भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 434 में से

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* अवन्तीके महाराज इन्द्रद्युम्नका पुरुषोत्तमक्षेत्रमें जाना * १०३

साथ चलीं। उनके नेत्र पद्मपत्रके समान विशाल थे और शस्त्रधारी सैनिक उन्हें घेरकर चलते थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंने भी राजाका अनुसरण किया। अनेक नगरोंके निवासी व्यापारी भी धन, रत्न, सुवर्ण, स्त्री तथा अन्य उपकरणोंके साथ प्रस्थित हुए। अस्त्र, शस्त्र, ताम्बूल, तृण, काष्ठ, तेल, वस्त्र, फल और पत्र आदिकी बिक्री करनेवाले लोग अपनी-अपनी दूकान लेकर राजाके साथ चले। घसियारे, धोबी, ग्वाले, नाई और दर्जी भी हजारोंकी संख्यामें साथ-साथ चल रहे थे। मङ्गल-पाठ करनेवाले, पुराणोंका अर्थ करनेमें प्रवीण कथावाचक, काव्य-रचयिता कवि, विष झाड़नेवाले, गरुड-विद्याके जानकार, भाँति-भाँतिके रत्नोंकी परीक्षा करनेवाले, गज-चिकित्सक, मनुष्य-चिकित्सक, वृक्ष-चिकित्सक, गो-चिकित्सक तथा समस्त पुरवासी राजाके पीछे-पीछे चलने लगे। जैसे दूसरे गाँवको जाते हुए पिताके पीछे पुत्र भी उत्सुक होकर जाने लगते हैं, उसी प्रकार समस्त पुरवासियोंने भी राजा इन्द्रद्युम्नका अनुसरण किया।

इस प्रकार हाथी, घोड़े, रथ और पैदलसहित महान् जनसमुदायके साथ धीरे-धीरे यात्रा करते हुए महाराज इन्द्रद्युम्न दक्षिण समुद्रके तटपर पहुँचे। वहाँ उन्होंने रमणीय समुद्रका दर्शन किया, जो लाखों उत्ताल तरङ्गोंसे व्याप्त होनेके कारण नृत्य करता-सा प्रतीत होता था। उसमें नाना प्रकारके रत्न और भाँति-भाँतिके प्राणी भरे थे। उसमें बड़े जोरका शब्द हो रहा था। वह अगाध समुद्र अत्यन्त भयंकर, अपार तथा मेघमालाके समान श्याम दिखायी देता था। उसीमें भगवान् श्रीहरिके शयनका स्थान है। खारे पानीसे भरा हुआ वह नदियोंका स्वामी सिन्धु परम पवित्र, सब पापोंको दूर करनेवाला तथा सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाला है। ऐसे समुद्रको देखकर राजाओंमें श्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने समुद्रके तटपर पहुँचकर एक मनोहर प्रदेशमें, जो सर्वगुणसम्पन्न एवं पवित्र था, निवास किया।

मुनियोंने पूछा—ब्रह्मन्! भगवान् विष्णुके उस परम पवित्र पुरुषोत्तमक्षेत्रमें क्या पहले भगवान्‌की कोई प्रतिमा नहीं थी, जो राजाने सेना और सवारियोंके साथ वहाँ जाकर श्रीकृष्ण, बलराम तथा सुभद्राजीकी स्थापना की ?

ब्रह्माजी बोले—महर्षियो! इस विषयमें समस्त पापोंका विनाश करनेवाली प्राचीन कथा सुनो। मैं उसे संक्षेपसे कहूँगा। एक समय समस्त लोकोंकी सृष्टि करनेवाले अविनाशी भगवान् वासुदेवको प्रणाम करके भगवती लक्ष्मीने सब लोगोंके हितके लिये इस प्रकार प्रश्न किया—'भगवन् ! आप समस्त लोकोंके स्वामी हैं। मेरे हृदयमें एक संदेह खड़ा हुआ है, उसका इस समय निवारण कीजिये। अत्यन्त आश्चर्यमय मर्त्यलोकको, जो परम दुर्लभ कर्मभूमि है, लोभ और मोहरूपी ग्रहने ग्रस लिया है। वहाँ काम और क्रोधका महासागर लहराता

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