भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

है। देवेश! उस संसार-सागरसे जिस प्रकार मुक्ति मिल सके, वह उपाय बतलाइये। इस संसारमें मेरे संदेहका निवारण करनेके लिये आपको छोड़कर दूसरा कोई वक्ता नही है।'

देवीका यह वचन सुनकर देवाधिदेव भगवान् जनार्दनने बड़ी प्रसन्नताके साथ यह सारभूत अमृतमय वचन कहा—'देवि! समस्त तीर्थोंमें श्रेष्ठ पुरुषोत्तमक्षेत्र विख्यात तीर्थ है। वह बहुत ही सुन्दर, सुखपूर्वक सेवन करनेयोग्य, अनायास-साध्य तथा उत्तम फल देनेवाला है। तीनों लोकोंमें उसके समान कोई तीर्थ नहीं है। देवेश्वरि! पुरुषोत्तमतीर्थका नाम लेनेमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। उसे सम्पूर्ण देवता, दैत्य, दानव तथा मरीचि आदि मुनिवर भी भलीभाँति नहीं जानते। उसको मैंने अबतक गुप्त ही रखा है। इस समय उस तीर्थराजकी महिमाका वर्णन करता हूँ, तुम एकचित्त होकर सुनो!

'दक्षिणसमुद्रके तटपर जहाँ एक वटका महान् वृक्ष खड़ा है, वह अत्यन्त दुर्लभ क्षेत्र है। उसका विस्तार दस योजनका है। वह वट कल्पका संहार होनेपर भी नष्ट नहीं होता। उस वटवृक्षके दर्शनसे तथा उसकी छायाके नीचे चले जानेसे ब्रह्महत्या भी छूट जाती है, फिर अन्य पापोंकी तो बात ही क्या है। जिन्होंने उसकी परिक्रमा की है, उसे मस्तक झुकाया है, वे सब पापरहित होकर भगवान् विष्णुके धामको पहुँच गये हैं। उस वटवृक्षके उत्तर और भगवान् केशवके कुछ दक्षिण जो बहुत बड़ा महल खड़ा है, वह धर्ममय पद है। वहाँ स्वयं भगवान्‌की बनायी हुई प्रतिमाका दर्शन करके पृथ्वीके सब मनुष्य अनायास ही मेरे धाममें चले जाते हैं। प्रिये! इस प्रकार सब लोगोंको वैकुण्ठधाममें जाते देख एक दिन धर्मराज मेरे पास आये और मुझे प्रणाम करके इस प्रकार बोले।'

यमराजने कहा— भगवन्! आपको नमस्कार है। देव! आप सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी और समस्त विश्वके पालक हैं। आपको नमस्कार है। आप क्षीर-सागरके निवासी और शेषनागके शरीरकी शय्यापर शयन करनेवाले हैं। आप सबसे श्रेष्ठ, वरेण्य और वरदाता हैं। सबके कर्ता होते हुए भी स्वयं अकृत हैं—आपको किसी दूसरेने नहीं बनाया है। आप प्रभु-शक्तिसे सम्पन्न, सम्पूर्ण विश्वके ईश्वर, अजन्मा, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ तथा किसीसे परास्त न होनेवाले हैं। आपका श्रीविग्रह नील कमलदलके समान श्याम है, नेत्र खिले हुए कमलकी शोभा धारण करते हैं। आप सबके ज्ञाता, निर्गुण, शान्त, जगदाधार, अविनाशी, सर्वलोकस्रष्टा तथा सबको सुख देनेवाले हैं। जानने योग्य पुराणपुरुष, व्यक्ताव्यक्तस्वरूप सनातन परमेश्वर, कार्य-कारणके उत्पादक, लोकनाथ एवं जगद्गुरु हैं। आपका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित है। आप वनमालासे विभूषित हैं। आपका वस्त्र पीले रंगका है। आपकी चार बाँहें हैं। आप शङ्ख, चक्र, गदा, हार, केयूर, मुकुट और अङ्गद

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