-रात इतिहास-पुराण, नाना प्रकारके शास्त्र तथा काव्यचर्चा सुनी जाती थी। इस तरह वह उज्जैनी पुरी सब गुणोंसे सम्पन्न बतायी गयी है, जिसमें पूर्वकालमें परम बुद्धिमान् राजा इन्द्रद्युम्न हुए थे।
उस नगरीमें अपने उत्तम राज्यका उपभोग करते हुए राजा इन्द्रद्युम्न औरस पुत्रोंकी भाँति प्रजाका पालन करते थे। वे सत्यवादी, परम बुद्धिमान्, शूरवीर, समस्त गुणोंके आकर, मतिमान्, धर्मात्मा तथा सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ थे। उनमें सत्य, शील और इन्द्रिय-संयमके गुण थे। दान, यज्ञ और तपस्यामें उनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई राजा नहीं था। वे अपने प्रत्येक यज्ञमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सोना, मणि, मोती, हाथी और घोड़े दान किया करते थे। उनके पास अच्छे-अच्छे हाथी, घोड़े, रथ, कम्बल, मृगचर्म, वस्त्र, रत्न और धन-धान्यका कभी अन्त नहीं होता था। इस प्रकार समस्त वैभवसे युक्त और सम्पूर्ण गुणोंसे अलंकृत राजा इन्द्रद्युम्न निष्कण्टक राज्यका उपभोग करते थे। एक बार उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले सर्वयोगेश्वर श्रीहरिकी आराधना किस प्रकार करूँ। उन्होंने समस्त शास्त्र, तन्त्र, आगम, इतिहास, पुराण, वेदाङ्ग, धर्मशास्त्र, ऋषियोंके बताये हुए नियम तथा सम्पूर्ण विद्यास्थानोंका विचार किया।
यत्नपूर्वक गुरुजनोंकी सेवा की और वेदोंके पारगामी ब्राह्मणोंका सत्संग किया। फिर इन्द्रियोंको वशमें करके मोक्षकी इच्छासे विचार किया—'मैं देवाधिदेव सनातन पुरुष पीताम्बरधारी चतुर्भुज शङ्ख-चक्रगदाधर वनमालाविभूषित कमलनयन श्रीवत्सशोभित और मुकुट-अङ्गद आदि आभूषणोंसे अलंकृत श्रीहरिकी आराधना किस प्रकार करूँ? यह विचारकर वे बहुत बड़ी सेनाको साथ ले पुरोहित और भृत्योंके साथ अपनी नगरी उज्जैनीसे बाहर निकले। उनके पीछे रथारूढ़ सैनिक हथियार हाथमें लिये प्रस्थित हुए। उनके रथ विमानके समान जान पड़ते थे। उनपर ध्वजा-पताकाएँ फहरा रही थीं। रथियोंके पीछे गजयुद्धकी विद्यामें निपुण असंख्य पैदल भी चले, जिनके हाथोंमें धनुष, प्रास और खड्ग शोभा पा रहे थे। वे सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको चलानेमें कुशल, शूरवीर तथा सर्वदा संग्रामकी अभिलाषा रखनेवाले थे। अन्तःपुरकी सब स्त्रियाँ भी वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो महाराजके